
संवाद 24 डेस्क। अंकशास्त्र में जन्मतिथि को केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं माना जाता, बल्कि इसे व्यक्ति के स्वभाव और जीवन की प्रवृत्तियों को समझने के लिए एक प्रतीकात्मक आधार के रूप में देखा जाता है। इसी संदर्भ में मूलांक का विशेष महत्व बताया जाता है। मूलांक निकालने की प्रक्रिया बेहद सरल है और इसके लिए जन्म की पूरी तारीख की आवश्यकता भी नहीं होती। सामान्य अंकशास्त्रीय पद्धति में जन्म की तारीख यानी महीने की कौन-सी तारीख को व्यक्ति का जन्म हुआ, उसी तारीख के अंकों को जोड़कर एक अंक प्राप्त किया जाता है। यदि योग दो अंकों में आता है, तो उन दोनों अंकों को फिर जोड़ा जाता है, जब तक कि 1 से 9 के बीच कोई एक अंक प्राप्त न हो जाए। यही अंक मूलांक कहलाता है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। अंकशास्त्र एक पारंपरिक और विश्वास-आधारित प्रणाली है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित व्यक्तित्व-मूल्यांकन पद्धति नहीं। इसलिए मूलांक से जुड़े निष्कर्षों को निश्चित भविष्यवाणी के बजाय सांस्कृतिक और ज्योतिषीय-अंकशास्त्रीय मान्यताओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
मूलांक आखिर होता क्या है?
मूलांक शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—‘मूल’ यानी आधार और ‘अंक’ यानी संख्या। अंकशास्त्र में इसे व्यक्ति की जन्मतिथि से निकाला जाने वाला एक प्रमुख अंक माना जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म किसी महीने की 7 तारीख को हुआ है, तो उसका मूलांक 7 होगा। यदि जन्म 14 तारीख को हुआ है, तो 1 और 4 को जोड़ने पर 5 प्राप्त होता है, इसलिए मूलांक 5 माना जाएगा।
इसी प्रकार 23 तारीख को जन्म लेने वाले व्यक्ति के लिए 2 + 3 = 5 होगा। यानी जन्मतिथि 23 होने के बावजूद मूलांक 5 माना जाएगा। इस गणना की खूबी यह है कि इसमें गणित बहुत आसान है, लेकिन अंकशास्त्र में इसके आधार पर व्यक्ति के स्वभाव, पसंद, व्यवहार और जीवन की कुछ प्रवृत्तियों की व्याख्या करने का प्रयास किया जाता है।
सबसे आसान नियम: जन्म की तारीख के अंक जोड़िए
मूलांक निकालने का सबसे सरल नियम है कि जन्म की तारीख को एक अंक में बदला जाए। यदि जन्म 1 से 9 तारीख के बीच हुआ है, तो वही संख्या मूलांक होती है। जैसे 2 तारीख को जन्म हुआ है तो मूलांक 2 और 8 तारीख को जन्म हुआ है तो मूलांक 8 होगा।
यदि जन्म 10 से 31 तारीख के बीच हुआ है, तो तारीख के दोनों अंकों को जोड़ना होता है। उदाहरण के लिए 10 का योग 1 + 0 = 1 होगा। 12 का योग 1 + 2 = 3 होगा। 18 का योग 1 + 8 = 9 होगा। 24 का योग 2 + 4 = 6 होगा और 29 का योग 2 + 9 = 11 होगा। इसके बाद 11 को फिर 1 + 1 = 2 किया जाएगा। इस तरह मूलांक 2 प्राप्त होगा।
इसे एक सरल सूत्र की तरह समझें—जन्मतिथि के अंकों का योग करें और आवश्यकता पड़ने पर दोबारा योग करके 1 से 9 के बीच एक अंक प्राप्त करें।
उदाहरणों से समझिए मूलांक निकालने का तरीका
मान लीजिए किसी व्यक्ति का जन्म 6 तारीख को हुआ है। यहां केवल एक अंक है, इसलिए उसका मूलांक सीधे 6 होगा।
अब किसी व्यक्ति की जन्मतिथि 15 है। यहां 1 + 5 = 6 होगा। इसलिए मूलांक 6 माना जाएगा।
यदि जन्मतिथि 21 है तो 2 + 1 = 3 होगा। इसलिए मूलांक 3 होगा।
इसी तरह 27 तारीख के लिए 2 + 7 = 9 होगा, इसलिए मूलांक 9 होगा।
अब 29 का उदाहरण लें। 2 + 9 = 11 आता है। चूंकि अभी एक अंक प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए 1 + 1 = 2 किया जाएगा। इस प्रकार 29 तारीख को जन्म लेने वाले व्यक्ति का मूलांक 2 माना जाएगा।
यही कारण है कि मूलांक निकालने के लिए जन्म का महीना और वर्ष जोड़ना आवश्यक नहीं होता। सामान्य अंकशास्त्रीय पद्धति में मूलांक मुख्य रूप से जन्म की तारीख से निर्धारित किया जाता है।
