
संवाद 24 डेस्क। शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। देवी का यह स्वरूप मातृत्व, करुणा, वात्सल्य, शक्ति और ममता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता अपने भक्तों को सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती हैं। नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व है। प्रत्येक स्वरूप जीवन के अलग-अलग गुणों, आध्यात्मिक मूल्यों और शक्ति के विभिन्न आयामों का संदेश देता है। मां स्कंदमाता का स्वरूप यह बताता है कि ममता और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। एक ओर मां अपने पुत्र को गोद में लेकर स्नेह और संरक्षण का भाव प्रकट करती हैं, तो दूसरी ओर उनका सिंह पर विराजमान होना साहस और पराक्रम का प्रतीक है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा 15 अक्टूबर को की जा रही है। इस अवसर पर भक्त देवी की आराधना कर परिवार की सुख-शांति, संतान की उन्नति और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं।
मां स्कंदमाता कौन हैं और कैसे पड़ा उनका यह नाम?
हिंदू धार्मिक परंपरा में मां स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय की माता के रूप में पूजा जाता है। भगवान कार्तिकेय को स्कंद नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण माता पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा गया। भगवान कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति माना जाता है। पौराणिक कथाओं में उन्हें असुरों के विरुद्ध देवताओं की रक्षा करने वाले शक्तिशाली योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है। स्कंदमाता का स्वरूप इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें मां के वात्सल्य और पुत्र के पराक्रम का अद्भुत मेल दिखाई देता है।
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का क्रम निर्धारित है। इस क्रम में पांचवें दिन स्कंदमाता की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि देवी के इस स्वरूप का स्मरण करने से भक्तों के मन में धैर्य, करुणा और आत्मविश्वास का विकास होता है। स्कंदमाता की पूजा केवल सुख-समृद्धि की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माता-पुत्र के पवित्र संबंध, कर्तव्य, संरक्षण और प्रेम के महत्व को भी सामने लाती है।
मां स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप क्या संदेश देता है?
मां स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी माना जाता है। उनकी चार भुजाएं बताई गई हैं। दो हाथों में वे कमल के पुष्प धारण करती हैं, एक हाथ से बाल स्वरूप भगवान स्कंद को गोद में संभालती हैं और दूसरे हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। देवी कमल के आसन पर विराजमान दिखाई देती हैं। इसी कारण उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनका वाहन सिंह है, जो साहस, शक्ति और निर्भीकता का प्रतीक माना जाता है।
देवी के हाथों में कमल का होना पवित्रता, सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ा जाता है। कमल कीचड़ में खिलने के बावजूद अपनी सुंदरता और स्वच्छता बनाए रखता है। इसी तरह मनुष्य को भी कठिन परिस्थितियों में अपने विचारों और आचरण की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। मां की गोद में विराजमान बाल स्कंद वात्सल्य और संरक्षण का संदेश देते हैं। सिंह शक्ति और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के साहस का प्रतीक है। इस प्रकार मां स्कंदमाता का स्वरूप स्नेह, धैर्य, पवित्रता और पराक्रम को एक साथ धारण करने की प्रेरणा देता है।
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करने का अवसर मिलता है। देवी को ममता और संरक्षण की अधिष्ठात्री के रूप में देखा जाता है। इसलिए संतान की खुशहाली, शिक्षा, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करने वाले श्रद्धालु भी उनकी विशेष पूजा करते हैं।
