18 से ज्यादा परीक्षाओं में मिली हार, ट्रेन में रोकर फाड़ दिए पेपर; ड्राइवर के बेटे विवेक यादव ऐसे बने IPS ऑफीसर

संवाद 24 डेस्क। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के लिए सफलता की कहानियां अक्सर एक जैसे संदेश के साथ सामने आती हैं—मेहनत करते रहिए और हार मत मानिए। लेकिन मध्य प्रदेश के चंदेरी निवासी विवेक यादव की कहानी इस संदेश को कहीं अधिक गहराई देती है। सरकारी नौकरी की तलाश में उन्हें करीब 20 प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलताओं का सामना करना पड़ा। एक समय निराशा इतनी बढ़ गई कि ट्रेन में बैठकर वे रो पड़े और अपने परीक्षा के कागज तक फाड़कर फेंक दिए। इसके बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। बाद में UPSC सिविल सेवा परीक्षा में लगातार दो बार सफलता हासिल की और 2025 की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 487 प्राप्त कर IPS बनने की दिशा में अपना लक्ष्य हासिल किया।

छोटे शहर से शुरू हुआ बड़ा सपना
विवेक यादव का संबंध मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के चंदेरी से है। उनकी शुरुआती पढ़ाई चंदेरी के सरस्वती विद्या मंदिर से हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से इतिहास में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। आगे उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय यानी IGNOU से इतिहास में परास्नातक किया। शिक्षा के इस सफर के साथ-साथ उनके सामने आर्थिक परिस्थितियों की चुनौती भी थी।
उनके पिता नवल सिंह यादव चंदेरी नगर पालिका में ड्राइवर के रूप में काम करते हैं, जबकि उनकी मां सिलाई का काम करने के साथ आंगनवाड़ी में सहायिका के तौर पर भी काम करती रही हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन माता-पिता ने बेटे की पढ़ाई और उसके सपनों के रास्ते में आर्थिक कठिनाइयों को बाधा नहीं बनने दिया। दिल्ली में पढ़ाई के दौरान विवेक ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने की कोशिश की।

पहला लक्ष्य UPSC नहीं, नौकरी हासिल करना था
विवेक की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शुरुआत में UPSC उनकी पहली प्राथमिकता नहीं थी। परिवार की आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए उनका पहला लक्ष्य नौकरी हासिल करना था, ताकि बेरोजगारी की स्थिति खत्म हो और परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने अलग-अलग सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की।
पटवारी, MPPSC, UPPSC, दिल्ली पुलिस और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्होंने किस्मत आजमाई। अलग-अलग स्रोतों में असफल परीक्षाओं की संख्या 17, 18, 19 या करीब 20 बताई गई है। इसलिए इसे सटीक संख्या के बजाय करीब 20 प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता के रूप में देखना अधिक उचित है।
इन लगातार असफलताओं का असर स्वाभाविक था। जिस परीक्षा को लेकर उम्मीदवार महीनों मेहनत करता है, उसमें परिणाम उम्मीद के मुताबिक न आए तो आत्मविश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है। विवेक के साथ भी ऐसा ही हुआ, लेकिन यही दौर आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा सबक बन गया।

जब ट्रेन में टूट गया था हौसला
विवेक की कहानी का सबसे भावुक प्रसंग वह है जब लगातार असफलताओं के बाद वे ट्रेन में बैठकर रो पड़े थे। निराशा के उस क्षण में उन्होंने अपने परीक्षा के कागज फाड़कर फेंक दिए। यह घटना बताती है कि सफलता की तस्वीर के पीछे असफलता और मानसिक संघर्ष का कितना लंबा दौर हो सकता है।
लेकिन इस घटना के बाद कहानी खत्म नहीं हुई। उन्होंने अपनी कमियों पर दोबारा काम किया और यह समझने की कोशिश की कि परीक्षा में बार-बार असफल होने की वजह क्या है। बाद में उन्होंने दिल्ली छोड़कर घर लौटने और परिवार के साथ रहकर तैयारी करने का फैसला किया। यही बदलाव उनकी तैयारी में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

