
संवाद 24 नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी माने जाने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के सिर पर अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय संकट मंडराने लगा है। अमेरिकी सरकार पर कुल राष्ट्रीय कर्ज का आंकड़ा इतिहास में पहली बार 40 लाख करोड़ डॉलर (40 ट्रिलियन डॉलर) के अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। इस चौंकाने वाले आंकड़े ने न केवल वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं को हिलाकर रख दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में भी खतरे की घंटी बजा दी है। महज पिछले एक दशक के भीतर अमेरिका का यह राष्ट्रीय कर्ज दोगुना हो चुका है। वर्ष 2016 में जहां यह 20 ट्रिलियन डॉलर से नीचे था, वहीं अब यह बढ़कर 40 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल चुका है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
प्रति नागरिक लाखों का कर्ज और ब्याज का रिकॉर्ड बोझ
अमेरिकी वित्त विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, देश पर लदे इस भारी-भरकम कर्ज का सीधा असर वहां के आम नागरिकों पर देखा जा सकता है। यदि इस पूरे कर्ज को देश की कुल आबादी में समान रूप से विभाजित किया जाए, तो वर्तमान में प्रत्येक अमेरिकी नागरिक के हिस्से में लगभग 1,19,699 डॉलर (करीब एक करोड़ रुपये) का कर्ज आता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश में जन्म लेने वाला हर नया बच्चा भी लाखों रुपये के कर्जदार के तौर पर अपनी जिंदगी की शुरुआत कर रहा है।
इस पूरे संकट का सबसे चिंताजनक पहलू दैनिक ब्याज भुगतान है। अमेरिकी सरकार को इस विशाल कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए हर दिन लगभग 3.80 अरब डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। ब्याज अदायगी का यह भारी खर्च देश के कई प्रमुख सामाजिक और रक्षा बजटीय आवंटनों पर भारी पड़ रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि राजस्व का इतना बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज में चले जाने से भविष्य में बुनियादी ढांचे, जनस्वास्थ्य, अनुसंधान और शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्रों में सरकारी निवेश के लिए धन की भारी कमी हो जाएगी।
किन कारणों से बेकाबू हुआ कर्ज का यह आंकड़ा?
अमेरिका के इस गंभीर वित्तीय दलदल में फंसने के पीछे कई आंतरिक नीतियां और सामाजिक कारण प्रमुख रहे हैं:
लगातार बढ़ता सरकारी खर्च: पिछले दो दशकों के दौरान रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही प्रशासनों के कार्यकाल में बजट घाटा तेजी से बढ़ा है। पूर्व में की गई व्यापक टैक्स कटौतियों और राहत पैकेजों के भारी खर्च ने सरकारी खजाने पर दबाव को कई गुना बढ़ा दिया। बुजुर्ग होती आबादी और सामाजिक सुरक्षा: देश में ‘बेबी बूमर’ पीढ़ी तेजी से सेवानिवृत्त हो रही है, जहां प्रतिदिन लगभग 10,000 नागरिक रिटायर हो रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ने के साथ ही मेडिकेयर (Medicare) और सोशल सिक्योरिटी जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जबकि टैक्स देने वाले कामकाजी युवाओं का अनुपात लगातार घट रहा है।
रक्षा खर्च और भू-राजनीतिक टकराव: वैश्विक स्तर पर जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीय सहायता और सैन्य अभियानों पर होने वाले भारी खर्च ने भी राष्ट्रीय ऋण को लगातार ऊपर धकेलने का काम किया है।
छह वर्षों में 50 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की आशंका
वित्तीय निगरानी संस्था ‘पीटर जी. पीटरसन फाउंडेशन’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल पीटरसन ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए चेतावनी दी है कि जिस तेज रफ्तार से यह कर्ज बढ़ रहा है, उससे अगले केवल छह वर्षों में अमेरिका का कुल कर्ज 50 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े तक पहुंच सकता है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद से अब तक अमेरिकी कर्ज में 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पिछले महज पांच महीनों के भीतर ही राष्ट्रीय कर्ज में 1 ट्रिलियन डॉलर की नई बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक संख्यात्मक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता और भावी पीढ़ियों के भविष्य को सीधे तौर पर खतरे में डालने वाली स्थिति है।
वैश्विक बाजार और भारत पर संभावित असर
चूंकि अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्राथमिक रिजर्व करेंसी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का मुख्य माध्यम है, इसलिए अमेरिकी राजकोषीय संकट का सीधा प्रभाव दुनिया के बाकी देशों पर पड़ना तय है। डॉलर के मूल्य में संभावित अस्थिरता और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव से वैश्विक मुद्रा बाजार प्रभावित हो सकते हैं। भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इससे विदेशी संस्थागत निवेश (FII) का प्रवाह, आयात-निर्यात लागत और मुद्रा की विनिमय दर प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि अमेरिका ने अपने खर्चों और बजटीय प्राथमिकताओं पर तत्काल कड़े कदम नहीं उठाए, तो इसका परिणाम न केवल अमेरिकी नागरिकों को भुगतना पड़ेगा बल्कि पूरी दुनिया की वित्तीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है।






