वाशिंगटन में आतंक के नए ‘नेटवर्क’ पर महामंथन: अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने भारत ने क्यों उठाया सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा?

​संवाद 24 नई दिल्ली। वैश्विक आतंकवाद की बदलती प्रकृति और महाशक्तियों की नई रणनीतियों के बीच अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में एक बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक महामंथन हुआ। अमेरिका द्वारा वामपंथी उग्रवाद और राजनीतिक आतंकवाद के खिलाफ बुलाई गई इस आपातकालीन मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित दुनिया के 67 देशों ने हिस्सा लिया। आतंकवाद के इस नए वैश्विक स्वरूप पर चर्चा के दौरान जहां एक तरफ अमेरिका ने वामपंथी ताकतों के नेटवर्क को घेरने की वकालत की, वहीं दूसरी तरफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए सीमा पार आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने किया, क्योंकि विदेश मंत्री एस जयशंकर अपनी पूर्व निर्धारित यात्राओं के कारण इस बैठक में सीधे तौर पर शामिल नहीं हो सके।

​रूबियो का बड़ा दावा: क्या सच में कमजोर पड़ा जिहादी खतरा?
बैठक के मुख्य सत्र को संबोधित करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने दुनिया के सामने आतंकवाद के एक नए और जटिल नेटवर्क का खाका पेश किया। रूबियो ने सभी 67 देशों के प्रतिनिधियों से वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ एक साझा मंच पर एकजुट होने का पुरजोर आह्वान किया। उन्होंने आतंकवादियों के आधुनिक कामकाज के तरीकों को उजागर करते हुए कहा कि आज के समय में वामपंथी आतंकवादी किसी एक भौगोलिक सीमा में बंधकर काम नहीं कर रहे हैं। उनका नेटवर्क बेहद शातिर और बहुराष्ट्रीय हो चुका है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि आधुनिक आतंकवादी एक देश में बैठकर भारी-भरकम फंड यानी पैसा जुटाते हैं, दूसरे देश के डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करके अपने संचार और प्रोपेगैंडा को चलाते हैं, तीसरे देश के सुरक्षित ठिकानों में हथियारों और युद्ध की ट्रेनिंग लेते हैं, चौथे देश से नए युवाओं की भर्ती करते हैं और अंततः इन सभी संसाधनों का इस्तेमाल करके किसी पांचवें देश में एक बड़े आतंकी हमले को अंजाम देते हैं। ​इस गंभीर चेतावनी के साथ ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक ऐसा दावा भी किया जिसने वैश्विक सुरक्षा विश्लेषकों को चौंका दिया। रूबियो ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा अपनाई गई सख्त आतंकवाद-विरोधी नीतियों और कड़े सैन्य अभियानों के कारण दुनिया में जिहादी आतंकवाद का खतरा काफी हद तक कम हो गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिहादी खतरा पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन पहले की तुलना में इसकी तीव्रता और हमले करने की क्षमता काफी कमजोर हुई है। रूबियो के इस बयान पर कई सुरक्षा विशेषज्ञों ने हैरानी जताई, क्योंकि दुनिया के कई हिस्से आज भी इसी कट्टरपंथी विचारधारा के कारण लहूलुहान हो रहे हैं।

​भारत का दोटूक रुख: ‘आतंकवाद के हर रूप पर जीरो टॉलरेंस’
अमेरिकी विदेश मंत्री के दावों के बीच भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने भारत का रुख बेहद मजबूती और स्पष्टता के साथ मंच पर रखा। भारत ने अमेरिका के इस आकलन से पूरी तरह सहमति नहीं जताई कि जिहादी या सीमा पार का आतंकवाद अब कमजोर पड़ चुका है। भारतीय राजदूत ने वैश्विक समुदाय को याद दिलाया कि भारत खुद दशकों से वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से बेहद मजबूती के साथ लड़ रहा है और इस पर काफी हद तक काबू भी पाया गया है। लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि भारत आतंकवाद के किसी भी रूप में भेदभाव करने के पक्ष में नहीं है। चाहे वह वामपंथी उग्रवाद हो, कट्टरपंथी जिहाद हो या फिर भारत की सीमाओं के बाहर से संचालित होने वाला प्रायोजित आतंकवाद हो, भारत की नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की है। ​विनय क्वात्रा ने विशेष रूप से सीमा पार आतंकवाद और विदेशी धरती से पनप रहे अलगाववादी समूहों का मुद्दा उठाया, जो भारत की अखंडता को चुनौती देने का प्रयास करते हैं। भारतीय खेमे की चिंता यह थी कि अगर वैश्विक महाशक्तियां केवल वामपंथी खतरे पर ध्यान केंद्रित करेंगी, तो सीमा पार से भारत को निशाना बनाने वाले आतंकी संगठनों को एक तरह से ढील मिल जाएगी। भारत के लिए यह खतरा आज भी उतना ही वास्तविक और भयावह है, जिसका प्रमाण हाल के वर्षों में हुए कई आतंकी हमले हैं।

​67 देशों की बैठक में फूट और कूटनीतिक मतभेद
वाशिंगटन में बुलाई गई इस हाई-प्रोफाइल बैठक में दुनिया के कई प्रमुख देशों की कूटनीतिक बेरुखी भी खुलकर सामने आई। हालांकि कागजों पर इस बैठक में 67 देशों ने हिस्सा लिया, लेकिन इनमें से कई महत्वपूर्ण देशों ने अपने मुख्य मंत्रियों या शीर्ष अधिकारियों को भेजने के बजाय केवल जूनियर स्तर के राजनयिकों को भेजकर रस्म अदायगी की। राजनयिक गलियारों में चर्चा है कि कई देश वामपंथी उग्रवाद को इस्लामी कट्टरपंथ और दक्षिणपंथी आतंकवाद की तुलना में एक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया खतरा मान रहे थे, जिसके कारण उन्होंने इस बैठक को बहुत अधिक तवज्जो नहीं दी। ​इसके बावजूद, अमेरिका ने अंत में साफ कर दिया कि वैश्विक व्यापार या आव्रजन (इमिग्रेशन) जैसे नीतिगत मुद्दों पर देशों के बीच चाहे जितने भी वैचारिक मतभेद हों, लेकिन जब बात वामपंथी हिंसा और आतंकवाद के वैश्विक नेटवर्क को ध्वस्त करने की आएगी, तो पूरी दुनिया को एक ही सुर में बोलना होगा। भारत ने भी स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद का कोई रंग या विचारधारा नहीं होती, और जब तक दुनिया हर प्रकार के आतंक के खिलाफ एकजुट नहीं होगी, तब तक वैश्विक शांति का सपना अधूरा ही रहेगा।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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