तीन साल UPSC में भी मिली असफलता
सरकारी नौकरी की अन्य परीक्षाओं में असफलता के बाद जब विवेक ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा को गंभीरता से लक्ष्य बनाया, तब भी सफलता तुरंत नहीं मिली। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक UPSC की तैयारी के दौरान वे तीन बार प्रारंभिक परीक्षा में असफल हुए और दो बार CSAT में भी सफलता नहीं मिली। यानी देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक ने भी उन्हें कई बार रोक दिया।
यहां से उनकी रणनीति में बदलाव आया। केवल अधिक घंटे पढ़ना पर्याप्त नहीं था; परीक्षा के पैटर्न, अपनी कमजोरियों और तैयारी की कमियों को पहचानना भी जरूरी था। लगातार असफलता के बाद उन्होंने अपने प्रयासों का विश्लेषण किया और उसी आधार पर आगे की तैयारी की।

UPSC ने बदली दिशा, पहली सफलता ने दिया नया आत्मविश्वास
लगातार संघर्ष के बाद विवेक को UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 में सफलता मिली। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने उस परीक्षा में 413वीं रैंक हासिल की और रेलवे से संबंधित सेवा में अधिकारी के रूप में चयनित हुए। यह उपलब्धि अपने आप में बड़ी थी, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ था।
यही वह बिंदु था जहां विवेक की कहानी सामान्य सफलता की कहानी से अलग हो जाती है। पहली बार UPSC पास करने के बाद भी उन्होंने अपनी तैयारी रोक नहीं दी, क्योंकि उनका लक्ष्य IPS बनना था। उन्होंने दोबारा परीक्षा देने का निर्णय लिया।

एक बार अधिकारी बनने के बाद भी फिर बैठ गए परीक्षा में
पहली UPSC सफलता के बाद उनके सामने दो रास्ते थे—मिली हुई उपलब्धि को स्वीकार कर आगे बढ़ना या अपने मूल लक्ष्य के लिए एक और प्रयास करना। विवेक ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने दोबारा UPSC सिविल सेवा परीक्षा दी और इस बार परिणाम ने उन्हें उनके लक्ष्य के और करीब पहुंचा दिया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 के परिणाम में विवेक यादव ने ऑल इंडिया रैंक 487 हासिल की। उपलब्ध परिणाम सूची में रोल नंबर 6903533 के साथ उनका नाम 487वीं रैंक पर दर्ज है।
यहां एक तथ्यात्मक सुधार भी जरूरी है। संबंधित खबर के कुछ संस्करणों में 487वीं रैंक को UPSC 2024 से जोड़ा गया है, जबकि उपलब्ध अन्य रिपोर्टों और परिणाम रिकॉर्ड के अनुसार 413वीं रैंक UPSC CSE 2024 में और 487वीं रैंक UPSC CSE 2025 में मिली। इसलिए इस सफलता को 2025 की परीक्षा से जोड़ना अधिक सटीक है।

IPS बनने की चाह ने दोबारा मेहनत के लिए किया प्रेरित
विवेक के लिए UPSC में पहली सफलता मंजिल नहीं थी। रेलवे सेवा में चयन के बाद भी उन्होंने IPS बनने की अपनी इच्छा को कायम रखा। दूसरी बार परीक्षा देने का फैसला आसान नहीं रहा होगा, क्योंकि पहली सफलता के बाद एक सुरक्षित करियर विकल्प उनके सामने मौजूद था। फिर भी उन्होंने अपने बड़े लक्ष्य को प्राथमिकता दी।
2025 में 487वीं रैंक हासिल करने के बाद उनका IPS बनने का सपना पूरा हुआ। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में IPS जैसी सेवा में प्रवेश के लिए केवल परीक्षा पास करना ही पर्याप्त नहीं होता; अंतिम सेवा आवंटन रैंक, वर्ग, उपलब्ध रिक्तियों और उम्मीदवार की प्राथमिकताओं सहित विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। उपलब्ध रिपोर्टों में विवेक के चयन को IPS से जोड़ा गया है।

परिवार की आर्थिक स्थिति बनी प्रेरणा
विवेक की सफलता में परिवार का संघर्ष भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। पिता का ड्राइवर के रूप में काम करना और मां का सिलाई तथा आंगनवाड़ी से जुड़े काम करना परिवार की सीमित आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाता है। लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके माता-पिता ने पढ़ाई को प्राथमिकता दी।
विवेक ने भी परिवार की स्थिति को समझते हुए अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाने के लिए ट्यूशन पढ़ाई। इससे उनकी कहानी में केवल परीक्षा की मेहनत नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की कोशिश भी जुड़ती है। यही कारण है कि उनकी सफलता उन युवाओं के लिए विशेष महत्व रखती है जो सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

