
संवाद 24 बिहार। गया जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न सिर्फ पूरे प्रशासन की सांसें अटका दीं, बल्कि पूरे इलाके के लोगों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दीं। खेलते-खेलते अचानक मौत के मुहाने पर पहुंचे एक 4 साल के मासूम ने भगवान की कृपा और रेस्क्यू टीम की जाँबाज़ी की बदौलत करीब 7 घंटे के कड़े संघर्ष के बाद मौत को मात दे दी। पाताल जैसी गहराई में फंसे इस बच्चे के सुरक्षित बाहर आते ही जहाँ पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई, वहीं मां की आँखों से छलकते आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
हंसते-खेलते अचानक गायब हो गया घर का चिराग
यह रूह कंपा देने वाली घटना गया जिले के फतेहपुर प्रखंड अंतर्गत कठौतिया केवाल पंचायत के रघुनाथ नगर गांव की है। यहाँ रहने वाला 4 वर्षीय पीयूष कुमार हर दिन की तरह अपने घर के पास खेल रहा था। खेलते-खेलते वह अचानक एक खुले पड़े बोरवेल के पास चला गया। बोरवेल खुला होने के कारण मासूम का पैर फिसल गया और वह सीधे उसके अंदर समा गया। यह बोरवेल करीब 300 फीट गहरा बताया जा रहा है, जिसमें पीयूष करीब 30 से 35 फीट की गहराई पर जाकर फंस गया। बच्चे के गिरने की आवाज सुनकर जब आसपास के लोग दौड़े, तो अंदर से आ रही मासूम की चीखें सुनकर सबके पैरों तले जमीन खिसक गई।
प्रशासन की मुस्तैदी और तुरंत एक्शन मोड
घटना की भनक लगते ही पूरे गांव में हड़कंप मच गया। तुरंत इसकी सूचना स्थानीय प्रशासन और जिला स्तर पर दी गई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जिला पदाधिकारी शशांक शुभंकर ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने बिना वक्त गंवाए राहत और बचाव कार्य शुरू करने के कड़े निर्देश जारी किए। कुछ ही देर में अंचल अधिकारी (CO), प्रखंड विकास अधिकारी (BDO) और स्थानीय थाना प्रभारी दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए और पूरे इलाके को अपने नियंत्रण में ले लिया।
चुनौतियों से भरा था रेस्क्यू, पाइप से पहुंचाई गई सांसें
30 फीट गहरे गड्ढे में फंसे मासूम को बचाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। सबसे बड़ा खतरा ऑक्सीजन की कमी का था। प्रशासन ने बिना देरी किए मौके पर गैस सिलेंडर और विशेष पाइप की व्यवस्था की, जिसके जरिए बोरवेल के भीतर लगातार ऑक्सीजन की सप्लाई शुरू की गई ताकि बच्चे का दम न घुटे। इसके साथ ही मौके पर बड़ी-बड़ी पोकलेन मशीनें बुलाई गईं और बोरवेल के समानांतर (Parallel) खुदाई का काम शुरू कर दिया गया।
जब मां की आवाज बनी उम्मीद
इस पूरे ऑपरेशन में एनडीआरएफ (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) की टीमों ने संयुक्त रूप से कमान संभाली। बच्चे की हर हलचल पर नजर रखने के लिए एक विशेष नाइट-विज़न कैमरा रस्सी के सहारे बोरवेल के अंदर उतारा गया। स्क्रीन पर बच्चे को सही-सलामत देख रेस्क्यू टीम का हौसला और बढ़ गया। मासूम पीयूष अंदर घबराए नहीं, इसके लिए टीम ने एक बेहद भावुक और मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाया। पीयूष की मां को बोरवेल के मुहाने पर बुलाया गया और पाइप के माध्यम से उसकी आवाज अंदर तक पहुंचाई गई। मां की आवाज सुनते ही बच्चे का हौसला बढ़ा और वह शांत रहा। इस दौरान बड़ी सावधानी से बच्चे तक पीने का पानी भी पहुंचाया गया।
रात 1:50 बजे हुआ चमत्कार, सुरक्षित बाहर आया पीयूष
वक्त बीतने के साथ ही गांव के सैकड़ों लोगों की दुआएं और रेस्क्यू टीम की मेहनत रंग लाने लगी। करीब 7 घंटे तक चले इस बेहद जटिल और संवेदनशील ऑपरेशन के बाद, रात के करीब 1 बजकर 50 मिनट पर वो ऐतिहासिक पल आया जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। NDRF के जाँबाज़ों ने बेहद वैज्ञानिक तरीके से तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पीयूष को बिना एक भी खरोंच आए सुरक्षित बाहर निकाल लिया। जैसे ही जाँबाज़ जवान पीयूष को गोद में लेकर बाहर आए, पूरा इलाका ‘भारत माता की जय’ और रेस्क्यू टीम के समर्थन में नारों से गूंज उठा। एनडीआरएफ के अधिकारियों ने पुष्टि की कि बच्चा पूरी तरह से सुरक्षित और होश में है। हालांकि, इतने घंटों तक तंग जगह में फंसे रहने के कारण एहतियात के तौर पर उसे तुरंत मौके पर मौजूद एम्बुलेंस से अस्पताल भेजा गया, जहाँ डॉक्टरों की एक विशेष टीम उसकी सेहत की गहन जांच कर रही है। इस सफल रेस्क्यू ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों और प्रशासन मुस्तैद, तो मौत के मुंह से भी जिंदगी को वापस छीना जा सकता है।