मान्यता है कि मां स्कंदमाता की उपासना से व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। उनकी आराधना मन को एकाग्र करने, नकारात्मक विचारों से दूर रहने और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का माध्यम बन सकती है। हालांकि पूजा से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ आस्था और धार्मिक विश्वास का विषय हैं। इन्हें निश्चित भौतिक परिणामों की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
स्कंदमाता की उपासना का एक व्यापक संदेश यह भी है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल पराक्रम में नहीं, बल्कि करुणा और जिम्मेदारी में भी दिखाई देता है। मां अपने पुत्र की रक्षा करती हैं और साथ ही उसे सामर्थ्यवान बनाने का प्रतीकात्मक संदेश देती हैं। यही भाव परिवार, समाज और जीवन के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है।
मां स्कंदमाता की पूजा कैसे करें? जानिए सरल और पारंपरिक विधि
नवरात्रि के पांचवें दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करें और मां स्कंदमाता की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ चौकी पर स्थापित करें। यदि नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की गई है, तो स्थापित पूजा व्यवस्था को बनाए रखते हुए देवी की आराधना करें। पूजा शुरू करने से पहले मन को शांत रखें और श्रद्धापूर्वक माता का स्मरण करें।
सबसे पहले पूजा स्थल और देवी की प्रतिमा पर गंगाजल अथवा स्वच्छ जल छिड़ककर पवित्रता का भाव रखें। इसके बाद मां के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें। देवी को रोली, कुमकुम, अक्षत और ताजे पुष्प चढ़ाएं। कमल का फूल मां स्कंदमाता को अर्पित करना शुभ माना जाता है। यदि कमल उपलब्ध न हो, तो स्वच्छ और श्रद्धापूर्वक अर्पित किए जाने वाले अन्य पुष्प भी चढ़ाए जा सकते हैं।
इसके बाद मां स्कंदमाता के मंत्र का जाप करें। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती अथवा देवी की स्तुति का पाठ कर सकते हैं। इसके बाद माता को फल, केले, खीर या अन्य सात्विक पकवानों का भोग लगाएं। अंत में मां स्कंदमाता की आरती करें और परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य तथा कल्याण के लिए प्रार्थना करें। पूजा के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटें।
पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा, स्वच्छता और मन की एकाग्रता का है। यदि किसी व्यक्ति के पास विस्तृत पूजन सामग्री उपलब्ध नहीं है, तो वह साधारण सामग्री से भी अपनी परंपरा के अनुसार देवी का स्मरण कर सकता है।
मां स्कंदमाता के प्रभावशाली मंत्र, जिनके जाप से मन होता है एकाग्र
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना के दौरान उनके मूल मंत्र और स्तुति मंत्र का जाप किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मंत्रों का उच्चारण कर सकते हैं।
मां स्कंदमाता का मूल मंत्र है—
‘ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः।
इस मंत्र का अर्थ है कि मां स्कंदमाता को श्रद्धापूर्वक नमन है। इसका जाप करते समय भक्त देवी के मातृस्वरूप का ध्यान करते हैं और मन में शांति, सद्बुद्धि तथा सकारात्मकता की कामना करते हैं।
मां स्कंदमाता का प्रार्थना मंत्र है—
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
इस प्रार्थना में सिंहासन पर विराजमान, कमल धारण करने वाली और शुभ फल प्रदान करने वाली यशस्विनी देवी स्कंदमाता से कल्याण की कामना की जाती है।
देवी की व्यापक स्तुति के लिए यह मंत्र भी पढ़ा जाता है—
‘या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
इस मंत्र में समस्त प्राणियों में स्कंदमाता के रूप में विद्यमान देवी को बार-बार नमन किया गया है। मंत्रों का उच्चारण स्पष्टता और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। संस्कृत मंत्रों के पाठ में अलग-अलग परंपराओं के अनुसार उच्चारण अथवा पाठ के रूप में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
मां स्कंदमाता को कौन-सा भोग चढ़ाएं? केले से लेकर खीर तक का महत्व
