मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की नई छलांग, सरकार ला सकती है PLI 2.0
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संवाद 24 डेस्क। भारत सरकार एक बार फिर मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है। खबर है कि केंद्र सरकार मई 2026 तक मोबाइल फोन एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए नई प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI 2.0 योजना ला सकती है। इस नई योजना का आकार 5 अरब डॉलर से अधिक, यानी लगभग 46,000 करोड़ रुपये हो सकता है। यह केवल एक नई सब्सिडी स्कीम नहीं होगी, बल्कि भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में आगे ले जाने की रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती है।
PLI 2.0 क्यों जरूरी हो गया?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग में जबरदस्त छलांग लगाई है। 2020 में शुरू हुई Large Scale Electronics Manufacturing (LSEM) योजना, जिसे आम तौर पर मोबाइल PLI कहा जाता है, का उद्देश्य था कि कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाएं, निवेश करें और निर्यात बढ़ाएं। इस योजना के तहत सरकार ने लगभग 40,995 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था।
अब यह योजना मार्च 2026 में समाप्त हो चुकी है। ऐसे में उद्योग जगत लगातार इसकी जगह नई योजना लाने की मांग कर रहा था। कंपनियों का मानना है कि यदि सरकार प्रोत्साहन जारी नहीं रखती, तो भारत को वियतनाम, चीन और अन्य एशियाई देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि PLI 2.0 को केवल पुरानी योजना का विस्तार नहीं, बल्कि उसका अधिक आक्रामक और निर्यात-केंद्रित संस्करण माना जा रहा है।
भारत ने अब तक क्या हासिल किया?
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की प्रगति उल्लेखनीय रही है। कुछ साल पहले तक भारत मुख्य रूप से मोबाइल आयात करता था, लेकिन अब देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता बन चुका है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, मोबाइल फोन उत्पादन FY20 में लगभग 2.14 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर FY25 में 5.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
मोबाइल एक्सपोर्ट भी तेजी से बढ़े हैं। FY20 में जहां मोबाइल निर्यात सीमित था, वहीं अब यह कई गुना बढ़ चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मौजूदा योजना के तहत फरवरी 2026 तक कुल निर्यात 6.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है, जो तय लक्ष्य से 27 प्रतिशत ज्यादा है।
इसी सफलता ने सरकार को यह भरोसा दिया है कि अगर प्रोत्साहन को अगले चरण में जारी रखा जाए, तो भारत वैश्विक मोबाइल सप्लाई चेन में और बड़ी भूमिका निभा सकता है।
PLI 2.0 में क्या नया हो सकता है?
माना जा रहा है कि PLI 2.0 केवल मोबाइल असेंबली तक सीमित नहीं रहेगा। इस बार सरकार का फोकस “डीप मैन्युफैक्चरिंग” और “वैल्यू एडिशन” पर रहेगा। यानी सिर्फ मोबाइल फोन जोड़ने का काम नहीं, बल्कि उनके पुर्जों, डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी, सेमीकंडक्टर और अन्य महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स का निर्माण भी भारत में हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत केवल असेंबली हब बना रहता है, तो लंबे समय में उसका फायदा सीमित रहेगा। असली लाभ तब होगा जब देश के भीतर ही कंपोनेंट निर्माण और डिजाइनिंग इकोसिस्टम तैयार होगा। इससे आयात कम होगा, रोजगार बढ़ेगा और कंपनियों का मार्जिन बेहतर होगा।
सरकार पहले ही इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाओं पर काम कर रही है। हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग के लिए 29 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनमें डिस्प्ले मॉड्यूल और रेयर-अर्थ मैग्नेट जैसे उत्पाद शामिल हैं।
Apple, Samsung और Dixon जैसी कंपनियों को होगा फायदा
मोबाइल PLI 2.0 का सबसे बड़ा लाभ उन कंपनियों को हो सकता है जो पहले से भारत में बड़े स्तर पर उत्पादन कर रही हैं। इनमें Apple के सप्लायर, Samsung, Dixon Technologies और Tata Electronics जैसी कंपनियां शामिल हैं।
विशेष रूप से Dixon Technologies के लिए यह योजना काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि कंपनी की आय का बड़ा हिस्सा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और EMS बिजनेस से आता है। PLI 2.0 आने से ऐसी कंपनियों को अपने उत्पादन और निवेश को और बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
