
संवाद 24 डेस्क। पितृ पक्ष में जब कोई व्यक्ति अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करता है तो आपने अक्सर देखा होगा कि वह जल हथेली की उंगलियों के सिरों से नहीं, बल्कि अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से से छोड़ता है। आम बोलचाल में इसे “अंगूठे से तर्पण करना” कहा जाता है। लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से बात थोड़ी अलग है। पितरों के लिए जल अर्पित करने का निर्धारित स्थान अंगूठे और तर्जनी के बीच का भाग माना गया है, जिसे पितृतीर्थ कहा जाता है। मनुस्मृति में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग तीर्थों से संबद्ध किया गया है और पितृतीर्थ को अंगूठे तथा तर्जनी के बीच के क्षेत्र से जोड़ा गया है।
यही कारण है कि पितृ पक्ष में तर्पण करते समय जल को हथेली के सामने वाले हिस्से से सीधे नहीं गिराया जाता। धार्मिक परंपरा के अनुसार जल को पितृतीर्थ से प्रवाहित किया जाता है। यह केवल लोकाचार नहीं है, बल्कि इसके पीछे धर्मशास्त्रीय आधार भी मिलता है।
मनुस्मृति में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को बताया गया है ‘तीर्थ’
तर्पण की इस परंपरा को समझने के लिए मनुस्मृति के दूसरे अध्याय का 59वां श्लोक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें हथेली के विभिन्न भागों को अलग-अलग तीर्थों से जोड़ा गया है। अंगूठे के मूल के पास के हिस्से को ब्रह्मतीर्थ, उंगलियों के मूल को काय या प्राजापत्य तीर्थ, उंगलियों के अग्रभाग को देवतीर्थ और इनके नीचे के हिस्से को पितृतीर्थ कहा गया है। परंपरागत व्याख्या में पितृतीर्थ को अंगूठे और तर्जनी के बीच का क्षेत्र माना गया है।
इससे स्पष्ट होता है कि तर्पण में हाथ की मुद्रा कोई बाद में बनाई गई सामान्य परंपरा नहीं है। भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में स्वयं हथेली के अलग-अलग हिस्सों को धार्मिक कर्मों के लिए विशिष्ट माना गया है।
महाभारत में भी मिलता है अंगूठे और तर्जनी के बीच से पितृ कर्म करने का उल्लेख
इस परंपरा का एक और महत्वपूर्ण संदर्भ महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है। महाभारत के 13वें पर्व के एक श्लोक में कहा गया है कि पितृ संबंधी कर्म करते समय अंगूठे और तर्जनी के बीच के मध्य भाग का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे यह संकेत मिलता है कि पितरों के लिए जल अथवा संबंधित कर्म में हाथ के इसी हिस्से की धार्मिक विशिष्टता प्राचीन परंपरा में स्थापित थी।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि “पितरों को अंगूठे से जल दिया जाता है” एक सरल लोकभाषाई अभिव्यक्ति है। शास्त्रीय रूप से जल अंगूठे और तर्जनी के मध्य स्थित पितृतीर्थ से अर्पित किया जाता है।
पितृतीर्थ का अर्थ क्या है?
‘तीर्थ’ शब्द का धार्मिक अर्थ केवल नदी, सरोवर या किसी पवित्र स्थान तक सीमित नहीं है। धार्मिक कर्मकांड की परंपरा में शरीर के कुछ विशेष स्थानों को भी प्रतीकात्मक रूप से ‘तीर्थ’ कहा गया है। तर्पण के संदर्भ में हथेली का वह भाग जहां से पितरों को जल अर्पित किया जाता है, पितृतीर्थ कहलाता है।
इस व्यवस्था का एक उद्देश्य अलग-अलग प्रकार के अर्पणों के लिए अलग-अलग हस्त-मुद्रा निर्धारित करना भी माना जा सकता है। परंपरागत तर्पण विधि में देवताओं के लिए उंगलियों के अग्रभाग अर्थात देवतीर्थ का उपयोग, जबकि पितरों के लिए अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग अर्थात पितृतीर्थ का उपयोग बताया गया है।
इस प्रकार हाथ की मुद्रा स्वयं यह संकेत करती है कि अर्पण किसके निमित्त किया जा रहा है।
देवताओं और पितरों के तर्पण में हाथ की मुद्रा अलग क्यों?
तर्पण की परंपरा में देव, ऋषि और पितृ—तीनों के लिए अलग-अलग विधियां बताई गई हैं। देवताओं के लिए जल उंगलियों के अग्रभाग से अर्पित करने की परंपरा मिलती है, जबकि पितरों के लिए अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग यानी पितृतीर्थ का प्रयोग किया जाता है। कुछ परंपराओं में ऋषियों या मनुष्य-पितरों के लिए भी अलग हस्त-स्थान निर्धारित किए गए हैं।
इस अंतर का धार्मिक महत्व यह है कि एक ही जल अर्पण की क्रिया अलग-अलग देवताओं या पूर्वजों के निमित्त अलग पहचान के साथ की जा सके। यानी हाथ की मुद्रा तर्पण के उद्देश्य को स्पष्ट करने वाली अनुष्ठानिक व्यवस्था का हिस्सा है।
दक्षिण दिशा और पितृतीर्थ का क्या संबंध है?
पितृ तर्पण में केवल हाथ की मुद्रा ही महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती, बल्कि दिशा का भी विशेष महत्व है। पारंपरिक विधि में पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा मिलती है। तर्पण संबंधी स्रोतों में देवताओं के लिए पूर्वाभिमुख और पितरों के लिए दक्षिणाभिमुख होने का उल्लेख मिलता है।
हिंदू धार्मिक परंपरा में दक्षिण दिशा का संबंध पितरों और यम से जोड़ा गया है। इसलिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करना और पितृतीर्थ से जल अर्पित करना एक ही अनुष्ठानिक व्यवस्था के दो हिस्से माने जाते हैं।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि दक्षिण दिशा या पितृतीर्थ से जल प्रवाहित करने का धार्मिक अर्थ आस्था और शास्त्रीय परंपरा से संबंधित है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक अर्थ में मृत व्यक्ति तक जल पहुंचने की भौतिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
तर्पण में काले तिल क्यों मिलाए जाते हैं?
