
संवाद 24 श्रीनगर। श्री अमरनाथ जी की वार्षिक तीर्थयात्रा सिर्फ एक धार्मिक सफर नहीं, बल्कि इंसानी जज्बे, अटूट विश्वास और चट्टानी हौसले की एक ऐसी जीवित जीती-जागती मिसाल है, जो हर साल दुनिया को स्तब्ध कर देती है। हिमालय की दुर्गम और बर्फ से ढकी गगनचुंबी चोटियों के बीच विराजमान बाबा बर्फानी के दर्शनों के लिए जब लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, तो उसमें कुछ ऐसे दिव्य चेहरे भी नजर आते हैं जिन्हें देखकर बड़े से बड़े शूरवीरों की आंखें भी नम हो जाती हैं। इन भक्तों को देखकर यह एहसास होता है कि जब परमात्मा के प्रति सच्ची निष्ठा हो, तो शरीर की कोई भी लाचारी इंसान के कदमों को नहीं रोक सकती। पवित्र गुफा की ओर जाने वाले रास्तों पर इस बार भी कई ऐसे श्रद्धालु दिखाई दे रहे हैं जिनके पास न तो चलने के लिए पैर हैं, न देखने के लिए आंखें, और न ही सहारा देने के लिए हाथ। लेकिन शरीर की इन तमाम बंदिशों और शारीरिक कमियों को पीछे छोड़ते हुए, इन भक्तों के हौसले आज हिमालय की सबसे ऊंची चोटी से भी ऊंचे नजर आ रहे हैं। पथरीले, तीखे, फिसलन भरे और खतरनाक ढलानों वाले रास्तों पर जब ये दिव्यांग भक्त ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी जयकारे लगाते हैं, तो पूरा वातावरण एक असीम ऊर्जा से भर उठता है।
बिना पैरों के लाठी के दम पर 21वीं बार नाप दीं हिमालय की चोटियां
हौसले और अटूट विश्वास की ऐसी ही एक अद्भुत मिसाल हैं बिहार के बेगूसराय जिले के बलिया क्षेत्र के रहने वाले 57 वर्षीय बाबू राम। बाबू राम के दोनों पैर नहीं हैं, लेकिन उनकी आंखों में बाबा बर्फानी की झलक पाने की जो चमक है, उसने हर बाधा को बौना साबित कर दिया है। बिना पैरों के भी वह केवल एक लाठी के सहारे हिमालय की इन बेहद दुर्गम और पथरीली चोटियों को फतह कर चुके हैं।
कौतूहल और अचरज की बात यह है कि बाबू राम के लिए यह कोई पहला अनुभव नहीं है। वह अब तक 20 बार बाबा बर्फानी के चरणों में शीश नवा चुके हैं और इस बार उन्होंने 21वीं बार बालटाल के बेहद कठिन और सीधे रास्ते से बाबा के सफल दर्शन किए हैं। जब बालटाल की तीखी और खतरनाक ढलानों पर धीरे-धीरे एक लाठी के सहारे आगे बढ़ते बाबू राम से पूछा गया कि क्या उन्हें इन रास्तों पर चलने में कोई परेशानी या दर्द महसूस नहीं होता? तो उन्होंने चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए कहा, “नहीं, मुझे कोई कष्ट महसूस नहीं होता। मुझे तो इस आस्था से भरे सफर में सिर्फ और सिर्फ परम आनंद की अनुभूति होती है।” रास्ते में घोड़ों, पालकियों और खच्चरों पर सवार अन्य श्रद्धालुओं को हाथ हिलाकर आगे बढ़ने का हौसला देते हुए बाबू राम कहते हैं कि जब मन बाबा की भक्ति में लीन हो जाता है, तो रास्ते के कांटे और मुश्किलें खुद-ब-खुद गायब हो जाती हैं। उन्होंने अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि आज से 20 साल पहले जब उन्होंने पहली बार अपने परिवार के सामने अमरनाथ जाने की इच्छा जताई थी, तो सबने डरते हुए कहा था कि यह यात्रा बहुत कठिन है, बिना पैरों के कैसे कर पाओगे? तब बाबू राम ने आत्मविश्वास से कहा था कि भोलेनाथ खुद मेरा हाथ पकड़कर ले जाएंगे। 20 साल पहले सुविधाएं आज जैसी नहीं थीं, रास्ते और ज्यादा खतरनाक थे, लेकिन बाबा की कृपा से उनका यह सफर आज भी अनवरत जारी है।
आर्टिफिशियल लिम्ब्स (प्लास्टिक की टांगों) पर तय की 5 हजार फीट की खड़ी चढ़ाई
हौसले की दूसरी सबसे बड़ी प्रेरणादायक कहानी राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले गौरव भार्गव की है। गौरव के पास भी अपने दोनों पैर नहीं हैं। वह अपने घुटनों तक कृत्रिम पैर (आर्टिफिशियल लिम्ब) पहनकर इस कठिन यात्रा का हिस्सा बने हैं। गौरव ने अपने जीवन के उस काले अध्याय को याद करते हुए बताया कि करीब पांच साल पहले एक भीषण सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपने दोनों पैर हमेशा के लिए खो दिए थे। पैरों के जाने के बाद वह गहरे मानसिक तनाव और डिप्रेशन में चले गए थे, लेकिन फिर उन्होंने ईश्वर की इच्छा को स्वीकार किया और अपनी इस कमी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। गौरव ने बताया कि साल 2024 में वह पहली बार बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए आए थे और इस बार बाबा ने उन्हें दोबारा अपने दर पर बुलाया है। जब लोगों ने उनसे पूछा कि क्या प्लास्टिक के पैरों के सहारे इन पथरीले रास्तों पर 5 हजार फीट की चढ़ाई चढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई? तो गौरव का सीधा जवाब था, “यह शारीरिक बल का नहीं, बल्कि आत्मा और आस्था का सफर है। जब दिल में बाबा के दर्शन की प्यास हो, तो प्लास्टिक के पैर भी असली पैरों से तेज दौड़ने लगते हैं।” बाबू राम और गौरव भार्गव जैसे सैकड़ों दिव्यांग श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा में शामिल होकर दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि इंसान कभी शरीर से विकलांग नहीं होता, वह केवल अपने विचारों और कमजोर हौसलों से विकलांग होता है। अगर मन में अटूट विश्वास हो, तो दुनिया की कोई भी मंजिल असंभव नहीं है।






