
संवाद 24 नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वरूप और उसकी वैचारिक यात्रा को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आरएसएस बदला नहीं है, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होकर समाज के सामने आया है। उन्होंने कहा कि संगठन की मूल आत्मा और विचार वही हैं, केवल उसका विस्तार और अभिव्यक्ति समयानुसार हुई है।
संघ प्रमुख यह बात रविवार को आरएसएस कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही। यह आयोजन संघ की शताब्दी यात्रा पर आधारित आगामी फिल्म शतक के गीत संग्रह के विमोचन के अवसर पर हुआ था।
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि जब कोई संगठन लंबी यात्रा तय करता है तो उसका स्वरूप विकसित होता है, जिससे बाहर से देखने वालों को बदलाव प्रतीत होता है। उन्होंने इसे बीज और वृक्ष के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि बीज से अंकुर और फिर फल-फूलों से लदा वृक्ष भले ही अलग दिखे, लेकिन उसकी मूल पहचान वही रहती है।
संघ प्रमुख ने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन और व्यक्तित्व पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि संघ और ‘डॉक्टर साहब’ एक-दूसरे के पर्याय हैं। भागवत ने बताया कि कम उम्र में माता-पिता को खोने के बावजूद हेडगेवार के व्यक्तित्व पर इसका नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा, बल्कि उनका मानसिक संतुलन और राष्ट्र के प्रति समर्पण और मजबूत हुआ।
भागवत ने कहा कि हेडगेवार का मानसिक बल और परिस्थितियों से जूझने की क्षमता असाधारण थी। उन्होंने यहां तक कहा कि डॉक्टर साहब का मनोविज्ञान शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है, क्योंकि इतने बड़े आघातों के बावजूद उनका व्यक्तित्व विचलित नहीं हुआ।
कार्यक्रम में फिल्म से जुड़े कलाकारों और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी भी रही। संघ प्रमुख के इस बयान को संगठन की विचारधारा, निरंतरता और विकास को लेकर एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो संघ के शताब्दी वर्ष के विमर्श को नई दिशा देता है।






