
संवाद 24 नई दिल्ली। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को मिले करारे झटके ने सिर्फ वाशिंगटन की सियासत ही नहीं हिलाई है, बल्कि पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। व्हाइट हाउस में सत्ता संभालने के बाद से ट्रंप ने दशकों पुरानी विदेश नीतियों को दरकिनार करते हुए आक्रामक फैसले लिए थे, जिससे उनके सहयोगी और विरोधी दोनों लगातार असहज महसूस कर रहे थे। अब संसद (कांग्रेस) में डेमोक्रेट्स की जोरदार वापसी के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ट्रंप की आक्रामक युद्ध नीति पर लगाम लगेगी या फिर बैकफुट पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति खुद को साबित करने के लिए संघर्ष को और हवा देंगे? इस राजनीतिक बदलाव का सीधा असर तेहरान से लेकर तेल अवीव और कीव तक दिखने की संभावना है।
ईरान का जश्न और नई रणनीति की तैयारी
मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बाद ईरान में एक तरह का सियासी उत्साह जरूर देखा जा रहा है, लेकिन तेहरान भी इस बात से भलीभांति वाकिफ है कि यह जश्न किसी स्थायी शांति की गारंटी नहीं है। ईरानी शीर्ष नेतृत्व का स्पष्ट मानना है कि अमेरिकी सत्ता के आंतरिक बदलाव से वाशिंगटन की बुनियादी विदेश नीति रातों-रात नहीं बदल जाती। तेहरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अमेरिकी चुनावों के नतीजों की मोहताज नहीं है। वह एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर संभावित सैन्य टकराव के लिए भी अपनी ताकत जुटा रहा है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का संघर्ष अब ट्रंप के लिए प्रतिष्ठा का बड़ा सवाल बन चुका है। उनके सामने दो ही रास्ते दिखाई दे रहे हैं – पहला यह कि वे किसी तरह सम्मानजनक समझौता करके खुद की कूटनीतिक जीत घोषित करें, या फिर अपनी साख बचाने के लिए सैन्य कार्रवाइयों को और तेज कर दें। चिंता की बात यह है कि राजनीतिक रूप से घिरे हुए राष्ट्रप्रमुख कई बार अपनी घरेलू कमजोरी छिपाने के लिए युद्धभूमि में ज्यादा आक्रामक फैसले लेने का जोखिम उठाते हैं।
अमेरिका-इजरायल गठजोड़ में एक युग का अंत?
इस चुनाव परिणाम का सबसे संवेदनशील और गहरा असर अमेरिका और इजरायल के दशकों पुराने रिश्तों पर पड़ सकता है। मध्यावधि चुनावों में मतदाताओं के बड़े वर्ग ने यह संदेश दिया है कि वे पश्चिम एशिया के अंतहीन युद्धों में अमेरिकी संसाधनों को झोंकने के पक्ष में नहीं हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि दोनों देशों के रिश्तों में अब एक ऐतिहासिक मोड़ आ चुका है। अमेरिकी संसद पर डेमोक्रेट्स के प्रभाव के चलते अब तेल अवीव को मिलने वाली बेलगाम सैन्य और वित्तीय सहायता पर सख्त शर्तें लग सकती हैं। यहां तक कि महत्वपूर्ण खुफिया जानकारियां साझा करने और बहुचर्चित ‘आयरन डोम’ जैसी आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों के संयुक्त विकास पर भी पुनर्विचार की नौबत आ सकती है। अमेरिका में जनता का एक बड़ा तबका यह महसूस करने लगा था कि नेतन्याहू प्रशासन अपने क्षेत्रीय हितों को साधने के लिए अमेरिका को युद्ध की आग में झोंक रहा है, जिसका सीधा खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम जनता को उठाना पड़ रहा है।
यूक्रेन और यूरोपीय संतुलन पर क्या होगा असर?
यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर भी नई सियासी हवाएं बहती दिख रही हैं। पिछले कुछ समय से ट्रंप प्रशासन लगातार कीव पर समझौता करने और शर्तों को स्वीकार करने का भारी दबाव बना रहा था, जिससे यूक्रेन और पश्चिमी यूरोपीय देशों में भारी निराशा थी। हालांकि, अब अमेरिकी संसद में शक्ति संतुलन बदलने से यूक्रेन को उम्मीद की नई किरण नजर आने लगी है। यूरोपीय सहयोगियों का मानना है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के मजबूत होने से अटलांटिक पार के रिश्तों में दोबारा भरोसा बहाल होगा और रूस के खिलाफ यूक्रेनी प्रतिरोध को जरूरी मदद मिलती रहेगी।
आगे की राह: शांति का रास्ता या नया टकराव?
कुल मिलाकर, अमेरिकी मतदाताओं ने घरेलू स्तर पर महंगाई और बाहरी मोर्चे पर सैन्य उलझनों से तंग आकर जो जनादेश दिया है, उसने ट्रंप प्रशासन के हाथ काफी हद तक बांध दिए हैं। तेल की बढ़ती कीमतें और पश्चिम एशिया की नाकेबंदी ने अमेरिकी जनमानस पर गहरा असर डाला था। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और निर्णायक होगा कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी नीतियों को लचीला बनाकर वैश्विक शांति की राह चुनते हैं, या फिर संसद और व्हाइट हाउस के बीच खींचतान से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया भंवर खड़ा होता है।






