शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन, मां कालरात्रि को क्यों कहा जाता है शुभंकरी? जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और प्रिय भोग

संवाद 24 डेस्क। शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। देवी का स्वरूप भले ही उग्र और भय उत्पन्न करने वाला दिखाई देता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में उन्हें अपने भक्तों का कल्याण करने वाली, भय दूर करने वाली और संकटों से रक्षा करने वाली देवी माना गया है। उन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है, जिसका भाव है शुभ फल प्रदान करने वाली देवी। वर्ष 2026 में 17 अक्टूबर, शनिवार को नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जा रही है। इस अवसर पर श्रद्धालु देवी की आराधना के साथ साहस, आत्मविश्वास और परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं। आइए जानते हैं मां कालरात्रि के स्वरूप का महत्व, पूजा का शुभ समय, पूजन विधि, प्रिय भोग, मंत्र और पौराणिक कथा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें।

मां कालरात्रि कौन हैं और क्यों की जाती है उनकी पूजा?
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि नवदुर्गा का सातवां स्वरूप हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की क्रमशः आराधना की जाती है। सातवें दिन की पूजा का संबंध अंधकार, भय, नकारात्मकता और बुरी शक्तियों के विनाश की कामना से जोड़ा जाता है। धार्मिक विश्वास है कि मां कालरात्रि की उपासना करने से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस मिलता है और उनके मन में आत्मबल का संचार होता है।
देवी के नाम में भी गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। काल का संबंध समय, मृत्यु और परिवर्तन से जोड़ा जाता है, जबकि रात्रि अंधकार का प्रतीक है। इस दृष्टि से मां कालरात्रि उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो भयावह परिस्थितियों का सामना करके अंधकार पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। उनकी पूजा का संदेश केवल संकटों से मुक्ति की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि जीवन में कठिन समय आने पर व्यक्ति को धैर्य और विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए।

मां कालरात्रि का स्वरूप कैसा है?
धार्मिक ग्रंथों और प्रचलित देवी-वर्णनों में मां कालरात्रि का वर्ण गहरे काले रंग का बताया गया है। उनके केश खुले और बिखरे हुए हैं तथा उनके गले में विद्युत के समान चमकने वाली माला का वर्णन मिलता है। देवी के तीन नेत्र बताए गए हैं और उनके श्वास से अग्नि की ज्वालाएं निकलने की कल्पना की गई है। उनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा है।
मां कालरात्रि की चार भुजाओं का वर्णन मिलता है। उनके एक हाथ में खड्ग और दूसरे में लोहे का अस्त्र बताया जाता है, जबकि शेष दो हाथ वरदान देने और अभय प्रदान करने की मुद्राओं में रहते हैं। यह स्वरूप शक्ति और संरक्षण के दो अलग-अलग पक्षों को एक साथ प्रस्तुत करता है। अस्त्र अन्याय और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक हैं, जबकि अभय मुद्रा भय से मुक्ति और वर मुद्रा भक्तों के कल्याण का संदेश देती है।
देवी के इस उग्र रूप को देखकर भयभीत होने के बजाय उसके आध्यात्मिक अर्थ को समझना महत्वपूर्ण है। मां कालरात्रि यह संदेश देती हैं कि बुराई के सामने साहस के साथ खड़ा होना और सत्य के मार्ग पर बने रहना भी साधना का एक रूप है। इसी कारण उनके भयकारी स्वरूप के बावजूद उन्हें शुभ फल देने वाली देवी माना जाता है।

