
संवाद 24 नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में छात्र आंदोलनों और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर छिड़ा विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में जंतर-मंतर से संसद की ओर निकाले गए विशाल छात्र मार्च के दौरान हुए भारी बवाल और पुलिस बल प्रयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और कड़ा रुख अख्तियार किया है। शीर्ष अदालत ने मामले की तह तक जाने और दोनों पक्षों के दावों की सच्चाई सामने लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय जांच समिति (High-Powered Probe Committee) गठित करने का फैसला लिया है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक किसी भी जांच का कोई वास्तविक मतलब नहीं रह जाता। अदालत का मानना है कि प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई और पुलिस पर लगे गंभीर आरोपों की जांच पूरी तरह से स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक सबूतों पर आधारित होनी चाहिए।
क्यों पड़ी हाई-पावर्ड कमेटी की जरूरत?
संसद मार्च के दौरान हुए लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोलों और कथित तौर पर पेलेट गन व इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं और पत्रकारों पर अत्यधिक व असंगत बल प्रयोग किया गया। वहीं, दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन का पक्ष है कि भीड़ बेकाबू हो गई थी और कुछ उपद्रवी तत्वों ने शांतिपूर्ण आंदोलन की आड़ में घुसपैठ कर पुलिसकर्मियों पर हमला किया और सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की।
इस खींचतान और परस्पर विरोधी बयानों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने का फैसला किया कि मामले की पड़ताल किसी भी प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर एक स्वतंत्र न्यायिक टीम द्वारा की जाए।
कमेटी की संरचना और विशेष दायित्व
सर्वोच्च अदालत द्वारा तैयार की जा रही इस तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति में शामिल होंगे:
1- अध्यक्ष: सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश।
2- सदस्य: किसी उच्च न्यायालय (High Court) के पूर्व मुख्य न्यायाधीश।
3- पुलिस विशेषज्ञ: सीबीआई (CBI) के पूर्व निदेशक अथवा किसी राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) रैंक के वरिष्ठ अधिकारी।
पीठ ने सुनवाई के दौरान उल्लेख किया कि उन्होंने पूर्व न्यायाधीशों की सहमति प्राप्त कर ली है, हालांकि अवांछित सार्वजनिक बहस और पूर्वाग्रह से बचने के लिए औपचारिक घोषणा से पहले नामों को गोपनीय रखा गया।
यह समिति न केवल 20 जुलाई की घटना में पुलिस की ज्यादतियों और उपद्रवियों की भूमिका की गहन जांच करेगी, बल्कि भविष्य में भीड़ नियंत्रण के लिए ‘ग्रेडेड यूज़ ऑफ फोर्स’ (चरणबद्ध व सीमित बल प्रयोग) के लिए नए मानक और सख्त दिशा-निर्देश भी तय करेगी, ताकि लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों में अनावश्यक हिंसा से बचा जा सके।
सबूतों को सुरक्षित रखने और छात्रों को राहत के कड़े निर्देश
अदालत ने सुनवाई के दौरान अंतरिम राहत देते हुए पुलिस और संबंधित राज्य सरकारों को सख्त निर्देश जारी किए हैं:
1- प्रदर्शन स्थल के सभी सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage), ड्रोन रिकॉर्डिंग, पुलिस कर्मियों के बॉडी-वॉर्म कैमरा फुटेज, पीसीआर कॉल और वायरलेस संदेशों के पूरे रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखा जाए।
2- किसी भी छात्र के डिजिटल डेटा या व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक डोमेन में उजागर न किया जाए।
3- हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया गया, साथ ही बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सामान्य छात्रों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई गई।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि सरकार छात्रों को उपद्रवी नहीं मानती और मामले की निष्पक्ष जांच कराने में प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है।






