रामनगरिया मेला: गंगा तट पर आकार ले रहा आस्था और संस्कृति का अस्थायी नगर
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संवाद 24 संवाददाता।
प्रयागराज के माघ मेले की तर्ज पर फर्रुखाबाद के गंगा तट स्थित पांचाल घाट (प्राचीन घाटियाघाट) पर लगने वाले प्रसिद्ध रामनगरिया मेले की तैयारियां तेज हो गई हैं। आगामी 3 जनवरी से 3 फरवरी तक चलने वाले इस माहभर के मेले को लेकर मेला समिति ने भूमि समतलीकरण सहित बुनियादी इंतजाम युद्धस्तर पर शुरू करा दिए हैं।
गंगा किनारे धीरे-धीरे तंबुओं का शहर बसने लगा है। साधु-संत अपने-अपने अखाड़ों और क्षेत्रों के निर्धारण के लिए पहुंचने लगे हैं, जबकि 10 दिसंबर के बाद संतों के आगमन में और तेजी आने की संभावना है। प्रदेश के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शुमार रामनगरिया मेला ‘मिनी कुंभ’ के नाम से भी जाना जाता है।
मेले की खास पहचान एक माह का कल्पवास है। देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहां कल्पवास के लिए आते हैं और गंगा तट पर तंबू डालकर निवास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कल्पवास से साधक के तन-मन का शुद्धिकरण होता है। इसके लिए श्रद्धालुओं को सत्य, संयम और अनुशासन से जुड़े 21 नियमों का पालन करना होता है, जिनमें नित्य गंगा स्नान, एक समय भोजन, ब्रह्मचर्य, नशे से दूरी और भूमि पर शयन प्रमुख हैं।
हर वर्ष करीब 20 हजार कल्पवासी रामनगरिया मेले में शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के साथ-साथ मेले में मनोरंजन और सांस्कृतिक गतिविधियों की भी व्यापक व्यवस्था रहती है। बच्चों के लिए सर्कस, नौटंकी और मौत का कुआं जैसे आकर्षण लगाए जाते हैं। ग्रामीण बाजार में दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं सहज उपलब्ध रहती हैं।
रात्रि के समय सांस्कृतिक मंच पर कवि सम्मेलन, मुशायरे और विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साधु-संतों के पंडालों में प्रवचन और कथा-वार्ताएं होती हैं, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
प्रशासन की ओर से निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, साफ-सफाई, पेयजल और सरकारी राशन वितरण जैसी व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की जा रही हैं।
रामनगरिया मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि फर्रुखाबाद की सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का जीवंत उत्सव है, जो हर वर्ष गंगा तट को आस्था, साधना और संस्कृति के संगम में बदल देता है।