1 से 9 तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया
मूलांक की गणना को और आसान बनाने के लिए 1 से 31 तक की जन्मतिथियों को देखा जा सकता है। 1 से 9 तारीख तक मूलांक वही रहेगा। 10 का मूलांक 1, 11 का 2, 12 का 3, 13 का 4, 14 का 5, 15 का 6, 16 का 7, 17 का 8 और 18 का 9 होगा।
इसके बाद 19 का मूलांक 1 + 9 = 10 और फिर 1 + 0 = 1 होगा। 20 का मूलांक 2, 21 का 3, 22 का 4, 23 का 5, 24 का 6, 25 का 7, 26 का 8, 27 का 9 होगा। इसी क्रम में 28 का मूलांक 1 और 29 का 2 होगा। 30 का मूलांक 3 और 31 का मूलांक 4 माना जाएगा।
इससे साफ होता है कि मूलांक निकालने की प्रक्रिया किसी जटिल गणित पर आधारित नहीं है। असली जिज्ञासा इसके बाद शुरू होती है, जब अंकशास्त्र में उस अंक से जुड़ी विशेषताओं की व्याख्या की जाती है।
क्या 11, 22 जैसे अंकों को भी एक अंक में बदलना चाहिए?
यह विषय अंकशास्त्र की अलग-अलग परंपराओं में थोड़ा अलग तरीके से देखा जाता है। कुछ आधुनिक अंकशास्त्रीय प्रणालियां 11 और 22 जैसी संख्याओं को विशेष या ‘मास्टर नंबर’ मानती हैं और उन्हें तुरंत एक अंक में नहीं बदलतीं। दूसरी ओर, भारतीय अंकशास्त्र की लोकप्रिय व्याख्याओं में जन्मतिथि के अंकों को जोड़कर 1 से 9 के बीच मूलांक निकालने की पद्धति व्यापक रूप से प्रचलित है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अंकशास्त्र का अध्ययन कर रहा है तो उसे यह देखना चाहिए कि वह किस विशेष पद्धति या परंपरा का अनुसरण कर रहा है। एक ही जन्मतिथि की व्याख्या अलग-अलग प्रणालियों में थोड़ी भिन्न हो सकती है।
मूलांक और भाग्यांक में क्या अंतर है?
मूलांक और भाग्यांक को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, जबकि अंकशास्त्र में दोनों की गणना अलग तरीके से की जाती है। मूलांक केवल जन्म की तारीख से निकाला जाता है, जबकि भाग्यांक निकालने के लिए सामान्यतः जन्म की पूरी तारीख—दिन, महीना और वर्ष—के अंकों का योग किया जाता है।
उदाहरण के लिए यदि जन्मतिथि 15 अगस्त 2008 है, तो मूलांक निकालने के लिए केवल 15 लिया जाएगा: 1 + 5 = 6। इसलिए मूलांक 6 होगा।
वहीं भाग्यांक निकालने के लिए पूरी जन्मतिथि के अंकों को जोड़ा जाएगा। इस तरह दोनों अंकों का आधार अलग हो जाता है। अंकशास्त्रीय मान्यताओं में मूलांक को व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रवृत्तियों से और भाग्यांक को जीवन की व्यापक दिशा से जोड़कर देखा जाता है।
मूलांक से क्या जाना जाता है?
अंकशास्त्र की मान्यताओं के अनुसार मूलांक से व्यक्ति के स्वभाव, सोचने के तरीके, व्यवहार, रुचियों और कुछ व्यक्तिगत प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया जाता है। उदाहरण के तौर पर अलग-अलग मूलांकों को अलग-अलग ग्रहों और प्रतीकात्मक गुणों से जोड़ा जाता है।
मूलांक 1 को नेतृत्व, आत्मविश्वास और स्वतंत्रता से जोड़ा जाता है। मूलांक 2 को संवेदनशीलता, सहयोग और भावनात्मक समझ का प्रतीक माना जाता है। मूलांक 3 को रचनात्मकता और अभिव्यक्ति से, 4 को व्यावहारिकता और अनुशासन से, जबकि 5 को जिज्ञासा और परिवर्तनशीलता से जोड़ा जाता है।
इसी तरह मूलांक 6 को जिम्मेदारी, सौंदर्यबोध और पारिवारिक भावनाओं से, 7 को चिंतन और आध्यात्मिक रुचि से, 8 को अनुशासन और संघर्षशीलता से तथा 9 को साहस और मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ने की परंपरा मिलती है। हालांकि इन सभी विशेषताओं को वैज्ञानिक रूप से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निश्चित प्रमाण नहीं माना जा सकता।
क्या केवल मूलांक से किसी व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व जाना जा सकता है?
