
संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीति के मोर्चे पर भारत ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और किसी एक क्षेत्र पर अपनी निर्भरता को कम करने के इरादे से भारत ने घरेलू रसोई गैस (LPG) के आयात को लेकर अपनी नीति में आमूल-चूल बदलाव किया है। भारत अब अमेरिका से होने वाले एलपीजी आयात को दोगुना करने की तैयारी में है। इस फैसले को पारंपरिक रूप से मध्य पूर्व (खाड़ी देशों) जैसे सऊदी अरब, कतर और यूएई पर भारत की दशकों पुरानी निर्भरता को कम करने के एक बड़े ‘मास्टरस्ट्रोक’ के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के इस कदम से न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि वैश्विक बाजार में भारत की मोलभाव करने की ताकत भी काफी बढ़ जाएगी।
खाड़ी देशों से दूरी और अमेरिका से नजदीकी क्यों?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी विदेशों से आयात करता है। अब तक इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा सऊदी अरब की कंपनी अरामको और कतर जैसे खाड़ी देशों से आता रहा है। हालांकि, हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर होने वाले हमले और खाड़ी देशों द्वारा समय-समय पर तेल-गैस की कीमतों में की जाने वाली मनमानी ने भारत को अपने विकल्पों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका इस समय दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उत्पादकों और निर्यातकों में से एक बनकर उभरा है। अमेरिकी शेल गैस (Shale Gas) क्रांति के कारण वहां एलपीजी की कीमतें खाड़ी देशों के मुकाबले काफी प्रतिस्पर्धी और स्थिर बनी हुई हैं। ऐसे में भारत की प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों (जैसे IOC, BPCL, और HPCL) ने अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं के साथ दीर्घकालिक अनुबंध (Long-term Contracts) को दोगुना करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा ‘अभय कवच’
इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को होने वाला है। कूटनीतिक भाषा में इसे ‘आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण’ (Diversification of Supply Sources) कहा जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर भविष्य में मध्य पूर्व या खाड़ी क्षेत्र में युद्ध या किसी अन्य कारण से आपूर्ति बाधित होती है, तो भी भारत के करोड़ों घरों में जलने वाले रसोई गैस के चूल्हे ठंडे नहीं पड़ेंगे। अमेरिका से आने वाली गैस सीधे अटलांटिक और हिंद महासागर के सुरक्षित रास्तों से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचेगी, जिससे लाल सागर के संकटग्रस्त जलमार्गों से बचने में भी मदद मिलेगी।
क्या आम जनता के लिए सस्ती होगी रसोई गैस?
इस बड़े बदलाव के बाद आम उपभोक्ताओं के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें कम होंगी? आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका से भारी मात्रा में और कम कीमत पर गैस मिलने से भारतीय तेल कंपनियों की इनपुट कॉस्ट (लागत) में कमी आएगी। इसके अलावा, जब खाड़ी देशों को यह समझ आ जाएगा कि भारत के पास अब अमेरिका के रूप में एक मजबूत और बड़ा विकल्प मौजूद है, तो वे भारत को अपने पाले में बनाए रखने के लिए गैस की कीमतों में रियायत देने या डिस्काउंट देने पर मजबूर हो सकते हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी एलपीजी के दामों को प्रभावित करती हैं, लेकिन इस नए सौदे से भारतीय बाजार में कीमतों को स्थिर रखने और भविष्य में कटौती करने में सरकार को बड़ी मदद जरूर मिलेगी।
‘उज्ज्वला योजना’ की बढ़ती मांग को मिलेगा सहारा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (PMUY) के तहत देश के ग्रामीण और गरीब परिवारों को बड़े पैमाने पर मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए हैं। इसके चलते भारत में एलपीजी की खपत में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व उछाल आया है। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश बन चुका है। इस भारी-भरकम घरेलू मांग को बिना किसी रुकावट के पूरा करने के लिए भारत को एक ऐसे भरोसेमंद साथी की जरूरत थी जो लंबे समय तक भारी मात्रा में गैस की सप्लाई कर सके, और अमेरिका इस मापदंड पर पूरी तरह खरा उतरता है। आगामी महीनों में अमेरिकी एलपीजी की पहली बड़ी खेप नए समझौतों के तहत भारत पहुंचने की उम्मीद है।