हिंदी माध्यम से तैयारी और आत्मविश्वास का संदेश
उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि विवेक ने UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम से की। उन्होंने एक प्रयास में परीक्षा के विभिन्न चरणों को पार करने की क्षमता दिखाई और लगातार असफलताओं के बावजूद अपनी तैयारी को आगे बढ़ाया।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि सफलता के लिए केवल अंग्रेजी माध्यम ही बेहतर है। वास्तविकता यह है कि UPSC संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं सहित निर्धारित माध्यमों में परीक्षा देने का विकल्प उपलब्ध कराता है। उम्मीदवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय उसकी समझ, उत्तर लेखन, विश्लेषण क्षमता और परीक्षा की मांग के अनुरूप तैयारी है।

असफलता को आंकड़ा नहीं, अनुभव बनाना जरूरी
विवेक यादव की कहानी का सबसे बड़ा संदेश केवल यह नहीं है कि उन्होंने करीब 20 परीक्षाओं के बाद सफलता हासिल की। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने असफलताओं को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। ट्रेन में बैठकर रोने और परीक्षा के कागज फाड़ने तक पहुंची निराशा के बाद भी उन्होंने खुद को संभाला।
प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता अक्सर उम्मीदवार को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि शायद वह इस क्षेत्र के लिए बना ही नहीं है। लेकिन एक परीक्षा का परिणाम किसी व्यक्ति की पूरी क्षमता का प्रमाण नहीं होता। असफलता यह संकेत जरूर दे सकती है कि रणनीति, समय प्रबंधन, विषय की समझ, उत्तर लेखन या परीक्षा के किसी दूसरे हिस्से में बदलाव की आवश्यकता है।
विवेक की यात्रा में भी यही दिखाई देता है। उन्होंने असफलताओं के बाद दिशा बदली, फिर UPSC में सफलता हासिल की और पहली सफलता के बाद भी अपने लक्ष्य को लेकर प्रयास जारी रखा।

युवाओं के लिए क्या है इस कहानी की असली सीख?
विवेक यादव की कहानी को केवल भावुक सफलता की कहानी बनाकर देखना इसके वास्तविक संदेश को छोटा कर देगा। इसका सबसे बड़ा सबक है कि लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार उम्मीदवार को अपनी रणनीति बदलनी पड़ती है, कुछ समय के लिए पीछे लौटना पड़ता है और अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना पड़ता है।
दूसरी सीख यह है कि आर्थिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन हर परिस्थिति में उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल भी मायने रखता है। विवेक ने दिल्ली में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया और बाद में परिवार के साथ रहकर तैयारी को नया रूप दिया।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि एक सफलता के बाद भी अपने वास्तविक लक्ष्य को पहचानना जरूरी है। UPSC CSE 2024 में सफलता और रेलवे सेवा में चयन के बाद विवेक ने वहीं रुकने के बजाय IPS के लक्ष्य के लिए फिर परीक्षा दी और 2025 में 487वीं रैंक हासिल की।

हार के बाद उठना ही असली सफलता
चंदेरी से दिल्ली तक का सफर, आर्थिक संघर्ष, ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई का खर्च उठाना, करीब 20 प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होना, ट्रेन में रोकर पेपर फाड़ देना और फिर उसी व्यक्ति का UPSC को लगातार दो बार क्रैक करना—विवेक यादव की कहानी संघर्ष की लंबी यात्रा को सामने रखती है।
उनकी कहानी यह साबित नहीं करती कि हर व्यक्ति को कितनी ही बार असफल होने के बाद भी केवल एक ही परीक्षा देते रहना चाहिए। बल्कि इसका संदेश यह है कि असफलता के कारण को समझकर रणनीति बदलना और लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहना जरूरी है। विवेक ने पहले नौकरी की जरूरत को प्राथमिकता दी, फिर UPSC में सफलता हासिल की और अंततः IPS बनने के अपने लक्ष्य के लिए एक और प्रयास किया।
आज उनकी 487वीं रैंक वाली सफलता उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो किसी परीक्षा के एक-दो नहीं, बल्कि लगातार कई परिणामों से निराश हो चुके हैं। सफलता की उनकी यात्रा बताती है कि कभी-कभी जिस दिन हाथ में पकड़ा हुआ पेपर फाड़ देने का मन करता है, उसी दौर के बाद जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हो सकता है।

Geeta Singh
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