‘धर्म हमारा है तो तय करने वाले जज कौन?’: स्कूलों में हिजाब पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर भड़के ओवैसी, खड़ा हुआ नया सियासी तूफान

​संवाद 24 डेस्क। शिक्षण संस्थानों में यूनिफॉर्म बनाम धार्मिक पहचान को लेकर छिड़ी कानूनी और सामाजिक बहस एक बार फिर गरमा गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्कूलों में हेडस्कार्फ (हिजाब) की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज किए जाने के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तीखा रुख अपनाया है। ओवैसी ने अदालत के इस फैसले को सीधे तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों पर आघात करार दिया है।

​”जज तय नहीं करेंगे इस्लाम में क्या जरूरी है”
​हैदराबाद में मीडिया से मुखातिब होते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने हाईकोर्ट के रुख पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने कहा कि यह तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है कि किसी धर्म विशेष की आवश्यक धार्मिक प्रथाएं (Essential Religious Practices) क्या हैं। ओवैसी ने दो टूक शब्दों में कहा, “यह हमारा मजहब है और हम खुद तय करेंगे कि हमारे लिए क्या अनिवार्य है। यह तय करने वाले जज कौन होते हैं? यह फैसला सीधे तौर पर हमारे मजहब और धार्मिक पहचान पर हमला है।”
​ओवैसी ने इस बात पर भी जोर दिया कि जब सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला और अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों पर पहले से विस्तृत सुनवाई चल रही है, ऐसे समय में हाईकोर्ट को इस तरह का आदेश पारित करने से बचना चाहिए था। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म के आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता) का खुला उल्लंघन करता है।

​”सिर पर पहना है, दिमाग पर नहीं”: शिक्षा पर पड़ेगा असर
​मुस्लिम छात्राओं के हक में आवाज उठाते हुए एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा कि अपनी पसंद और निजता के आधार पर सिर ढकना किसी के बुनियादी अधिकारों का हिस्सा है। उन्होंने टिप्पणी की, “छात्रा ने हिजाब अपने सिर पर पहना है, अपने दिमाग पर नहीं।” ​ओवैसी ने आशंका जताई कि इस तरह की पाबंदियों से मुस्लिम लड़कियों की उच्च शिक्षा पर बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में पहले से ही सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर पर मुस्लिम छात्राओं का एनरोलमेंट (नामांकन दर) काफी कम है। ऐसे नियम और फैसले उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा से दूर करने का काम करेंगे।

​क्या था पूरा मामला और हाईकोर्ट का रुख?
​गौरतलब है कि यह पूरा विवाद प्रयागराज के एक निजी स्कूल से शुरू हुआ था। वहां 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करने वाली एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा ने 11वीं कक्षा में दाखिले के दौरान तय स्कूल यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त रूप से हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी। स्कूल प्रबंधन द्वारा इनकार किए जाने के बाद छात्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
​जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि:
​यूनिफॉर्म की अनिवार्यता: किसी भी छात्र को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर शैक्षणिक संस्थान द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड में अपनी मर्जी से बदलाव करे। ​
धर्म का अनिवार्य अंग नहीं: अदालत ने विभिन्न पूर्ववर्ती न्यायिक उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनना इस्लामिक आस्था का ऐसा कोई अपरिहार्य हिस्सा नहीं है, जिसके न होने से धर्म ही खतरे में पड़ जाए।
​धर्मनिरपेक्ष वातावरण: कोर्ट का मानना था कि स्कूल परिसर में एक समान ड्रेस कोड लागू करना छात्रों के बीच समानता और धर्मनिरपेक्ष माहौल को मजबूत करता है।

​नए सिरे से गरमाई कानूनी और सियासी बहस
​इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले और उसके बाद असदुद्दीन ओवैसी की तल्ख बयानबाजी ने एक बार फिर देश भर में कर्नाटक हिजाब विवाद जैसी बहसों को ताजा कर दिया है। एक पक्ष जहां इसे शिक्षण संस्थानों के अनुशासन, समानता और धर्मनिरपेक्ष नियमों के पालन के लिए जरूरी मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे व्यक्तिगत चयन, निजता और अल्पसंख्यक समुदाय की बेटियों के शिक्षा के अधिकार में रुकावट के रूप में देख रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचने और सियासी गलियारों में और तूल पकड़ने की पूरी संभावना है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *