
संवाद 24, करमाळा (सोलापुर)।
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भूमिका को निर्णायक बताते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि यदि देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान दिलाना है, तो केवल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) को ही उत्कृष्ट बनाने से काम नहीं चलेगा। जमीनी स्तर पर उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) को भी आधुनिक, सक्षम और रोजगारोन्मुख बनाना होगा।
उनका कहना था कि आर्थिक विकास तभी व्यापक और स्थायी बन सकता है, जब उसका लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे। रोजगार और स्वरोजगार के अवसर महानगरों तक सीमित रहने के बजाय गांवों, कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचें, ताकि विकास का लाभ देश के अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हो सके। यदि ग्रामीण भारत आर्थिक गतिविधियों का मजबूत केंद्र बनता है, तभी विकसित भारत का संकल्प वास्तविक अर्थों में साकार होगा।
वे महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के करमाळा स्थित शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के नामकरण समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर संस्थान का नाम संघ के पूर्व सह सरकार्यवाह श्रद्धेय मदनदास जी देवी की स्मृति में ‘स्व. मदनदास देवी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान’ रखा गया। समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वीडियो संदेश के माध्यम से शुभकामनाएं दीं, जबकि राज्य के कौशल विकास मंत्री मंगलप्रभात लोढा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

आर्थिक प्रगति का दूसरा मजबूत स्तंभ हैं ITI
अपने उद्बोधन में सुनील आंबेकर ने शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान संरचना पर विचार रखते हुए कहा कि लंबे समय तक देश में उच्च शिक्षा और डिग्री आधारित शिक्षा को अधिक महत्व मिला, जबकि कौशल आधारित प्रशिक्षण अपेक्षाकृत पीछे रह गया। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों शिक्षित युवाओं के पास डिग्रियां तो हैं, लेकिन उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक कौशल का अभाव दिखाई देता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि IIT और ITI की तुलना प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर पूरक संस्थानों के रूप में की जानी चाहिए। एक ओर IIT देश को वैज्ञानिक, शोधकर्ता और उच्च तकनीकी विशेषज्ञ प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर ITI ऐसे दक्ष तकनीशियन तैयार करते हैं जिनके बिना उद्योगों, निर्माण परियोजनाओं, ऊर्जा क्षेत्र, परिवहन व्यवस्था और विनिर्माण इकाइयों का संचालन संभव नहीं है। भारत को यदि वैश्विक औद्योगिक शक्ति बनना है तो दोनों प्रकार की संस्थाओं को समान महत्व देना होगा।
गांवों तक पहुंचे उद्योग और रोजगार
ग्रामीण भारत को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल देते हुए आंबेकर ने कहा कि केवल महानगरों का विस्तार किसी राष्ट्र की समृद्धि का प्रमाण नहीं हो सकता। यदि गांवों से लगातार पलायन होता रहेगा और रोजगार के अवसर केवल बड़े शहरों तक सीमित रहेंगे, तो आर्थिक असंतुलन बढ़ेगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि छोटे, मध्यम और सूक्ष्म उद्योगों का व्यापक नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्रों तक विकसित किया जाए। स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योग स्थापित हों, कृषि आधारित प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा मिले तथा युवाओं को अपने ही क्षेत्र में कौशल प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराया जाए। इससे न केवल पलायन रुकेगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी सशक्त होगी। आंबेकर के अनुसार भारत की वास्तविक शक्ति उसके गांवों में निहित है। ग्रामीण क्षेत्रों को उत्पादन, उद्यमिता और रोजगार का केंद्र बनाकर ही देश आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकता है।
बदलती तकनीक के साथ बदलना होगा ITI का स्वरूप
तकनीकी परिवर्तन की तीव्र गति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज उद्योगों की आवश्यकताएं पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में आईटीआई संस्थानों का पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण पद्धति और प्रयोगशालाएं भी समय के अनुरूप विकसित होना आवश्यक है।
उनके अनुसार पारंपरिक ट्रेड आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अब उनके साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, स्मार्ट मशीनिंग, ड्रोन तकनीक और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि आईटीआई उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालते हैं तो भारत वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।
केवल तकनीक नहीं, चरित्र भी बने विकास का आधार
आंबेकर ने अपने संबोधन को केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति का मूल्यांकन केवल सकल घरेलू उत्पाद या आर्थिक आंकड़ों से नहीं किया जा सकता।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया के अनेक विकसित देशों ने आर्थिक समृद्धि तो हासिल कर ली है, लेकिन वहां सामाजिक ताना-बाना, पारिवारिक व्यवस्था और मानवीय मूल्यों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। भारत को इस दिशा में संतुलित विकास का मार्ग अपनाना होगा। उनके अनुसार तकनीकी प्रगति के साथ चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण समान रूप से आवश्यक है। तकनीक तभी सार्थक है जब उसका उपयोग मानवता और राष्ट्रहित की सेवा में किया जाए।
मदनदास जी का जीवन रहा प्रेरणा का स्रोत
