फरीदाबाद में सिस्टम की नाकामी: जब मौत के बाद भी नहीं मिली एम्बुलेंस

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संवाद 24 हरियाणा। फरीदाबाद से सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। यहां एक महिला की मौत के बाद उसके परिजनों को शव घर ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस या शव वाहन नहीं मिला। मजबूरी में परिवार को शव को ठेले पर रखकर घर तक ले जाना पड़ा। यह दृश्य न सिर्फ दर्दनाक था, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करने वाला भी था।

इलाज के दौरान ही टूट चुका था गरीब परिवार
मृत महिला लंबे समय से टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थी। बीके सिविल अस्पताल में उसका इलाज चल रहा था और हालत बिगड़ने पर उसे दिल्ली के बड़े अस्पतालों में भी दिखाया गया। इलाज में परिवार की जमा-पूंजी खर्च हो चुकी थी। आर्थिक तंगी के बीच परिवार किसी तरह इलाज जारी रखे हुए था, लेकिन किसे पता था कि मौत के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं होगा।

मौत के बाद शुरू हुआ दूसरा संघर्ष
महिला की अस्पताल में मौत होने के बाद परिजनों ने शव को घर ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की। अस्पताल प्रशासन से लेकर इमरजेंसी सेवाओं तक परिवार ने गुहार लगाई, लेकिन हर जगह से एक ही जवाब मिला— फिलहाल कोई सरकारी एम्बुलेंस या शव वाहन उपलब्ध नहीं है।

घंटों इंतज़ार, लेकिन मदद नहीं
परिजन अस्पताल परिसर में लंबे समय तक इंतज़ार करते रहे। उम्मीद थी कि शायद कहीं से व्यवस्था हो जाए, लेकिन समय बीतता गया और कोई समाधान नहीं निकला। अस्पताल में मौजूद लोग भी इस स्थिति को देखकर असहज थे, लेकिन व्यवस्था के नाम पर सब बेबस नजर आए।

प्राइवेट वाहन बना आर्थिक बोझ
परिवार के सामने विकल्प के तौर पर प्राइवेट शव वाहन था, लेकिन उसका किराया गरीब मजदूर परिवार की पहुंच से बाहर था। कुछ किलोमीटर की दूरी के लिए सैकड़ों रुपये मांगे जा रहे थे। इलाज में पहले ही कर्ज में डूब चुका परिवार यह खर्च उठाने की स्थिति में नहीं था।

ठेले पर शव, इंसानियत हुई शर्मसार
आखिरकार परिवार ने वही ठेला निकाला, जिससे वे रोज़ी-रोटी कमाते हैं। उसी ठेले पर शव को रखकर परिजन अस्पताल से अपने घर की ओर निकल पड़े। रास्ते में यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। यह केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं थी, बल्कि पूरे समाज और प्रशासन के लिए शर्म का विषय था।

अस्पताल प्रशासन का पक्ष
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि सामान्य एम्बुलेंस सेवाओं में शव वाहन की व्यवस्था अलग प्रक्रिया से होती है। शव वाहन रेड क्रॉस या अन्य माध्यमों से उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन उस दिन संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाए। प्रशासन ने मामले की जांच कराने और व्यवस्था सुधारने की बात कही है।

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा सवाल
यह घटना साफ दिखाती है कि कागजों पर मौजूद योजनाएं ज़मीनी हकीकत से कितनी दूर हैं। सरकार भले ही 24 घंटे एम्बुलेंस सेवा का दावा करे, लेकिन जरूरत के समय अगर गरीब को मदद न मिले, तो ऐसे दावे खोखले नजर आते हैं।

पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी घटनाएं
यह पहला मामला नहीं है जब शव वाहन या एम्बुलेंस की कमी के कारण परिजनों को अपमानजनक हालात का सामना करना पड़ा हो। देश के कई हिस्सों से पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जो सिस्टम में स्थायी सुधार की मांग करती हैं।

इंसान की आखिरी यात्रा का सम्मान जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में केवल इलाज ही नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद की प्रक्रिया भी उतनी ही संवेदनशील होती है। शव वाहन की उपलब्धता हर सरकारी अस्पताल में सुनिश्चित होनी चाहिए, ताकि किसी भी परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।

प्रशासन के लिए चेतावनी
फरीदाबाद की यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि अगर समय रहते व्यवस्थाओं को नहीं सुधारा गया, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। एक सभ्य समाज की पहचान यही है कि वह अपने नागरिक को आखिरी समय में भी सम्मान दे।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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