प्रकृति का प्रहार या मानवीय भूल? नेपाल में प्रलयंकारी सैलाब ने खोली अनियोजित विकास की पोल, सरकार ला रही कड़े नियम

संवाद 24 नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के उफान ने जिस कदर तबाही मचाई है, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। 26 अगस्त को आए भीषण सैलाब और भूस्खलन के तांडव को अब सिर्फ एक सामान्य ‘प्राकृतिक आपदा’ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस विध्वंस की तह में जाने पर यह साफ हो रहा है कि पहाड़ों का सीना चीरकर किया गया अनियोजित विकास और जलस्रोतों के साथ छेड़छाड़ इस महाविनाश का मुख्य कारण बने हैं। अब इस जमीनी हकीकत को नेपाल सरकार की कैबिनेट ने भी स्वीकार कर लिया है और भविष्य में इस तरह की विभीषिका से बचने के लिए नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में निर्माण के नियमों को सख्त करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

प्रकृति की सीमा में दखल पड़ा भारी
रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और गोरखा जिलों में पानी के तेज बहाव ने बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। कैबिनेट स्तर पर हुई उच्चस्तरीय बैठकों में राहत और बचाव कार्यों के साथ-साथ इस बात पर गहन मंथन हुआ कि आखिर हर साल तबाही का पैमाना इतना भयावह क्यों होता जा रहा है? विशेषज्ञों और सरकार का मानना है कि धरती, नदियां और ऊंचे पर्वत नेपाल की मूल पहचान हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में नियमों को ताक पर रखकर प्राकृतिक झीलों, सहायक जलधाराओं और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में धड़ल्ले से कंक्रीट का जाल बिछा दिया गया। पानी का रास्ता रोके जाने के कारण जब उफान आया, तो उसने सब कुछ लील लिया। अब प्रशासन ऐसे सभी अनियंत्रित और अवैध निर्माणों की पहचान करने में जुट गया है।

इंजीनियरों का दावा: सीधे बहाव क्षेत्र में बस्तियां बसाना बना काल
नेपाल के निर्माण एवं जल संसाधन से जुड़े वरिष्ठ अभियंताओं की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। जांच में सामने आया कि सर्वाधिक जनहानि और नुकसान उन बस्तियों में दर्ज किया गया जो या तो नदी के सीधे बहाव की दिशा में थीं या फिर डूब क्षेत्र के बेहद नजदीक खड़ी की गई थीं। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि जब इन पर्वतीय इलाकों में सड़कों, पुलों और छोटी पुलियाओं का निर्माण किया जा रहा था, तब जलप्रवाह के हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन को सिरे से दरकिनार कर दिया गया। किसी भी निर्माण परियोजना से पहले यह जांचना जरूरी था कि ढांचा नदी के मुख्य मार्ग या बाढ़ क्षेत्र में तो नहीं आ रहा। यदि पर्यावरण और जलधाराओं का सही वैज्ञानिक आकलन किया गया होता, तो रसुवा और नुवाकोट जैसे सामरिक व पर्यटन दृष्टि से अहम जिलों में जान-माल का इतना बड़ा नुकसान कभी नहीं होता।

कैलाश मानसरोवर मार्ग पर गहराया संकट, नए नियम जल्द
रसुवा और नुवाकोट वही मार्ग हैं जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों को तिब्बत स्थित पवित्र कैलाश मानसरोवर से जोड़ते हैं। इस तबाही से सड़कें बह जाने और पुल टूटने के कारण संपर्क पूरी तरह कट गया है। वर्तमान में नेपाल सरकार की प्राथमिकता मलबे में दबे शवों की पहचान कर परिजनों को सौंपने और बेघर हुए लोगों तक बुनियादी राहत सामग्री पहुंचाने की है। नेपाल के शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि अनियोजित निर्माण और प्रकृति से जबरदस्ती अब देश पर असहनीय बोझ बन चुकी है। सरकार जल्द ही एक नया नियामक ढांचा लागू करने जा रही है जिसके तहत नदियों, मौसमी नालों और भूस्खलन-संवेदनशील ढलानों के पास किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएंगे। जब तक निर्माण योजनाओं में नदियों के प्राकृतिक प्रवाह का सम्मान नहीं किया जाएगा, तब तक हिमालयी क्षेत्र को ऐसी त्रासदियों से बचाना असंभव रहेगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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