श्रद्धेय मदनदास जी देवी का स्मरण करते हुए सुनील आंबेकर ने उन्हें संगठन निर्माण की परंपरा का अद्वितीय कार्यकर्ता बताया। उन्होंने कहा कि मदनदास जी ने अपने पूरे जीवन में कभी व्यक्तिगत प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की। उनका विश्वास था कि संगठन जितना मजबूत होगा, राष्ट्र उतना ही सशक्त बनेगा।
उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर कार्यकर्ताओं का निर्माण किया, विद्यार्थियों को राष्ट्रीय दृष्टि प्रदान की और अनेक ऐसे कार्य खड़े किए जिनका प्रभाव आज भी देश के सार्वजनिक जीवन में दिखाई देता है। आंबेकर ने कहा कि युवाओं को सकारात्मक दिशा देना, उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित करना और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जागृत करना उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य था।
विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार
मदनदास जी के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित करने पर उनका विशेष जोर रहता था। इसी सोच के कारण उन्होंने देशभर में विद्यार्थियों के बीच रचनात्मक संगठनात्मक कार्य को गति दी।
वैश्वीकरण के दौर में भी उन्होंने स्वदेशी चिंतन को प्रासंगिक बनाए रखा और युवाओं को यह समझाने का प्रयास किया कि आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय हित एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का आधार भी इसी प्रकार की राष्ट्रीय आर्थिक सोच में निहित है।
दूरदर्शी सोच का प्रमाण था राष्ट्रीय ITI सम्मेलन
आंबेकर ने याद दिलाया कि वर्ष 1989-90 में ही नागपुर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के माध्यम से राष्ट्रीय आईटीआई सम्मेलन आयोजित कराया गया था। उस समय कौशल विकास पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ भी नहीं हुआ था, लेकिन मदनदास जी ने भविष्य की आवश्यकताओं को समझते हुए आईटीआई संस्थानों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि करमाळा स्थित संस्थान का नामकरण केवल एक औपचारिक निर्णय नहीं, बल्कि उसी दूरदर्शी चिंतन को सम्मान देने का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने बताया राष्ट्र निर्माण का केंद्र
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने वीडियो संदेश में मदनदास जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकात्मता के लिए समर्पित रहा। विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में उनका योगदान उल्लेखनीय था।
मुख्यमंत्री के अनुसार आज के दौर में आईटीआई केवल तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान नहीं हैं, बल्कि ऐसे केंद्र हैं जहां राष्ट्र के लिए कुशल, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ मानव संसाधन तैयार होता है। विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में इन संस्थानों की भूमिका आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।
5,700 करोड़ रुपये से होगा आधुनिकीकरण
महाराष्ट्र के कौशल विकास मंत्री मंगलप्रभात लोढा ने जानकारी दी कि राज्य सरकार आईटीआई संस्थानों के व्यापक आधुनिकीकरण के लिए लगभग 5,700 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। इस योजना के अंतर्गत आधुनिक प्रयोगशालाएं, उन्नत मशीनें, डिजिटल प्रशिक्षण सुविधाएं तथा उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप नए पाठ्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि राज्य के आईटीआई संस्थानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधुनिक इलेक्ट्रिकल तकनीक तथा रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जा चुके हैं। अगले वर्ष पांच नए उन्नत पाठ्यक्रम भी जोड़े जाएंगे, जिससे विद्यार्थियों को बदलते औद्योगिक परिवेश के अनुरूप प्रशिक्षण मिल सके।
करमाळा में खुलेगी टाटा इंस्टीट्यूट की शाखा
समारोह के दौरान यह घोषणा भी की गई कि करमाळा आईटीआई में टाटा इंस्टीट्यूट की एक स्वतंत्र शाखा स्थापित की जाएगी। इससे स्थानीय विद्यार्थियों को उद्योगों से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार आने की संभावना है। यह पहल क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और स्थानीय रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विकसित भारत की आधारशिला है कौशल विकास
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यदि इस जनसांख्यिकीय शक्ति को गुणवत्तापूर्ण कौशल शिक्षा, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो भारत वैश्विक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नई पहचान बना सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, स्किल इंडिया मिशन, मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत-2047 जैसे राष्ट्रीय अभियानों की सफलता भी बड़े पैमाने पर कुशल मानव संसाधन पर निर्भर है। ऐसे में आईटीआई संस्थानों का सशक्तीकरण केवल शिक्षा क्षेत्र का सुधार नहीं, बल्कि देश की आर्थिक संरचना को मजबूत करने की दीर्घकालिक रणनीति है।
केवल नामकरण नहीं, एक व्यापक संदेश
करमाळा में आयोजित यह समारोह एक संस्थान के नामकरण से कहीं अधिक व्यापक महत्व रखता है। इसने यह संदेश दिया कि यदि भारत को आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी दृष्टि से संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो कौशल विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।
सुनील आंबेकर ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत का निर्माण केवल ऊंची इमारतों, बड़े उद्योगों और आधुनिक तकनीक से नहीं होगा, बल्कि तब होगा जब देश के गांवों तक रोजगार पहुंचेगा, उद्योगों का विस्तार होगा, आईटीआई आधुनिक बनेंगे और युवा कौशल, चरित्र तथा राष्ट्रभावना से युक्त होकर विकास यात्रा के सहभागी बनेंगे। यही विचार स्व. मदनदास देवी के जीवन का मूल संदेश था और यही करमाळा में आयोजित इस समारोह का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी बनकर सामने आया।