पितृ पक्ष में तर्पण की बात हो और काले तिल का उल्लेख न हो, ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। कई परंपराओं में जल के साथ काले तिल का प्रयोग किया जाता है और इसे तिल तर्पण कहा जाता है। पितृ तर्पण से संबंधित पारंपरिक विधियों में काले तिल मिश्रित जल को पितृतीर्थ से अर्पित करने का विधान मिलता है।
तिल के महत्व को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में विभिन्न व्याख्याएं मिलती हैं। धार्मिक दृष्टि से तिल को पितृ कर्म में महत्वपूर्ण सामग्री माना गया है। हालांकि इसके बारे में प्रचलित हर लोकव्याख्या को सीधे किसी प्राचीन ग्रंथ का कथन मान लेना उचित नहीं है।
तर्पण में तीन अंजलि जल देने की परंपरा भी क्यों है?
पितृ तर्पण की कई पारंपरिक विधियों में प्रत्येक पितर के लिए तीन अंजलि जल अर्पित करने का विधान मिलता है। तर्पण संबंधी परंपरागत स्रोतों में देवताओं के लिए एक, ऋषियों के लिए दो और पितरों के लिए तीन अंजलि का उल्लेख मिलता है।
यहां भी परिवार, क्षेत्र और कर्मकांड की शाखा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है। इसलिए तीन अंजलि की परंपरा को सामान्य शास्त्रीय विधान के रूप में समझना चाहिए, लेकिन किसी विशेष श्राद्ध कर्म में स्थानीय आचार्य द्वारा बताई गई विधि को प्राथमिकता दी जा सकती है।
क्या जल सचमुच पितरों तक पहुंचता है?
यह सवाल आधुनिक समय में स्वाभाविक रूप से उठता है। धार्मिक दृष्टि से तर्पण का उद्देश्य पितरों को जल अर्पित करना और उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करना है। आस्था में यह विश्वास मिलता है कि विधिपूर्वक किया गया तर्पण पितरों को तृप्त करता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि पृथ्वी पर किसी पात्र या नदी में अर्पित किया गया जल भौतिक रूप से किसी दिवंगत व्यक्ति तक पहुंचता है। इसलिए दोनों दृष्टिकोणों को अलग रखना जरूरी है। तर्पण का धार्मिक फल आस्था का विषय है, जबकि जल के भौतिक रूप से मृत व्यक्ति तक पहुंचने का दावा वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।
क्या केवल अंगूठे से जल छोड़ देना ही तर्पण है?
नहीं। तर्पण केवल हाथ की एक मुद्रा का नाम नहीं है। इसके साथ संकल्प, पितरों का स्मरण, उचित सामग्री, दिशा, मंत्र और परिवार की परंपरा जैसे अनेक तत्व जुड़े हो सकते हैं। विस्तृत पितृ तर्पण में कुशा और तिल का प्रयोग भी कई परंपराओं में किया जाता है।
इसलिए सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली किसी एक छोटी विधि को पूरे शास्त्रीय तर्पण विधान के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा। सामान्य गृह तर्पण और वैदिक विधि से किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में अंतर हो सकता है।
पितृ पक्ष में तर्पण का असली संदेश क्या है?
पितृ पक्ष की पूरी परंपरा को यदि केवल कर्मकांड की दृष्टि से देखा जाए तो इसका एक बड़ा सांस्कृतिक पक्ष छूट जाता है। तर्पण व्यक्ति को अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर देता है। जिन लोगों ने परिवार को जन्म दिया, कठिन परिस्थितियों में उसे आगे बढ़ाया और अगली पीढ़ियों के लिए जीवन की नींव रखी, उनका स्मरण भारतीय परंपरा में कृतज्ञता के भाव से किया जाता है।
जल की कुछ बूंदें इसी स्मरण का प्रतीक बनती हैं। हाथ में लिया गया जल जब पितृतीर्थ से धरती पर गिरता है तो धार्मिक मान्यता में वह पूर्वजों के प्रति अर्पण माना जाता है। सामाजिक दृष्टि से यह परिवार की स्मृतियों और पीढ़ियों के बीच संबंध को मजबूत करने वाला संस्कार भी है।
अंगूठा नहीं, पितृतीर्थ है इस परंपरा का केंद्र
पितृ पक्ष में पितरों को जल देते समय अंगूठे और तर्जनी के बीच से जल छोड़ने की परंपरा के पीछे एक स्पष्ट शास्त्रीय अवधारणा है। इस स्थान को पितृतीर्थ कहा गया है। मनुस्मृति में हथेली के विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग तीर्थों से संबद्ध किया गया है और महाभारत में भी अंगूठे तथा तर्जनी के मध्य भाग से पितृ कर्म करने का उल्लेख मिलता है।
इसलिए अगली बार जब पितृ पक्ष में कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते दिखाई दे तो इसे केवल “अंगूठे से पानी छोड़ने” की सामान्य क्रिया के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके पीछे हाथ की एक निर्धारित धार्मिक मुद्रा, पितृतीर्थ की अवधारणा और सदियों पुरानी तर्पण परंपरा जुड़ी हुई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तर्पण की मूल भावना श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता है। शास्त्रीय विधि का पालन करते हुए पूर्वजों को याद करना ही इस परंपरा का केंद्रीय भाव है।