इसी तरह Apple के सप्लायर्स पहले ही भारत में तेजी से निवेश कर रहे हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, FY26 में भारत से चीन को Apple कंपोनेंट्स और सब-असेंबली का निर्यात 2.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह इस बात का संकेत है कि भारत केवल तैयार मोबाइल ही नहीं, बल्कि उनके पार्ट्स सप्लायर के रूप में भी उभर रहा है।
भारत का बड़ा लक्ष्य: दुनिया के 35% मोबाइल उत्पादन में हिस्सेदारी
इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री ने सरकार के सामने अगले पांच वर्षों का एक महत्वाकांक्षी रोडमैप रखा है। उद्योग का दावा है कि यदि PLI 2.0 लागू होता है, तो FY31 तक भारत वैश्विक मोबाइल उत्पादन में 30 से 35 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
इस रोडमैप के अनुसार, भारत में सालाना मोबाइल उत्पादन 110 से 130 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जबकि निर्यात 55 से 70 अरब डॉलर के बीच हो सकता है। यह केवल इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत के व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार और रोजगार पर भी बड़ा असर डालेगी।
आज भारत वैश्विक मोबाइल उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत चीन और वियतनाम को चुनौती देने की स्थिति में आ सकता है।
चुनौतियां भी कम नहीं हैं
हालांकि PLI 2.0 को लेकर उम्मीदें काफी हैं, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती है कि भारत में अभी भी कई महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का आयात करना पड़ता है। डिस्प्ले, चिपसेट, बैटरी सेल, कैमरा सेंसर और सेमीकंडक्टर जैसी चीजों के लिए देश काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है।
इसके अलावा लॉजिस्टिक्स लागत, बिजली की उपलब्धता, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और जटिल नियम भी कंपनियों के लिए समस्या बने हुए हैं। वियतनाम जैसे देश सस्ती जमीन, टैक्स छूट और तेज निर्यात प्रक्रिया के कारण निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। चीन अभी भी सप्लाई चेन, स्केल और लागत के मामले में बेहद मजबूत स्थिति में है।
ऐसे में केवल प्रोत्साहन राशि देना ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को सप्लाई चेन, कौशल विकास, बिजली, ट्रांसपोर्ट और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पर भी समानांतर काम करना होगा।
रोजगार और अर्थव्यवस्था पर असर
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर केवल फैक्ट्री उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसके साथ पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, डिजाइन, सर्विसिंग और कंपोनेंट सप्लाई जैसे कई अन्य सेक्टर भी जुड़े होते हैं। उद्योग का मानना है कि PLI 2.0 लाखों नए रोजगार पैदा कर सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में विदेशी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक मोबाइल PLI के तहत लगभग 4 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया, जिसमें से 70 प्रतिशत निवेश PLI लाभार्थी कंपनियों में गया।
यदि नई योजना सही तरीके से लागू होती है, तो इससे छोटे और मध्यम स्तर के भारतीय सप्लायरों को भी बड़ा फायदा मिल सकता है। इससे घरेलू उद्योगों को नई तकनीक, विदेशी कंपनियों से साझेदारी और निर्यात के अवसर मिलेंगे।
क्या PLI 2.0 भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स सुपरपावर बना सकता है?
यह सवाल अब बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यह साबित किया है कि वह बड़े पैमाने पर मोबाइल उत्पादन कर सकता है। अब अगला चरण यह तय करेगा कि भारत केवल “मेड इन इंडिया” टैग तक सीमित रहेगा या “डिजाइन्ड, डेवलप्ड और सप्लाइड फ्रॉम इंडिया” मॉडल की ओर बढ़ेगा।
PLI 2.0 भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार केवल प्रोत्साहन देने तक सीमित रहती है या पूरी सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाती है।
अगर यह योजना सही तरीके से लागू होती है, तो आने वाले पांच वर्षों में भारत न केवल दुनिया का बड़ा मोबाइल एक्सपोर्टर बन सकता है, बल्कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में अपनी स्थायी और मजबूत पहचान भी बना सकता है।






