
संवाद 24 डेस्क। दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश देता है। देशभर में इस अवसर पर भगवान श्रीराम की विजय का स्मरण किया जाता है, दुर्गा पूजा के समापन से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं और अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। वर्ष 2026 में विजयादशमी 20 अक्टूबर को मनाई जा रही है। इस दिन मंदिरों, पूजा स्थलों और रामलीला मैदानों में विशेष आयोजन होते हैं। हालांकि, रावण दहन का समय और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का मुहूर्त स्थानीय पंचांग, सूर्यास्त और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
इस पर्व को लेकर लोगों के मन में कई सवाल रहते हैं। विजयादशमी की तिथि का निर्धारण कैसे होता है? रावण दहन के लिए कौन-सा समय शुभ माना जाता है? इस दिन शस्त्र पूजा और शमी वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है? आइए, दशहरे की धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, पूजा विधि और इससे जुड़े सांस्कृतिक संदेश को विस्तार से समझते हैं।
दशहरा 2026 की तिथि और विजय मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, विजयादशमी का पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर लगभग 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर लगभग 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। अधिकांश उत्तर भारतीय क्षेत्रों में उदया तिथि और प्रचलित धार्मिक परंपराओं के आधार पर 20 अक्टूबर को दशहरा मनाया जा रहा है। हालांकि, बंगाल सहित कुछ क्षेत्रों में विजयादशमी से जुड़े अनुष्ठान 21 अक्टूबर को किए जाएंगे। इसलिए स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय परंपराओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
विजयादशमी पर पूजा के लिए दोपहर का विजय मुहूर्त विशेष महत्व रखता है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक है। इस अवधि में भगवान श्रीराम की पूजा, शस्त्र पूजन और अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं। अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से शाम 3 बजकर 30 मिनट तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के कारण मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है।
रावण दहन कब करना शुभ माना जाता है?
दशहरे पर रावण दहन का आयोजन सामान्यतः सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह समय बुराई के अंत और धर्म की विजय के प्रतीकात्मक उत्सव के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में कुछ पंचांग गणनाओं के अनुसार प्रदोष काल लगभग शाम 5 बजकर 47 मिनट से शुरू होता है। हालांकि, रावण दहन का वास्तविक समय रामलीला समितियों, स्थानीय आयोजनों और संबंधित क्षेत्र के पंचांग के अनुसार तय किया जाता है। इसलिए अपने शहर में आयोजित कार्यक्रम का समय पहले से पता कर लेना उचित रहेगा।
रावण दहन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन में मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का प्रतीक भी है। रावण के दस सिरों को कई धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याओं में अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अन्य दुर्गुणों से जोड़कर देखा जाता है। जब रावण का पुतला जलाया जाता है, तो यह संदेश दिया जाता है कि व्यक्ति को अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। यही कारण है कि दशहरे के अवसर पर परिवारों के साथ रामलीला देखने और रावण दहन में शामिल होने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
दशहरा और विजयादशमी में क्या है अंतर?
