अब भारत में दवा अनुसंधान के नियम बदले: फार्मा कंपनियों को लाइसेंस की जरूरत नहीं -90 दिनों तक बचत और बड़े बदलाव
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संवाद 24 नई दिल्ली। देश के फार्मा उद्योग के लिए एक बड़ा बदलाव आ गया है। केंद्र सरकार ने नए औषधि और नैदानिक परीक्षण (एनडीसीटी) नियम, 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन लागू किए हैं, जिससे फार्मा कंपनियों को अनुसंधान-संबंधित परीक्षण लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त हो गई है। अब कंपनियां शोध उद्देश्यों के लिए दवाओं का सीमित निर्माण बिना लाइसेंस के कर सकेंगी — बशर्ते वे पहले से ऑनलाइन सूचना दें, जिससे नियम सरल और शोध की गति तेज हो जाएगी।
नियमों में बदलाव का मकसद — अनुसंधान को प्रोत्साहन और बोझ कम करना
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया है कि यह बदलाव मुख्य रूप से नियामक बोझ को कम करने और Ease of Doing Business (व्यापार सुगमता) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है। लंबे समय से फार्मा उद्योग शिकायत करता रहा है कि अनुसंधान-पूर्व लाइसेंसिंग प्रक्रिया जटिल और समय-खोरी वाली थी। पुराने नियमों के तहत परीक्षण लाइसेंस के लिए औसतन 90 दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, जिससे नवोन्मेष और शोध में देरी होती थी। अब यह लाइसेंसिंग बाधा हटाकर “पूर्व सूचना आधारित तंत्र” लागू कर दिया गया है, जिसमें कंपनियों को केवल ऑनलाइन सूचना द्वारा अपना अनुसंधान शुरू करने की अनुमति होगी — इससे औषधि विकास प्रक्रिया में कम से कम 90 दिनों की बचत होने की उम्मीद है।
कौन से मामलों में नियम लागू होंगे?
इस संशोधित तंत्र का लाभ मुख्यतः उन मामलों में मिलेगा जहां दवाओं का गैर-व्यावसायिक निर्माण, परीक्षण, विश्लेषण या शोध किया जा रहा हो। उदाहरण के तौर पर, जब कंपनियां किसी नई दवा के प्रारंभिक चरणों में काम कर रही हों, तब उन्हें अब अलग लाइसेंस प्राप्त करने की जरूरत नहीं होगी — बस पहले से सूचना देना पर्याप्त माना जाएगा। हालाँकि कुछ उच्च-जोखिम वाली दवाएं — जैसे साइटोटॉक्सिक दवाएं, नशीले पदार्थ व मनोरोगी दवाएं — अभी भी परीक्षण लाइसेंस के दायरे में रहेंगे, ताकि उपयोग और सुरक्षा मानकों का नियंत्रण बना रहे।
शोध-प्रक्रिया में तेज़ी और नवाचार को बढ़ावा
विशेषज्ञों के अनुसार, पहले लाइसेंस के इंतजार के कारण बहुत-सी कंपनियों को अनुसंधान शुरू करने में विलंब होता था, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मुश्किलें आती थीं। अब इस बाधा के हटने से भारतीय फार्मा कंपनियों को रिकॉर्ड समय में शोध पूरा करने और नई दवाओं को विकसित करने में मदद मिलेगी। इसका व्यापक प्रभाव यह होगा कि देश में नैदानिक परीक्षण, बीए/बीई अध्ययन जैसे महत्वपूर्ण शोध कार्य पहले से कहीं तेजी से शुरू हो सकेंगे। इन बदलावों से यह क्षेत्र और अधिक प्रतिस्पर्धी और निवेश-आकर्षक बनेगा।
प्रक्रिया में पारदर्शिता और तकनीकी सहायता
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह भी कहा है कि संशोधनों के सुचारू कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली और सुगम पोर्टल पर समर्पित ऑनलाइन मॉड्यूल उपलब्ध कराया जाएगा। इससे उद्योग को आवश्यक सूचना प्रस्तुत करना और प्रक्रियाओं को पारदर्शी ढंग से पूरा करना आसान होगा। इस तकनीकी सहायता से कंपनियों को न केवल प्रक्रियाओं के बारे में स्पष्टता मिलेगी, बल्कि नियामक निगरानी की क्षमता भी बढ़ेगी, जिससे गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित होगा।
सरकार की प्रतिबद्धता — वैश्विक मानकों की दिशा में कदम
सरकार का कहना है कि यह सिर्फ एक कदम नहीं, बल्कि फार्मा उद्योग में नियामक सुधारों की एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका मुख्य लक्ष्य भारत को वैश्विक स्तर पर दवा अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में एक विश्व-स्तरीय केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इस नीति से घरेलू कंपनियों को उम्मीद है कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आसानी से प्रतिस्पर्धा कर पाएँगे, और नई दवाओं के लिए वैश्विक निवेश को आकर्षित करेगा।
विशेषज्ञों का सुझाव
विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव फार्मा-अनुसंधान की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके साथ सख्त निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण भी जरूरी है ताकि मरीजों की सुरक्षा में कोई समझौता न हो। नए नियम के लागू होने के साथ ही, विशेषज्ञों ने कहा है कि संबंधित प्राधिकरणों को नियमों के अनुपालन और प्रभाव का मूल्यांकन समय-समय पर करना चाहिए। कुल मिलाकर, यह नई पहल भारतीय फार्मा क्षेत्र के लिए अनुसंधान के दरवाज़े खोलने वाली और विकास-उन्मुख मजबूत रणनीति प्रतीत होती है — जहाँ समय, संसाधन और नियामक बोझ को कम करके उद्योग का विस्तार और नवाचार संभव हो सके।






