
संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर काले धन और आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (जीसस कॉलेज) में आयोजित 43वें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अपराध परिसंवाद (International Symposium on Economic Crime) के समापन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि दुनिया भर में सफेद किए जा रहे हर 100 रुपये में से जांच एजेंसियां केवल 1 रुपया ही वापस ला पा रही हैं। बाकी 99 प्रतिशत अवैध संपत्ति सिर्फ भाषणों, कानूनी फाइलों और रिपोर्टों में ही सिमट कर रह जाती है।
दुनिया की पूरी आबादी को लैपटॉप बांटने जितना काला धन
मुख्य न्यायाधीश ने मनी लॉन्ड्रिंग के भयावह पैमाने को एक सटीक उदाहरण के जरिए समझाया। उन्होंने कहा कि यदि वैश्विक स्तर पर जुटाए गए अनुमानों को सही माना जाए, तो दुनिया में हर साल इतनी बड़ी मात्रा में मनी लॉन्ड्रिंग होती है कि उससे पृथ्वी पर मौजूद 8 अरब से अधिक लोगों में से हर एक व्यक्ति को एक नया लैपटॉप खरीदा जा सकता है और फिर भी भारी रकम शेष बच जाएगी। जस्टिस सूर्यकांत ने अफसोस जताते हुए कहा कि काले धन के इस विशाल समुद्र में से, सबसे उदार अनुमानों के अनुसार भी, जांच एजेंसियां 1 प्रतिशत से भी कम अवैध संपत्ति को जब्त या वापस लाने में सफल हो पाती हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र और प्राचीन इतिहास का दिया हवाला
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि आर्थिक अपराध कोई आधुनिक आविष्कार नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी बुराई है जिसने आज डिजिटल और हाई-टेक रूप ले लिया है। उन्होंने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के यूनानी व्यापारी हेगेस्ट्रेटोस का उदाहरण दिया, जिसने बीमा के पैसे हड़पने के लिए अपना जहाज डुबोने की साजिश रची थी। इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन भारतीय दार्शनिक और कूटनीतिज्ञ कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का उल्लेख करते हुए कहा कि कौटिल्य ने सदियों पहले राजकोष से गबन के 40 अलग-अलग तरीके बताए थे और उनके समाधान के लिए ऑडिट, क्रॉस-वेरिफिकेशन और जब्ती के नियम तय किए थे। सीजेआई ने कहा, “अर्थशास्त्र में बताए गए चोरी के उन 40 तरीकों का मुकाबला करने के लिए आज दुनिया को अवैध संपत्ति को ट्रेस करने, फ्रीज करने और वापस लाने के 40 नए और प्रभावी तरीके विकसित करने होंगे।”
‘ट्रीटीज’ से तेज भागता है अपराध: प्रत्यर्पण पर अंतरराष्ट्रीय विफलता
सीजेआई ने दुनिया भर के देशों के बीच समन्वय की कमी पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA, 2002) और भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (FEOA, 2018) जैसे कड़े कानून बनाए हैं, लेकिन जब अपराधी सीमा पार भाग जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय संधियों की धीमी रफ्तार के कारण वास्तविक संपत्ति की वसूली ‘निराशाजनक’ रह जाती है। उन्होंने कहा कि आर्थिक अपराध और अवैध पैसा कानूनी संधियों और प्रत्यर्पण की प्रक्रियाओं से कहीं अधिक तेजी से गति करते हैं। जब तक एक देश का जब्ती आदेश दूसरे देश की कानूनी रजिस्ट्री में तुरंत लागू नहीं होता और खुफिया सूचनाओं पर धूल जमने के बजाय तत्काल खाते सीज नहीं किए जाते, तब तक वैश्विक स्तर पर अपराधियों को पकड़ना असंभव होगा।
‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर ठगी पर न्यायपालिका का कड़ा रुख
जस्टिस सूर्यकांत ने भारत में तेजी से बढ़ते ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटालों पर भी गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने बताया कि किस तरह साइबर अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर लोगों को डरा-धमका कर करोड़ों रुपये लूट रहे हैं। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने ऐसे मामलों में संसद के नए कानून बनाने का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए केंद्र व राज्यों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए और इस अपराध के लिए अलग से कठोर दंड तय करने की रूपरेखा तैयार करवाई।
कानून का राज और नागरिक अधिकार भी जरूरी
अपने संबोधन के अंत में सीजेआई ने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान कानून के तय नियमों (Due Process), निष्पक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जांच एजेंसियों को नसीहत दी कि मनी लॉन्ड्रिंग के कड़े प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और गिरफ्तारी के ठोस लिखित कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए। उन्होंने वैश्विक समुदाय से आह्वान किया कि इस सेमिनार की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि मंच से कितनी सुंदर तकरीरें दी गईं, बल्कि इससे तय होगी कि विभिन्न देश मिलकर अवैध रूप से लूटी गई संपत्ति को वास्तविक रूप से पीड़ितों को वापस दिलाने में कितने तत्पर हैं।