सामान्य बोलचाल में दशहरा और विजयादशमी को एक ही त्योहार के दो नाम माना जाता है। विजयादशमी का अर्थ है विजय प्रदान करने वाली दशमी। उत्तर भारत में यह नाम भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से जुड़ा है, जबकि देश के कई अन्य हिस्सों में यह पर्व मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय और शारदीय नवरात्र के समापन से संबंधित है। दोनों परंपराएं धर्म की स्थापना, अन्याय के अंत और शक्ति के सदुपयोग का संदेश देती हैं।
दशहरे का नाम दस और हरा शब्दों से जोड़कर भी समझाया जाता है। प्रचलित मान्यता में यह दस प्रकार की बुराइयों पर विजय का प्रतीक है। वहीं विजयादशमी का धार्मिक अर्थ किसी महत्वपूर्ण संघर्ष में सफलता और धर्म के पक्ष में विजय से जुड़ता है। इस पर्व की यही व्यापकता इसे भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान देती है।
श्रीराम की विजय से जुड़ी है रावण दहन की परंपरा
रामायण की कथा के अनुसार, लंका के राजा रावण ने माता सीता का हरण किया था। माता सीता को मुक्त कराने के लिए भगवान श्रीराम ने वानर सेना की सहायता से लंका की ओर प्रस्थान किया। इस संघर्ष में हनुमान, सुग्रीव, अंगद और अन्य सहयोगियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें रावण का वध हुआ और माता सीता को मुक्त कराया गया।
धार्मिक परंपरा में इस विजय को अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में देखा जाता है। रावण विद्वान, शक्तिशाली और शिवभक्त माना जाता था, लेकिन उसके अहंकार और अनुचित आचरण ने उसके पतन का मार्ग तैयार किया। इस कथा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव होने के बावजूद यदि व्यक्ति मर्यादा और नैतिकता का पालन नहीं करता, तो उसका पतन हो सकता है।
रामलीला में इस प्रसंग का मंचन दशहरे के सबसे आकर्षक आयोजनों में शामिल होता है। कलाकारों द्वारा रामायण के प्रमुख प्रसंगों का अभिनय किया जाता है और युद्ध के अंतिम दृश्य के बाद रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इन आयोजनों में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भागीदारी रहती है। कई स्थानों पर मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक झांकियां भी आयोजित की जाती हैं।
मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय का भी है पर्व
दशहरे का महत्व केवल रामायण की कथा तक सीमित नहीं है। देवी परंपरा में यह दिन मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा हुआ है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, महिषासुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर दिया था। उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी और महिषासुर के बीच लंबे समय तक युद्ध चला और अंततः मां दुर्गा ने उसका वध कर दिया।
इस विजय को शक्ति, साहस और न्याय की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और देश के अन्य हिस्सों में दुर्गा पूजा के अंतिम चरण में विजयादशमी का विशेष महत्व रहता है। भक्त मां दुर्गा की आराधना करते हैं और कई स्थानों पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। इस तरह एक ही पर्व अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के माध्यम से बुराई के अंत और सकारात्मक शक्तियों की विजय का संदेश देता है।
दशहरे पर शस्त्र पूजा क्यों की जाती है?
विजयादशमी पर शस्त्र पूजा करने की परंपरा भी प्राचीन मानी जाती है। परंपरागत रूप से राजा, सैनिक और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करके शक्ति, साहस और विजय की कामना करते थे। वर्तमान समय में भी कई स्थानों पर सेना, पुलिस और सुरक्षा से जुड़े लोग शस्त्र पूजन करते हैं। वहीं किसान, कारीगर, वाहन चालक और दूसरे व्यवसायों से जुड़े लोग अपने काम में उपयोग होने वाले औजारों तथा उपकरणों की पूजा करते हैं।
इस परंपरा का उद्देश्य केवल हथियारों की पूजा करना नहीं है। इसका व्यापक संदेश शक्ति और साधनों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ करना भी है। जिस प्रकार अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग रक्षा और न्याय के लिए किया जाना चाहिए, उसी तरह जीवन में प्राप्त ज्ञान, धन और अधिकार का इस्तेमाल भी समाज के हित में होना चाहिए।
महाभारत से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में छिपाकर रखे थे। अज्ञातवास पूरा होने पर अर्जुन ने शस्त्र वापस प्राप्त किए और युद्ध में उनका उपयोग किया। इसी प्रसंग को विजयादशमी पर शमी वृक्ष और शस्त्र पूजन की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
शमी वृक्ष और अपराजिता पूजा का महत्व
दशहरे के अवसर पर शमी वृक्ष की पूजा करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यता में शमी को शुभता, विजय और समृद्धि से जोड़ा जाता है। कुछ स्थानों पर लोग शमी के वृक्ष के सामने दीपक जलाते हैं, जल अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कुछ क्षेत्रों में शमी के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप से एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं देने की परंपरा भी निभाई जाती है।
विजयादशमी पर अपराजिता देवी की पूजा भी की जाती है। अपराजिता का अर्थ है जिसे पराजित न किया जा सके। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस पूजा से व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति और अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन की परंपराएं विशेष रूप से अपराह्न काल से जुड़ी मानी जाती हैं। हालांकि, इनका पालन क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
दशहरे पर कैसे करें पूजा?