मां कालरात्रि पूजा 2026: क्या है शुभ मुहूर्त?
शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन पूजा के लिए प्रातःकाल और अभिजीत मुहूर्त को विशेष महत्व दिया जाता है। उपलब्ध पंचांग संबंधी विवरणों के अनुसार, 17 अक्टूबर 2026 को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक बताया गया है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 59 मिनट से 5 बजकर 47 मिनट तक और अपराह्न पूजा का समय दोपहर 3 बजकर 54 मिनट से शाम 6 बजकर 14 मिनट तक दिया गया है।
हालांकि, अलग-अलग पंचांगों में गणना पद्धति, स्थान और तिथि संबंधी विवरणों के कारण मुहूर्त के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय सुनिश्चित करना उचित रहेगा। विशेष रूप से सप्तमी तिथि की अवधि और उसके अगले दिन तक विस्तार की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। वर्ष 2026 के कुछ पंचांग विवरणों में सप्तमी तिथि से जुड़े अनुष्ठानों के लिए 17 और 18 अक्टूबर, दोनों का उल्लेख मिलता है। ऐसे में केवल सामान्य तारीख देखकर निर्णय लेने के बजाय स्थानीय तिथि-निर्णय को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मां कालरात्रि की पूजा विधि: घर पर कैसे करें आराधना?
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा श्रद्धा और स्वच्छता के साथ की जाती है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि घर में पहले से घटस्थापना की गई है, तो उसी पूजा स्थल पर विधिपूर्वक आराधना की जा सकती है।
पूजा आरंभ करने से पहले दीपक जलाएं और देवी का ध्यान करें। परंपरा के अनुसार, देवी को रोली, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और सुगंधित पदार्थ अर्पित किए जा सकते हैं। इसके बाद धूप और दीप दिखाकर मां कालरात्रि का स्मरण करें। पूजा के दौरान मन को शांत रखें और अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी के मंत्र का जाप करें।
इसके बाद मां को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग लगाएं। कुछ परंपराओं में गुड़ की खीर जैसे प्रसाद का भी उल्लेख मिलता है। देवी के समक्ष दुर्गा सप्तशती के संबंधित पाठ, नवदुर्गा स्तुति या मां कालरात्रि के मंत्रों का पाठ किया जा सकता है। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य तथा कल्याण की प्रार्थना करें। प्रसाद को परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटें।
पूजा में किसी विशेष सामग्री की अनुपलब्धता होने पर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा, स्वच्छता और सात्त्विक भाव को प्रमुखता देना अधिक महत्वपूर्ण है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि में कुछ अंतर हो सकते हैं, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन भी किया जा सकता है।

मां कालरात्रि को कौन-सा भोग लगाना चाहिए?
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि को गुड़ अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुड़ और उससे तैयार मिठाइयां देवी को प्रिय मानी जाती हैं। भक्त गुड़, गुड़ से बने लड्डू या अन्य सात्त्विक मिठाइयां प्रसाद के रूप में चढ़ा सकते हैं। कुछ स्थानों पर गुड़ की खीर और अन्य पारंपरिक पकवान भी अर्पित किए जाते हैं।
भोग तैयार करते समय स्वच्छता और शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। प्रसाद में अपनी सुविधा के अनुसार उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। देवी को भोग अर्पित करने के बाद उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना और दूसरों के साथ बांटना शुभ माना जाता है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी विशेष भोग को चढ़ाने से मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होने का दावा धार्मिक विश्वास के दायरे में आता है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं है। पूजा का वास्तविक उद्देश्य श्रद्धा, आत्मसंयम और सकारात्मक भाव के साथ देवी का स्मरण करना है।

मां कालरात्रि का प्रिय रंग कौन-सा है?
नवरात्रि के सातवें दिन के साथ स्लेटी रंग अर्थात धूसर रंग को जोड़ा जाता है। यह रंग संतुलन, धैर्य और कठिन परिस्थितियों में स्थिर बने रहने का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु चाहें तो इस दिन स्लेटी रंग के वस्त्र पहन सकते हैं। हालांकि, वस्त्रों के रंग का निर्धारण अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं में भिन्न हो सकता है। इसलिए इसे अनिवार्य नियम मानने के बजाय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखना चाहिए।
मां कालरात्रि का मंत्र और उसका अर्थ
मां कालरात्रि की उपासना के लिए यह सरल मंत्र जपा जा सकता है।
“ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
इस मंत्र का भाव है कि साधक मां कालरात्रि को नमन करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। मंत्र जाप करते समय मन को एकाग्र रखना और श्रद्धापूर्वक देवी का ध्यान करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक अन्य प्रचलित मंत्र है:
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः।
श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसके लिए किसी निश्चित संख्या को अनिवार्य मानना आवश्यक नहीं है। यदि कोई व्यक्ति मंत्रों से परिचित नहीं है, तो वह मां दुर्गा का सामान्य स्मरण करके भी पूजा कर सकता है।