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केले का भोग अर्पित करना विशेष शुभ माना जाता है। धार्मिक परंपरा में केले को सात्विक फल के रूप में देखा जाता है। इसके अतिरिक्त केले से बने पकवान, खीर, हलवा, पंचामृत और अन्य ताजे फल भी देवी को अर्पित किए जा सकते हैं। कुछ श्रद्धालु केसरयुक्त खीर बनाकर भी मां को भोग लगाते हैं।
भोग तैयार करते समय स्वच्छता और सात्विकता का ध्यान रखना चाहिए। भोजन ताजा हो और उसे तैयार करने वाले स्थान की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाए। भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद को श्रद्धालुओं में बांटना भारतीय धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रसाद बांटने से सामूहिकता, सहभागिता और परस्पर सद्भाव का भाव मजबूत होता है।
भोग के विषय में अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक पकवान को अनिवार्य मानने के बजाय अपनी पारिवारिक परंपरा और श्रद्धा के अनुसार सात्विक भोग अर्पित किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से भोग का महत्व केवल पकवान में नहीं, बल्कि उसे श्रद्धा और समर्पण के साथ अर्पित करने के भाव में निहित है।
मां स्कंदमाता की पौराणिक कथा: तारकासुर के अत्याचारों से कैसे मिला देवताओं को छुटकारा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में तारकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे वरदान प्राप्त किया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकेगा। तारकासुर को विश्वास था कि भगवान शिव तपस्या में लीन रहते हैं और उनका विवाह होने की संभावना बहुत कम है। इसी विश्वास के कारण वह स्वयं को लगभग अजेय समझने लगा। वरदान प्राप्त करने के बाद उसने देवताओं और अन्य प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसके अत्याचार बढ़ने लगे और देवताओं के सामने संकट खड़ा हो गया।
तारकासुर के आतंक से परेशान होकर देवताओं ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। देवताओं के कल्याण और संसार में संतुलन स्थापित करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह तथा उनके पुत्र के जन्म का प्रसंग विभिन्न पौराणिक कथाओं में वर्णित है। आगे चलकर भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है। भगवान कार्तिकेय ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध करके उसका वध किया।
इस कथा का संबंध मां स्कंदमाता के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि वे भगवान स्कंद की माता हैं। देवी का यह रूप मातृत्व के साथ-साथ उस शक्ति का प्रतीक है, जो संसार की रक्षा और धर्म की स्थापना में सहायक होती है। कथा का व्यापक संदेश यह है कि अहंकार और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, उनका अंत संभव है। साहस, धर्म और सामूहिक प्रयास से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है।
मां स्कंदमाता की आरती में छिपा है भक्ति और समर्पण का भाव
नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा के समापन पर आरती करने की परंपरा है। आरती के समय दीपक जलाकर देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। भक्त मां के गुणों का स्मरण करते हैं और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
मां स्कंदमाता की प्रचलित आरती की शुरुआती पंक्तियां इस प्रकार हैं—
जय तेरी हो स्कंद माता। पांचवां नाम तुम्हारा आता॥
सबके मन की जानन हारी। जग जननी सबकी महतारी॥
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं। हरदम तुझे ध्याता रहूं मैं॥
कई नामों से तुझे पुकारा। मुझे एक है तेरा सहारा॥
देवी को जगत की जननी और भक्तों के दुखों को दूर करने वाली माता के रूप में याद किया जाता है। श्रद्धालु आरती के दौरान अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और जीवन में सद्बुद्धि, धैर्य तथा शक्ति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। आरती के बाद देवी को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा पूजा को पूर्ण करने के साथ-साथ भक्तों के मन में श्रद्धा और सामूहिक भक्ति का भाव भी मजबूत करती है।
नवरात्रि के पांचवें दिन किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है?