विजयादशमी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनना और अपने आराध्य देव का स्मरण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद घर के पूजा स्थल की सफाई करके भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पूजा की जा सकती है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार फूल, अक्षत, रोली, दीपक और नैवेद्य अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान परिवार की सुख-शांति और समाज के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
यदि परिवार में शस्त्र पूजा की परंपरा है, तो सुरक्षित तरीके से अस्त्र-शस्त्र या कार्य में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा की जा सकती है। इसी प्रकार शमी वृक्ष की पूजा करने वाले श्रद्धालु स्थानीय रीति के अनुसार पूजा संपन्न कर सकते हैं। पूजा के बाद जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करना भी पुण्यकारी माना जाता है।
पूजा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक कार्य अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार किए जाएं। शुभ मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग देखना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग शहरों में समय का अंतर हो सकता है। पूजा की कोई ऐसी विधि अपनाने की आवश्यकता नहीं है जो परिवार की परंपरा के अनुकूल न हो।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरे की अनोखी परंपराएं
भारत की सांस्कृतिक विविधता दशहरे के उत्सव में स्पष्ट दिखाई देती है। उत्तर भारत में रामलीला और रावण दहन प्रमुख आकर्षण होते हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कई अन्य राज्यों में बड़े मैदानों में रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतले बनाए जाते हैं। शाम के समय हजारों लोग इन आयोजनों को देखने पहुंचते हैं।
पश्चिम बंगाल में विजयादशमी दुर्गा पूजा के समापन से जुड़ी है। यहां सिंदूर खेला, देवी को विदाई और प्रतिमा विसर्जन जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। कर्नाटक के मैसूर में दशहरे का उत्सव अपनी भव्य शोभायात्राओं और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र में कुछ समुदाय शमी के पत्तों का आदान-प्रदान करते हैं, जबकि दक्षिण भारत के कई हिस्सों में आयुध पूजा और विद्या से जुड़े अनुष्ठानों का विशेष महत्व रहता है।
इन विभिन्न परंपराओं के बावजूद पर्व का मूल भाव समान है। यह मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने, अन्याय का विरोध करने और समाज में सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
आज के जीवन में दशहरे का संदेश क्यों है महत्वपूर्ण?
आधुनिक जीवन में दशहरे का संदेश पहले की तरह ही प्रासंगिक है। आज रावण के पुतले के साथ-साथ उन प्रवृत्तियों पर भी विचार करने की आवश्यकता है जो समाज और व्यक्ति के विकास में बाधा बनती हैं। अहंकार, लालच, क्रोध, भेदभाव, झूठ और दूसरों के अधिकारों का हनन ऐसी बुराइयां हैं जिनसे परिवारों और समाज में तनाव पैदा होता है।
यदि दशहरे के दिन व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार का संकल्प ले, तो यह त्योहार केवल एक वार्षिक आयोजन बनकर नहीं रह जाएगा। बच्चों को रामायण की कथाओं के माध्यम से सत्य, मर्यादा, साहस और कर्तव्य का महत्व समझाया जा सकता है। परिवार में आपसी सम्मान बढ़ाने, जरूरतमंदों की सहायता करने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प भी इस अवसर को अधिक सार्थक बना सकता है।
रावण दहन के आयोजन में सुरक्षा और पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है। पुतलों के दहन के दौरान निर्धारित दूरी बनाए रखनी चाहिए और बच्चों को आतिशबाजी से दूर रखना चाहिए। आयोजकों को स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए, ताकि धार्मिक उत्सव आनंद और सुरक्षा के साथ संपन्न हो सके।
बुराई पर विजय का संकल्प लेने का दिन है विजयादशमी
विजयादशमी 2026 केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाने वाला अवसर भी है। 20 अक्टूबर को देश के अधिकांश हिस्सों में मनाए जा रहे इस त्योहार पर भगवान श्रीराम की विजय और मां दुर्गा की शक्ति का स्मरण किया जा रहा है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक है, जबकि रावण दहन सामान्यतः सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में किया जाता है। स्थानीय कार्यक्रमों और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार समय में अंतर संभव है।
दशहरे की वास्तविक सार्थकता तभी है जब व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करे। रावण दहन के साथ यदि अहंकार, अन्याय और द्वेष को त्यागने का संकल्प लिया जाए, तो विजयादशमी का संदेश जीवन में उतर सकता है। यही इस पर्व की सबसे बड़ी सीख है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए विजय की आशा बनाए रखनी चाहिए।






