गर्दन की नस से बैलून डालकर फुलाया जा रहा दिल का वाल्व, बिना सर्जरी सुरक्षित इलाज प्रदेश में LPS कार्डियोलॉजी बना मिसाल
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर में हृदय रोगियों के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धि सामने आई है। अब दिल के माइट्रल वाल्व को खोलने के लिए जांघ की नस के बजाय गर्दन की नस (जुगुलर वेन) के रास्ते बैलून डालकर वाल्व फुलाया जा रहा है। इस अत्याधुनिक तकनीक से मरीज को ओपन हार्ट सर्जरी से राहत मिल रही है, साथ ही दर्द, रक्तस्राव और लंबी रिकवरी की समस्या भी नहीं होती।
यह प्रक्रिया ट्रांसजुगुलर बलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी कहलाती है, जिसे प्रदेश में फिलहाल एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ही अपनाया जा रहा है। इस नवाचार से जुड़े शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल जर्नल ऑफ अमेरिकन कार्डियोलॉजी ने वर्ष 2025 में प्रकाशित किया है, जिससे इस विधि की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को वैश्विक मान्यता मिली है।
जिन रोगियों के लिए वरदान बनी यह तकनीक
गर्दन की नस के माध्यम से की जाने वाली यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन रोगियों के लिए राहत लेकर आई है, जिनकी जांघ की नसों में जन्मजात विकृति या अत्यधिक पतलापन होता है। ऐसे मामलों में पारंपरिक तरीके से बैलून डालना जोखिम भरा हो सकता है और जान को खतरा भी रहता है।
इसके अलावा स्पाइनल कॉर्ड से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह विधि सुरक्षित मानी जा रही है। जांघ के रास्ते प्रक्रिया में जहां जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं, वहीं ट्रांसजुगुलर तकनीक में जोखिम काफी कम रहता है।
प्रदेश में सिर्फ LPS कार्डियोलॉजी में उपलब्ध
एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिन्हा ने बताया कि बीते दो वर्षों में 50 रोगियों की ट्रांसजुगुलर बलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी सफलतापूर्वक की जा चुकी है। इनमें से 18 रोगियों के डाटा पर आधारित शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि देश में अभी केवल चार-पांच बड़े शहरों में ही यह तकनीक अपनाई जा रही है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह सुविधा सिर्फ एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में उपलब्ध है।
इस विधि के प्रमुख फायदे
यह तकनीक उन मरीजों के लिए सर्वोत्तम विकल्प है, जिनकी पैर की नसों में रुकावट या जन्मजात विकृति होती है।
गर्दन की नस से माइट्रल वाल्व तक पहुंच का रास्ता अधिक सीधा होता है, जिससे प्रक्रिया तेज और सरल हो जाती है।
गंभीर काइफोस्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी के अत्यधिक टेढ़ेपन) वाले मरीजों में, जहां पारंपरिक बीएमवी संभव नहीं होती, वहां यह विधि कारगर साबित होती है।
पैर की बजाय गर्दन के रास्ते प्रक्रिया होने से मरीज जल्द ही चलने-फिरने लगता है और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि कम हो जाती है।
यह तकनीक एक साथ माइट्रल और ट्राइकसपिड वाल्व की मरम्मत में भी प्रभावी मानी जाती है।
चिकित्सा क्षेत्र में नया आयाम
ट्रांसजुगुलर बलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी ने हृदय रोगियों के इलाज को अधिक सुरक्षित, सरल और प्रभावी बना दिया है। कानपुर का एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट इस विधि को अपनाकर न केवल प्रदेश, बल्कि देश के चिकित्सा मानचित्र पर भी नई पहचान बना रहा है।






