
संवाद 24 बेंगलुरु। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित ‘आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर’ में बीते दिनों ज्ञान और राष्ट्र-निर्माण का एक अनूठा संगम देखने को मिला। भारतीय शिक्षण मंडल (BSM) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के ओजस्वी और दिशा-निदेशक संबोधन के साथ हुआ। “एनईपी 2020 का क्रियान्वयन: भारतीय ज्ञान प्रणालियों का एकीकरण” विषय पर केंद्रित इस महाकुंभ ने देश के शिक्षाविदों को एक नई ऊर्जा से भर दिया है।
अपने भाषण में डॉ. मोहन भागवत ने भारत के वैश्विक उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हुए एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसने न केवल सम्मेलन में मौजूद बुद्धिजीवियों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी पुनर्परिभाषित कर दिया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि आज की दुनिया जिन गंभीर संकटों और चुनौतियों से जूझ रही है, उनका समाधान किसी एकांगी सोच में नहीं, बल्कि भारत की समग्र और एकीकृत दृष्टि में निहित है।

वैश्विक संकट और भारत की पूर्ण दृष्टि: क्यों अधूरी महाशक्तियों को है आज भारत की जरूरत?
सरसंघचालक ने वर्तमान वैश्विक व्यवस्थाओं और वैचारिक ढांचों की सीमाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पश्चिमी या अन्य प्रचलित वैश्विक दृष्टिकोण आंशिक और टुकड़ों में बंटे हुए हैं। ये फ्रेमवर्क जीवन को समग्रता में देखने में विफल रहे हैं, यही वजह है कि वे समकालीन युग की जटिल चुनौतियों का पूर्ण समाधान नहीं खोज पा रहे हैं। उन्होंने कहा “दुनिया को पूर्णता प्रदान करने के लिए, हमारी संपूर्ण दृष्टि के आधार पर, विश्व के सभी जीवों के कल्याण के लिए, भारत को सुना जाना अत्यंत आवश्यक है। यह अपरिहार्य है।”
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि जब हम ‘विश्व को पूर्णता देने’ की बात करते हैं, तो यह कोई अहंकार नहीं, बल्कि हमारा वैश्विक कर्तव्य है। भारतीय शिक्षण मंडल का कार्य केवल शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करना भर नहीं है, बल्कि यह एक महान सभ्यतागत मिशन (Civilizational Mission) में सक्रिय भागीदारी है।
अनेकांतवाद और शास्त्रार्थ: ‘हम दूसरों को गलत नहीं मानते, बल्कि सबको समेटते हैं‘
भारतीय दर्शन की महानता को समझाते हुए डॉ. मोहन भागवत ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील बिंदु पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण कभी भी दूसरे विचारों या संस्कृतियों को ‘गलत’ या ‘खारिज’ करने योग्य नहीं मानता। दुनिया के अलग-अलग समाजों ने अपने जीवन के अनुभवों से अपने-अपने दृष्टिकोण विकसित किए हैं और उन सभी अनुभवों की अपनी एक प्रासंगिकता और वैधता है।
भारत की इस अनूठी विशेषता को उन्होंने ‘अनेकांतवाद’ के सिद्धांत से जोड़ा। भारतीय दृष्टि विविधता को गले लगाती है क्योंकि हमारी संस्कृति मानती है कि ‘सत्य’ इतना असीम और विशाल है कि इसे किसी एक दृष्टिकोण या विचार की सीमा में पूरी तरह नहीं बांधा जा सकता।
कुतर्क नहीं, संवाद की परंपरा
भारत का मार्ग विवाद या कुतर्क का नहीं है, बल्कि ‘शास्त्रार्थ’ (विद्वत्तापूर्ण संवाद) का है।
तत्व ग्रहण करना: शास्त्रार्थ का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि हर दृष्टिकोण के सर्वोत्तम सार (Essence) को ग्रहण करना है।
अपूर्ण से पूर्ण की ओर: जहां दुनिया के अन्य विचार एकांगी होने के कारण अधूरे रह जाते हैं, वहीं भारतीय दृष्टि सबको समाहित कर पूर्ण बनती है। इसी पूर्णता के अहसास के लिए आज दुनिया को भारत की बात सुननी ही होगी।
शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं: भारतीय शिक्षण मंडल का महान सभ्यतागत मिशन
सम्मेलन के दौरान भारतीय शिक्षण मंडल (BSM) के कार्यों की सराहना करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि बीएसएम का काम कोई छोटा या सीमित उपक्रम नहीं है। यह भारत की उस व्यापक और एकीकृत शिक्षा दृष्टि पर आधारित है, जो मनुष्य का निर्माण समग्रता में करती है।
आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल भौतिक आजीविका का साधन या हर चीज को पैसे के तराजू में तोलने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। भारतीय शिक्षण मंडल एक ऐसे समग्र दृष्टिकोण पर काम कर रहा है जो मनुष्य के भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक सभी पक्षों का विकास करे। यही वह मूल्य-आधारित शिक्षा है जिसकी परिकल्पना राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में की गई है और जिसे जमीनी स्तर पर उतारने का जिम्मा बीएसएम ने उठाया है।
राजनीति से कोसों दूर: स्वतंत्रता आंदोलन के दिग्गजों की विरासत को संजोए बीएसएम
एक अत्यंत महत्वपूर्ण संगठनात्मक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि भारतीय शिक्षण मंडल खुद को सभी राजनीतिक दलों और उनकी राजनीतिक मजबूरियों से पूरी तरह स्वतंत्र रखता है। उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम का स्मरण कराते हुए राष्ट्र को याद दिलाया कि कैसे आजादी के आंदोलन के समय भी महान दूरदर्शियों और दिग्गजों ने राष्ट्र-निर्माण और शिक्षा के कार्यों को राजनैतिक संगठनों से बिल्कुल अलग रखा था।
उनका मानना था कि “ऐसा पवित्र और बुनियादी कार्य किसी राजनैतिक दल के साथ जुड़कर ठीक से नहीं किया जा सकता।” यह वैचारिक स्वतंत्रता, भारतीय मूल्यों के प्रति गहरी निष्ठा और ‘विश्व पूर्णता’ (Vishwa Poornatha) का यही महान संकल्प ही भारतीय शिक्षण मंडल को देश के अन्य सभी संस्थानों से अलग और विशिष्ट बनाता है।
डिजिटल युग में भारतीय ज्ञान का शंखनाद: डॉ. भागवत ने लॉन्च की नई वेबसाइट
इस ऐतिहासिक अवसर को और अधिक प्रभावी बनाते हुए डॉ. मोहन भागवत ने भारतीय शिक्षण मंडल की नवीन आधिकारिक वेबसाइट का विमोचन भी किया। यह कदम बीएसएम के डिजिटल आउटरीच (तकनीकी प्रसार) को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।
डिजिटल पहल के मुख्य लाभ
वैश्विक पहुंच – देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और नागरिकों तक सीधी पहुंच।
ज्ञान का सरलीकरण – भारतीय शिक्षा प्रणाली और एनईपी 2020 के व्यावहारिक सूत्रों की उपलब्धता।
संसाधन केंद्र – प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर शोध पत्रों का संग्रह।
इस वेबसाइट के माध्यम से भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा के विजन को देश के कोने-कोने में बैठे शिक्षकों, छात्रों और प्रबुद्ध नागरिकों के लिए बेहद सुलभ बना दिया गया है।
देशभर से जुटे 380 दिग्गज: शिक्षा जगत के शीर्ष नेतृत्व की गरिमामयी उपस्थिति
इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें देश के कोने-कोने से आए लगभग 380 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इन प्रतिनिधियों में देश के जाने-माने शिक्षाविद, विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रोफेसर, शोधकर्ता, विद्वान और शिक्षा क्षेत्र के नीति-निर्धारक शामिल थे।
समापन सत्र के दौरान मंच पर भारतीय शिक्षण मंडल के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद जोशी और महासचिव डॉ. भरतशरण सिंह भी उपस्थित रहे, जिन्होंने सम्मेलन के एजेंडे और आगामी कार्ययोजना की रूपरेखा सामने रखी। तीन दिनों तक चले इस मंथन में विभिन्न सत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) को व्यावहारिक रूप से लागू करने के रोडमैप पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
भारतीय शिक्षण मंडल के इस अत्यंत महत्वपूर्ण त्रि-दिवसीय सम्मेलन का भव्य उद्घाटन कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत द्वारा किया गया था। अपने उद्घाटन भाषण में राज्यपाल ने शिक्षा में भारतीय मूल्यों और लोकाचार (Ethos) को समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया था।
इस सम्मेलन ने पूरे भारत से आए बीएसएम के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को एक ऐसा जीवंत मंच प्रदान किया, जहां उन्होंने अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। सभी ने एक सुर में संकल्प लिया कि वे भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए जमीनी स्तर पर पूरी शक्ति से कार्य करेंगे। बेंगलुरु से निकला यह वैचारिक संदेश आने वाले दिनों में देश की शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा बदलने में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा, इसमें कोई संशय नहीं है।