मां कालरात्रि की पौराणिक कथा क्या है?
मां कालरात्रि की महिमा से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में देवी दुर्गा की उस शक्ति का वर्णन मिलता है, जो देवताओं और संसार को दुष्ट शक्तियों के अत्याचार से मुक्त कराती है। शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों से जुड़े प्रसंग देवी के पराक्रम और दुष्टता के विरुद्ध संघर्ष को दर्शाते हैं।
रक्तबीज से संबंधित कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, रक्तबीज को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की बूंदें धरती पर गिरते ही उसके समान अनेक शक्तिशाली असुर उत्पन्न हो जाते थे। इस कारण उसका वध करना अत्यंत कठिन हो गया था। देवी दुर्गा ने उसके विरुद्ध युद्ध किया और उसके रक्त को धरती पर गिरने से रोकने के लिए देवी के उग्र रूप की महिमा का वर्णन मिलता है। इस प्रसंग में देवी की शक्ति को ऐसी ऊर्जा के रूप में देखा जाता है, जो लगातार बढ़ती बुराई को रोकने में सक्षम है।
हालांकि, विभिन्न पुराणों और देवी-माहात्म्य से जुड़ी परंपराओं में इन कथाओं के विवरण अलग-अलग रूपों में मिलते हैं। इसलिए मां कालरात्रि की कथा को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ये धार्मिक ग्रंथों और आस्था पर आधारित आख्यान हैं।
इन कथाओं का आध्यात्मिक संदेश यह है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसके सामने साहस और दृढ़ संकल्प के साथ खड़ा होना आवश्यक है। मां कालरात्रि का स्मरण भक्तों को भय से ऊपर उठने और अन्याय का सामना करने की प्रेरणा देता है।

मां कालरात्रि की आरती का महत्व
नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की आरती करके पूजा का समापन करने की परंपरा है। आरती के दौरान दीपक दिखाते हुए देवी की महिमा का गुणगान किया जाता है। श्रद्धालु मां से भय, संकट और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति देने की प्रार्थना करते हैं।
आरती करते समय परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर देवी का स्मरण कर सकते हैं। इसके बाद हाथ जोड़कर अपनी प्रार्थना प्रस्तुत करें और प्रसाद ग्रहण करें। आरती के शब्दों और विधि में स्थानीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है। जो श्रद्धालु पारंपरिक आरती जानते हैं, वे उसका पाठ कर सकते हैं। अन्य लोग मां कालरात्रि के नाम का स्मरण करते हुए सरल प्रार्थना भी कर सकते हैं।

मां कालरात्रि की पूजा से क्या मिलता है आध्यात्मिक संदेश?
मां कालरात्रि की उपासना का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। उनका स्वरूप मनुष्य को यह समझने की प्रेरणा देता है कि जीवन में भय और अनिश्चितता का सामना करने के लिए भीतर की शक्ति को पहचानना आवश्यक है। कई बार परिस्थितियां कठिन हो जाती हैं और भविष्य को लेकर मन में आशंका उत्पन्न होती है। ऐसे समय में आस्था व्यक्ति को मानसिक संबल प्रदान कर सकती है।
देवी का अभय स्वरूप सुरक्षा और विश्वास का प्रतीक है, जबकि उनका उग्र रूप अन्याय तथा नकारात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देता है। इस दृष्टि से मां कालरात्रि की आराधना आत्मविश्वास, धैर्य और विवेक के महत्व को समझने का अवसर भी है।
हालांकि, जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए प्रार्थना के साथ उचित प्रयास करना भी जरूरी है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर चिकित्सकीय सहायता लेना, आर्थिक कठिनाइयों में व्यावहारिक योजना बनाना और मानसिक तनाव की स्थिति में भरोसेमंद लोगों से बात करना महत्वपूर्ण है। धार्मिक आस्था व्यक्ति को संबल दे सकती है, लेकिन आवश्यक व्यावहारिक कदमों का स्थान नहीं लेती।

शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन क्या रखें ध्यान?
मां कालरात्रि की पूजा करते समय कुछ सामान्य बातों का ध्यान रखा जा सकता है। पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्त्विक प्रसाद तैयार करें। मंत्र जाप और आरती के दौरान मन को एकाग्र रखने का प्रयास करें। व्रत रखने वाले लोग अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही उपवास करें। किसी बीमारी या नियमित दवा के सेवन की स्थिति में उपवास को लेकर चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।
पूजा के लिए किसी विशेष सामग्री को लेकर अनावश्यक चिंता न करें। देवी की आराधना में श्रद्धा और सद्भाव को प्रमुखता दें। परिवार के सदस्यों के साथ पूजा करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखना भी इस पर्व की सकारात्मक भावना को मजबूत करता है।

शारदीय नवरात्रि का सातवां दिन मां कालरात्रि की आराधना के माध्यम से साहस, शक्ति और निर्भयता का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी का स्मरण भय और संकटों से मुक्ति की कामना के साथ किया जाता है। इस दिन गुड़ का भोग, मंत्र जाप, आरती और श्रद्धापूर्वक पूजा करने की परंपरा है।
वर्ष 2026 में 17 अक्टूबर को मां कालरात्रि की पूजा का विशेष अवसर है। पूजा के शुभ समय के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा, क्योंकि तिथि और मुहूर्त में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। मां कालरात्रि की उपासना का मूल भाव यही है कि कठिन परिस्थितियों में भी साहस, धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए तथा जीवन में सत्य और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ा जाए।

Geeta Singh
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