
संवाद 24 नई दिल्ली। जानलेवा बीमारी कैंसर के इलाज और नई दवाओं की खोज को लेकर वैश्विक चिकित्सा जगत से एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा सामने आया है, जिसने आधुनिक विज्ञान और अकादमिक जगत की साख पर गहरा सवालिया निशान लगा दिया है। एक अंतरराष्ट्रीय व्यापक जांच और डेटा विश्लेषण में यह बात साबित हुई है कि कैंसर शोध से जुड़े 4,000 से अधिक रिसर्च पेपर्स पूरी तरह फर्जी और हेरफेर से भरे हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि इन फर्जी शोध पत्रों के पीछे बाकायदा संगठित ‘पेपर मिल’ सिंडिकेट सक्रिय हैं, जो मोटी रकम लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के नाम इन फर्जी पेपर्स में जोड़ते हैं और नकली ‘साइटेशन्स’ (उद्धरण) का खेल रचते हैं। यह गोरखधंधा केवल डिग्री या प्रमोशन का खेल नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर उन लाखों कैंसर पीड़ितों की जिंदगी से जानलेवा खिलवाड़ है, जिनका इलाज इन्हीं शोधों के आधार पर तय की जाने वाली थेरेपी और दवाओं पर निर्भर करता है।
33 हजार से ज्यादा अध्ययनों की पड़ताल में फूटा ‘साइटेशन’ का भांडा
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (PNAS) में प्रकाशित इस विस्तृत अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कैंसर से जुड़े कुल 33,159 शोध पत्रों का गहन विश्लेषण किया। जांच के दौरान 4,000 से अधिक पेपर्स में फर्जी साइटेशन्स और बनावटी संदर्भों के स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण मिले हैं। ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के ‘ऑस्ट्रेलियन सेंटर फॉर हेल्थ सर्विसेज इनोवेशन’ से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता एड्रियन बार्नेट के नेतृत्व में की गई इस जांच में एक बेहद असामान्य पैटर्न पकड़ा गया। आमतौर पर जब कोई प्रामाणिक रिसर्च पेपर प्रकाशित होता है, तो उसे दुनिया भर के वैज्ञानिक पढ़ते हैं, डाउनलोड करते हैं और कई वर्षों के बाद अपने शोध में उसका संदर्भ (साइटेशन) जोड़ते हैं। लेकिन इन संदिग्ध कैंसर पेपर्स का मामला बिल्कुल उल्टा था।
प्रकाशित होने के महज एक से तीन साल के भीतर ही इन पेपर्स को अन्य सामान्य और प्रामाणिक रिसर्च की तुलना में 50 से 100 प्रतिशत तक अधिक साइटेशन्स मिले हुए थे। ताज्जुब की बात यह रही कि इंटरनेट पर इन आर्टिकल्स को पढ़ने, डाउनलोड करने या ऑनलाइन देखने वालों की संख्या न के बराबर थी। यानी आम वैज्ञानिक इन्हें पढ़ भी नहीं रहे थे, फिर भी कागजों पर इन्हें सैकड़ों बार उद्धृत दिखाया जा रहा था। यह विसंगति सीधे-सीधे यह साबित करती है कि यह काम किसी वास्तविक वैज्ञानिक खोज का नहीं, बल्कि उद्धरणों की संख्या बढ़ाने वाले किसी सुनियोजित सॉफ्टवेयर या गिरोह का था।
क्या है ‘पेपर मिल’ और कैसे चलता है यह काला कारोबार?
अकादमिक और मेडिकल की दुनिया में किसी भी शोधकर्ता या संस्थान का रुतबा उसके रिसर्च पेपर्स और उन्हें मिलने वाले ‘साइटेशन्स’ की संख्या से आंका जाता है। इसी का फायदा उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फर्जी शोध तैयार करने वाले गिरोह यानी ‘पेपर मिल’ (Paper Mills) फल-फूल रहे हैं। यह गिरोह पहले से मौजूद पुराने डेटा, मनगढ़ंत निष्कर्षों और अब आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स की मदद से फर्जी वैज्ञानिक आलेख तैयार करते हैं। इसके बाद वे ऐसे डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की तलाश करते हैं जिन्हें मेडिकल कॉलेजों में पदोन्नति, वित्तीय अनुदान या प्रतिष्ठित पदों की दरकार होती है। इन पेपर्स में ‘ऑथर’ (लेखक) के रूप में नाम जुड़वाने के एवज में लाखों रुपये की मोटी फीस वसूली जाती है। इतना ही नहीं, पेपर को प्रभावशाली दिखाने के लिए ये सिंडिकेट अपनी ही अन्य फर्जी पत्रिकाओं में एक-दूसरे के पेपर्स को बार-बार कोट (cite) करते हैं, जिससे उनकी अकादमिक साख कृत्रिम रूप से बढ़ जाती है। जांच में यह भी सामने आया कि यह फर्जीवाड़ा कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल्स में बहुत बड़े पैमाने पर फैला हुआ था, जिनमें ‘जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल एंड क्लिनिकल कैंसर रिसर्च’ और ‘मॉलिक्यूलर कैंसर’ प्रमुख रूप से शामिल हैं।
क्लिनिकल ट्रायल और मरीज के इलाज पर मंडराता सीधा खतरा
कैंसर एक ऐसी जटिल बीमारी है जिसमें कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड दवाओं का विकास बेहद संवेदनशील वैज्ञानिक डेटा पर टिका होता है। जब किसी बेसिक रिसर्च में झूठे मॉलिक्यूलर निष्कर्ष दिखाए जाते हैं, तो फार्मा कंपनियां और अस्पताल उसी डेटा के आधार पर नए क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर देते हैं। फर्जी डेटा पर आधारित दवाएं न केवल करोड़ों डॉलर बर्बाद करती हैं, बल्कि जब वे अंतिम चरण में कैंसर मरीजों पर आजमाई जाती हैं, तो वे बेअसर साबित होती हैं या उनके जानलेवा दुष्प्रभाव सामने आते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इस प्रकार का अकादमिक भ्रष्टाचार अक्षम्य अपराध है। पीएनएएस के इस खुलासे के बाद अब दुनिया भर के मेडिकल रेगुलेटर्स, पब्लिशर्स और यूनिवर्सिटीज पर यह दबाव बढ़ गया है कि वे संदिग्ध पत्रिकाओं और लेखकों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई करें और मेडिकल जर्नल्स की सह-समीक्षा (Peer-Review) प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाएं।






