
संवाद 24 नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने एक बार फिर पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स में बदलाव करते हुए डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात शुल्क को बढ़ाने का फैसला किया है। नई दरें 16 जून से लागू हो गई हैं। सरकार के इस कदम को वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
डीजल और एटीएफ पर बढ़ा निर्यात शुल्क
वित्त मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, डीजल के निर्यात पर लगने वाला विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) बढ़ाकर 14 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इससे पहले यह 13.5 रुपये प्रति लीटर था। वहीं, विमानन क्षेत्र में उपयोग होने वाले एटीएफ पर निर्यात शुल्क 9.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 12.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। हालांकि पेट्रोल के निर्यात शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है और वह पूर्ववत रहेगा।
क्यों लिया गया यह फैसला?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और ईंधन उत्पादों की कीमतों में लगातार बदलाव के कारण सरकार समय-समय पर निर्यात शुल्क की समीक्षा करती है। जब वैश्विक बाजार में कीमतें अधिक होती हैं तो तेल कंपनियों को अतिरिक्त लाभ मिलता है। ऐसे अतिरिक्त लाभ पर नियंत्रण रखने और घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए विंडफॉल टैक्स का उपयोग किया जाता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि देश के भीतर डीजल और विमान ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कंपनियां अधिक मुनाफे के लिए बड़े पैमाने पर निर्यात बढ़ाती हैं तो घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में निर्यात शुल्क बढ़ाकर संतुलन बनाने की कोशिश की जाती है।
हर पखवाड़े होती है समीक्षा
भारत में पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स की समीक्षा आमतौर पर हर 15 दिन में की जाती है। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की औसत कीमतों को ध्यान में रखकर लिया जाता है। पिछले कुछ महीनों में सरकार कई बार इन दरों में संशोधन कर चुकी है। कभी शुल्क बढ़ाया गया तो कभी कम किया गया, ताकि बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप नीति बनाई जा सके।
तेल कंपनियों पर पड़ सकता है असर
निर्यात शुल्क बढ़ने से उन कंपनियों की आय प्रभावित हो सकती है जो डीजल और एटीएफ का निर्यात करती हैं। अधिक टैक्स का मतलब है कि निर्यात से मिलने वाला शुद्ध लाभ कुछ कम हो सकता है। हालांकि इसका प्रभाव कंपनियों की निर्यात मात्रा, वैश्विक कीमतों और बाजार की स्थिति पर भी निर्भर करेगा। निवेशक भी ऐसे फैसलों पर नजर रखते हैं क्योंकि इससे ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों के प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है।
आम उपभोक्ताओं पर क्या होगा प्रभाव?
विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले का सीधा असर फिलहाल घरेलू पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर नहीं पड़ेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू उपभोग के लिए पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले मौजूदा उत्पाद शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसलिए आम उपभोक्ताओं को तत्काल किसी अतिरिक्त बोझ का सामना नहीं करना पड़ेगा।
ऊर्जा सुरक्षा पर सरकार का फोकस
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों ने कई देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। भारत भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। सरकार का मानना है कि घरेलू मांग और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि किसी भी स्थिति में देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता प्रभावित न हो। इसी सोच के तहत विंडफॉल टैक्स को नीति उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कुल मिलाकर, डीजल और एटीएफ पर निर्यात शुल्क बढ़ाने का फैसला सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके जरिए वह वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के बीच घरेलू ऊर्जा सुरक्षा और राजस्व संतुलन बनाए रखना चाहती है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों की दिशा के आधार पर इन दरों में फिर बदलाव देखने को मिल सकता है।






