समुद्र से आसमान तक घेराबंदी: जकार्ता में पीएम मोदी का ‘मास्टरस्ट्रोक’, भारत-इंडोनेशिया की नई दोस्ती से उड़े चीन के होश!

संवाद 24 नई दिल्ली। दक्षिण-पूर्व एशिया की भू-राजनीति में इस वक्त एक बहुत बड़ी हलचल देखी जा रही है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा ने न केवल दोनों देशों के सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्तों को एक नया आयाम दिया है, बल्कि रक्षा और डिजिटल क्षेत्र में एक ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला है जिसने सीधे तौर पर ड्रैगन यानी चीन की विस्तारवादी नीतियों की नींद उड़ा दी है। रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले भारत-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में सुरक्षा समीकरणों को मजबूत करने के इरादे से भारत और इंडोनेशिया अब बेहद करीब आ चुके हैं। जकार्ता में हुई उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बैठकों के बाद यह साफ हो गया है कि दोनों देश आने वाले दिनों में मिलकर समंदर से लेकर साइबर स्पेस तक एक अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार करने जा रहे हैं।

डिजिटल और डिफेंस की ‘जुगलबंदी’
इस ऐतिहासिक दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण रक्षा सहयोग और डिजिटल साझेदारी का आपस में जुड़ना रहा है। भारत और इंडोनेशिया ने मिलकर यह फैसला किया है कि वे पारंपरिक सैन्य अभ्यास से कई कदम आगे बढ़कर अब आधुनिक युग की चुनौतियों का सामना करेंगे। इसके तहत दोनों देशों के बीच डिजिटल डिफेंस और साइबर सुरक्षा (Cybersecurity) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। आज के समय में जब सीमा पर युद्ध से ज्यादा खतरनाक साइबर हमले और डेटा चोरी की घटनाएं बन चुकी हैं, भारत अपनी उन्नत आईटी और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता इंडोनेशिया के साथ साझा करने जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य इंडोनेशिया के महत्वपूर्ण सरकारी बुनियादी ढांचे (Critical Infrastructure) को किसी भी संभावित विदेशी हैकिंग या डिजिटल घुसपैठ से सुरक्षित रखना है। जानकारों का मानना है कि यह साझेदारी इंडोनेशिया को डिजिटल मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाने में मील का पत्थर साबित होगी।

मलक्का जलडमरूमध्य: चीन की दुखती रग पर हाथ
प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा का सबसे गहरा रणनीतिक असर समुद्री सुरक्षा पर पड़ने वाला है। इंडोनेशिया के साथ मजबूत रक्षा संबंधों का सीधा मतलब है ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ (Strait of Malacca) पर भारत की पकड़ का और मजबूत होना। यह वह समुद्री रास्ता है जहाँ से चीन का 80% से ज्यादा तेल आयात और व्यापार गुजरता है। भारत और इंडोनेशिया ने साझा पेट्रोलिंग (Joint Patrols) को और अधिक सघन बनाने तथा समुद्री खुफिया जानकारी (Maritime Domain Awareness) को रीयल-टाइम में साझा करने पर सहमति जताई है। इसके जरिए दोनों देश हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के मुहाने पर हर संदिग्ध गतिविधि, विशेषकर चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की आवाजाही पर पैनी नजर रख सकेंगे। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने बिना कोई युद्ध लड़े इंडोनेशिया के साथ मिलकर चीन की इस ‘दुखती रग’ को अपने नियंत्रण में ले लिया है।

ब्रह्मोस और सैन्य तकनीक पर टिकी नजरें
इस यात्रा के दौरान रक्षा उत्पादन (Defense Manufacturing) के क्षेत्र में भी बड़े कदम उठाए गए हैं। इंडोनेशिया लंबे समय से भारत की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ (BrahMos) को खरीदने में दिलचस्पी दिखाता रहा है। फिलीपींस के बाद अब इंडोनेशिया भी इस मिसाइल प्रणाली को अपनी तटीय सुरक्षा के लिए तैनात करना चाहता है। दोनों देशों के बीच सैन्य अधिकारियों के आदान-प्रदान, संयुक्त नौसैनिक और हवाई अभ्यासों की संख्या बढ़ाने और रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन को लेकर गंभीर चर्चा हुई है। भारत ने इंडोनेशिया को आश्वासन दिया है कि वह उसकी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार अत्याधुनिक सैन्य तकनीक और हल्के लड़ाकू विमान (LCA Tejas) जैसे विकल्प उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह तैयार है।

साझा संस्कृति से साझा सुरक्षा का सफर
जकार्ता में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए और इंडोनेशियाई नेतृत्व से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने बार-बार दोनों देशों के हजारों साल पुराने सांस्कृतिक संबंधों का जिक्र किया। रामायण और साझा इतिहास के धागों से जुड़े इन दोनों देशों ने अब अपनी इस ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया है। यह यात्रा केवल समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब आसियान (ASEAN) क्षेत्र में केवल एक मूकदर्शक या व्यापारिक भागीदार बनकर नहीं रहेगा, बल्कि वह एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (सुरक्षा प्रदाता) की भूमिका निभाने के लिए अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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