
संवाद 24 नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि जिस पैकेज्ड ड्रिंक या चिप्स को आप बड़े चाव से खाते हैं, वही चीज विदेशों में सख्त स्वास्थ्य चेतावनियों के साथ बेची जाती है? यूरोप और ब्रिटेन के सुपरमार्केट्स में पैकेटबंद उत्पादों के सामने लाल रंग के ‘खतरे’ वाले पोषण संकेत (Front-of-Pack Warning Labels) लगाना कानूनी अनिवार्यता या आम चलन है। मगर भारत में वही बहुराष्ट्रीय कंपनियां पैकेट पर चेतावनी छापने के सख्त खिलाफ खड़ी हो गई हैं। भारतीय उपभोक्ताओं की थाली और सेहत से जुड़ा यह बड़ा विवाद अब देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच चुका है।
एक ही ब्रांड, दो नियम: लंदन में कम चीनी, भारत में तीन गुना मिठास!
वैश्विक स्तर पर खाद्य उत्पादों के मानकों में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, लंदन में बिकने वाले लोकप्रिय ड्रिंक ‘फैंटा’ के एक कैन में मात्र 63 कैलोरी होती है। वहीं भारत में बिकने वाले उसी कैन में लगभग तीन गुना अधिक चीनी और कृत्रिम रंग (Artificial Colorant) पाए जाते हैं। यूरोपीय देशों में ऐसे सिंथेटिक रंगों और अत्यधिक चीनी की मौजूदगी पर पैकेट के बिल्कुल सामने (Front-of-Pack) बड़ी चेतावनी छापना अनिवार्य है। इसके उलट, भारत में इन स्वास्थ्य चेतावनियों को पैकेट के पीछे बेहद बारीक और अस्पष्ट अक्षरों में समेट दिया जाता है, जिसे आम उपभोक्ता समझ ही नहीं पाते।
FSSAI का ढुलमुल रवैया और उद्योग जगत का दबाव
भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक, FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) ने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर अधिक चीनी, वसा और नमक (HFSS) दर्शाने वाले रंगीन चेतावनी लेबल्स लागू करने की तैयारी की थी। लेकिन खाद्य कंपनियों के भारी विरोध और दबाव के आगे नियामक को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। उद्योग प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठकों के बाद FSSAI ने रंगीन चेतावनियों के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालते हुए केवल एक ब्लैक-एंड-व्हाइट पोषण तालिका का विकल्प सामने रखा। नियामक का तर्क था कि पश्चिमी खान-पान की तुलना में भारतीय भोजन के स्वाद अधिक तीखे और समृद्ध होते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय ‘ट्रैफिक-लाइट’ सिस्टम को सीधे लागू करना कठिन है।
कंपनियों का तर्क: चेतावनी से क्या बदल जाएगा?
कंपनियों के प्रमुख लॉबी समूहों और अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ एक लाल निशान या आइकन देखकर उपभोक्ता अपनी खान-पान की आदतें नहीं बदल लेंगे। उनका यह भी तर्क है कि भारत में डॉक्टर पहले ही मरीजों को खान-पान के प्रति जागरूक कर रहे हैं। इसके अलावा, भारतीय पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री (जिसका आकार 100 अरब डॉलर से अधिक है) के करीब 80% उत्पाद अधिक फैट, शुगर या साल्ट की श्रेणी में आते हैं। यदि कलर-कोडेड वार्निंग अनिवार्य कर दी गई, तो बाजार में मौजूद अधिकांश पैकेट ‘लाल रंग’ की चेतावनी से भर जाएंगे, जिससे कंपनियों के मुनाफे और बिक्री पर सीधा असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट सख्त: 45 करोड़ भारतीयों का स्वास्थ्य दांव पर
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका पर अब भारत का सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताते हुए नियामक से पूछा है कि क्या कॉर्पोरेट दबाव के चलते बच्चों और आम जनता की सेहत की अनदेखी की जा रही है?
मशहूर मेडिकल जर्नल द लैंसेट (The Lancet) के एक शोध के अनुसार, वर्ष 2050 तक लगभग 45 करोड़ भारतीय मोटापे या अत्यधिक वजन की समस्या से ग्रसित हो सकते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेट के आगे स्पष्ट रंगीन चेतावनी उपभोक्ताओं को जागरूक करने और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बचाने का सबसे असरदार हथियार साबित हो सकती है। अब देखना यह होगा कि अदालत के दखल के बाद देश में उपभोक्ताओं की सेहत को प्राथमिकता मिलती है या कंपनियों के मुनाफे को।