यहीं सबसे अधिक सावधानी की आवश्यकता है। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत जटिल होता है और उस पर परिवार, शिक्षा, वातावरण, मित्रता, अनुभव, सामाजिक परिस्थितियां और व्यक्तिगत निर्णय जैसे अनेक कारकों का प्रभाव पड़ता है। इसलिए केवल जन्मतिथि के एक अंक के आधार पर किसी व्यक्ति के स्वभाव या भविष्य के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
अंकशास्त्र में मूलांक को एक प्रतीकात्मक संकेत की तरह देखा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इसे आत्मचिंतन या पारंपरिक ज्ञान के हिस्से के रूप में पढ़ता है, तो यह रोचक हो सकता है। लेकिन शिक्षा, करियर, स्वास्थ्य, आर्थिक निर्णय या जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों के लिए केवल मूलांक पर निर्भर रहना उचित नहीं होगा।
जन्मतिथि बदलने से मूलांक भी बदल जाता है?
मूलांक जन्म की तारीख पर आधारित होता है, इसलिए अंकशास्त्रीय गणना में यह जन्म के समय निर्धारित माना जाता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म 16 तारीख को हुआ है तो उसका मूलांक 7 रहेगा, चाहे वह किसी भी महीने या वर्ष में पैदा हुआ हो। जन्मस्थान या वर्तमान निवास बदलने से भी मूलांक की गणना नहीं बदलती।
यही सरलता मूलांक को अंकशास्त्र की शुरुआती अवधारणाओं में से एक बनाती है। कोई भी व्यक्ति अपनी जन्मतिथि जानकर कुछ ही सेकंड में अपना मूलांक निकाल सकता है।
मूलांक निकालने में होने वाली आम गलतियां
मूलांक निकालते समय सबसे सामान्य गलती यह होती है कि लोग पूरी जन्मतिथि के सभी अंकों को जोड़ देते हैं। ऐसा करने पर वे मूलांक के बजाय भाग्यांक जैसी दूसरी गणना करने लगते हैं। मूलांक के लिए सामान्य नियम में केवल जन्म की तारीख ली जाती है।
दूसरी गलती तारीख को सीधे दो अंकों की संख्या मान लेना है। उदाहरण के लिए 24 तारीख को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 24 नहीं बल्कि 2 + 4 = 6 माना जाता है। इसी तरह 19 का मूलांक 19 नहीं बल्कि 1 होता है।
तीसरी गलती अलग-अलग अंकशास्त्रीय प्रणालियों के नियमों को मिलाना है। इसलिए किसी भी व्याख्या से पहले यह समझना जरूरी है कि गणना किस पद्धति के अनुसार की जा रही है।
एक छोटी-सी गणना, लेकिन बड़ी जिज्ञासा
मूलांक निकालना भले ही कुछ सेकंड का काम हो, लेकिन इसके पीछे मौजूद अंकशास्त्रीय विचारों ने सदियों से लोगों की जिज्ञासा बनाए रखी है। जन्मतिथि को अंकों में बदलकर व्यक्ति के स्वभाव और जीवन की प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश इस परंपरा को रोचक बनाती है।
फिर भी इसका सबसे संतुलित उपयोग यही है कि इसे एक सांस्कृतिक और आत्मचिंतनात्मक परंपरा के रूप में देखा जाए, न कि वैज्ञानिक भविष्यवाणी के रूप में। जन्मतिथि से निकला अंक किसी व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं हो सकता। वास्तविक व्यक्तित्व उसके अनुभवों, चुनावों, संबंधों और कर्मों से कहीं अधिक व्यापक रूप से बनता है।
पहले तारीख जानिए, फिर अंक निकालिए
जन्मतिथि से मूलांक निकालने का नियम बेहद सरल है—केवल जन्म की तारीख लें, उसके अंकों को जोड़ें और यदि योग दो अंकों में आए तो फिर से जोड़कर 1 से 9 के बीच एक अंक प्राप्त करें। यही अंक सामान्य भारतीय अंकशास्त्रीय व्याख्या में मूलांक कहलाता है।
उदाहरण के तौर पर 8 तारीख का मूलांक 8, 14 तारीख का 5, 22 तारीख का 4 और 31 तारीख का 4 होगा। इस तरह किसी भी व्यक्ति का मूलांक आसानी से निकाला जा सकता है। इसके बाद अंकशास्त्र में उस मूलांक से जुड़े प्रतीकात्मक गुणों और मान्यताओं का अध्ययन किया जाता है। हालांकि इन व्याख्याओं को निश्चित वैज्ञानिक निष्कर्ष के बजाय पारंपरिक मान्यता के रूप में समझना ही अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।