नवरात्रि के प्रत्येक दिन के साथ अलग-अलग रंगों को जोड़ने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। मां स्कंदमाता की पूजा के अवसर पर पीले रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। पीला रंग प्रसन्नता, ऊर्जा, ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन अनेक श्रद्धालु पीले रंग के वस्त्र धारण करना पसंद करते हैं।
हालांकि, नवरात्रि के दिन के अनुसार रंगों का निर्धारण सभी परंपराओं में एक जैसा नहीं होता। क्षेत्रीय मान्यताओं, पंचांग और स्थानीय पूजा परंपराओं के अनुसार रंगों में अंतर देखने को मिल सकता है। इसलिए पीले वस्त्र पहनना आस्था और परंपरा से जुड़ी पसंद है, इसे पूजा के लिए अनिवार्य नियम नहीं समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के पास पीले वस्त्र उपलब्ध नहीं हैं, तो वह स्वच्छ वस्त्र पहनकर भी पूरी श्रद्धा के साथ मां की आराधना कर सकता है।
मां स्कंदमाता की पूजा करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
मां स्कंदमाता की पूजा करते समय स्वच्छता, श्रद्धा और संयम को प्राथमिकता देनी चाहिए। पूजा स्थल को साफ रखें और देवी को अर्पित की जाने वाली सामग्री स्वच्छ होनी चाहिए। दीपक जलाते समय आग से सुरक्षा का ध्यान रखें। यदि घर में छोटे बच्चे या बुजुर्ग हैं, तो दीपक और धूप को सुरक्षित स्थान पर रखें।
मंत्रों का जाप करते समय जल्दबाजी करने के बजाय उनके अर्थ और भाव पर ध्यान देना अधिक उपयोगी हो सकता है। उपवास रखने वाले लोगों को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। किसी बीमारी, कमजोरी या चिकित्सकीय प्रतिबंध की स्थिति में कठोर उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। पूजा और व्रत का उद्देश्य आत्मसंयम, श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना है, इसलिए स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा, धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान दूसरों की आस्था और परंपराओं का सम्मान करना भी आवश्यक है। नवरात्रि का पर्व केवल व्यक्तिगत पूजा का अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, सेवा और सहयोग की भावना को मजबूत करने का भी माध्यम है।
मां स्कंदमाता की आराधना का आधुनिक जीवन में क्या है संदेश?
आज के व्यस्त जीवन में मां स्कंदमाता का स्वरूप कई महत्वपूर्ण मूल्यों की याद दिलाता है। उनका मातृस्वरूप प्रेम, धैर्य, करुणा और जिम्मेदारी का संदेश देता है। परिवार में बच्चों का पालन-पोषण हो, बुजुर्गों की देखभाल हो या कठिन समय में किसी अपने का साथ देना हो, इन सभी परिस्थितियों में ममता और साहस दोनों की आवश्यकता होती है।
मां स्कंदमाता के एक हाथ में बाल स्कंद और दूसरे हाथ से आशीर्वाद देने का भाव यह दर्शाता है कि संरक्षण और आत्मविश्वास साथ-साथ चल सकते हैं। वहीं सिंह पर उनका विराजमान होना यह प्रेरणा देता है कि करुणा का अर्थ कमजोरी नहीं है। जरूरत पड़ने पर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और कठिन निर्णय लेना भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
देवी की आराधना के दौरान व्यक्ति अपने व्यवहार, विचारों और जिम्मेदारियों पर विचार कर सकता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, परिवार के सदस्यों के साथ संवाद, जरूरतमंदों की सहायता और समाज में सद्भाव बनाए रखना मां स्कंदमाता के प्रतीकात्मक संदेश को दैनिक जीवन में अपनाने के तरीके हो सकते हैं।
नवरात्रि का पांचवां दिन क्यों है विशेष? जानिए इसका आध्यात्मिक निष्कर्ष
शारदीय नवरात्रि का पांचवां दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की आराधना के लिए समर्पित है। देवी का यह स्वरूप मातृत्व और शक्ति के अद्वितीय संगम को दर्शाता है। कमल पर विराजमान देवी की सौम्यता, गोद में विराजमान बाल स्कंद और सिंह का पराक्रम भक्तों को प्रेम, पवित्रता और साहस का संदेश देते हैं।
इस दिन श्रद्धालु पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना करते हैं, मां के मंत्रों का जाप करते हैं और केले, खीर तथा अन्य सात्विक पकवानों का भोग लगाते हैं। तारकासुर की पौराणिक कथा देवी के मातृस्वरूप को भगवान कार्तिकेय के पराक्रम और धर्म की स्थापना से जोड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त आध्यात्मिक शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं।
नवरात्रि की साधना का वास्तविक महत्व केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व व्यक्ति को अपने भीतर करुणा, धैर्य, अनुशासन और साहस विकसित करने की प्रेरणा भी देता है। मां स्कंदमाता की आराधना करते हुए भक्त यही प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन में विवेक बना रहे, परिवार में प्रेम और सद्भाव कायम रहे तथा वे कठिन परिस्थितियों का सामना दृढ़ता से कर सकें। यही मां स्कंदमाता के स्वरूप का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश है।






