
संवाद 24 नई दिल्ली। यूरोप के प्रमुख देश इस समय गंभीर जनआक्रोश और अशांति की चपेट में आ गए हैं। बढ़ती महंगाई, गहराते आवास संकट, सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट और शिक्षा बजट में कटौती के विरोध में फ्रांस और बेल्जियम सहित कई यूरोपीय राष्ट्रों में उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। शनिवार को यह गुस्सा सड़कों पर इस कदर फूटा कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। हालात पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा।
फ्रांस में ‘येलो वेस्ट’ जैसी हलचल, राजधानी में व्यापक बंदोबस्त
फ्रांस की राजधानी पेरिस में स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है। प्रतिष्ठित चैंप्स-एलिसीज और आर्क डी ट्रायंफ जैसे प्रमुख ऐतिहासिक व प्रशासनिक स्थलों के पास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। हजारों की तादाद में चमकीली पीली जैकेट (Yellow Vests) पहने प्रदर्शनकारी मुख्य मार्गों पर डटे रहे और यातायात को पूरी तरह बाधित कर दिया।
फ्रांसीसी गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में दर्जनों स्थानों पर हुई हिंसक झड़पों के बाद अब तक 272 से अधिक उपद्रवियों को हिरासत में लिया गया है। पेरिस के अतिरिक्त मार्सिले, रेनेस, टूलूज और एंगर्स जैसे प्रमुख शहरों से भी नकाबपोश उपद्रवियों द्वारा संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की कोशिशें दर्ज की गई हैं। ल्योन शहर में प्रदर्शनकारियों ने एक पर्यटक कार्यालय में आग लगा दी, जिसे बुझाने के लिए दमकल कर्मियों को भारी मशक्कत करनी पड़ी। सरकार ने इन हिंसक वारदातों के पीछे ‘अल्ट्रा-लेफ्ट’ (चरम वामपंथी) संगठनों की संलिप्तता का आरोप लगाया है। वहीं, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सार्वजनिक शांति की अपील करते हुए दो टूक कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने का अधिकार सबको है, लेकिन कानून हाथ में लेने और हिंसा फैलाने वालों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
छात्रों की कक्षाओं से उठा आक्रोश, बना राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन
इस उग्र आंदोलन की शुरुआत कुछ सप्ताह पूर्व पेरिस के हाई स्कूलों और शिक्षण संस्थानों से हुई थी। छात्रों और शिक्षकों ने स्कूलों में अध्यापकों की भारी कमी, खस्ताहाल बुनियादी ढांचे और शिक्षा बजट में हो रही कटौती के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। हालांकि, देखते ही देखते यह आंदोलन सिर्फ शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं रहा। देश में बढ़ती रोजमर्रा की कीमतों, बिजली-गैस के बढ़े बिलों और लगातार गिरते जीवन स्तर से त्रस्त आम नागरिक, ट्रेड यूनियनें और कामगार वर्ग भी छात्रों के साथ सड़कों पर उतर आए। इसके चलते यह विरोध प्रदर्शन एक व्यापक राष्ट्रव्यापी सरकार-विरोधी आंदोलन में तब्दील हो गया।
बेल्जियम तक पहुंची चिंगारी, ब्रसेल्स और लीज में टकराव
फ्रांस में भड़की इस अशांति की लपटें पड़ोसी मुल्क बेल्जियम तक भी जा पहुंची हैं। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स और पूर्वी औद्योगिक शहर लीज में बड़े पैमाने पर मजदूर यूनियनों और छात्रों ने संयुक्त हड़ताल की। सरकार द्वारा सरकारी खर्च में प्रस्तावित 10 अरब यूरो की कटौती और शिक्षा की बढ़ती लागत के खिलाफ युवा वर्ग आक्रोशित है। ब्रसेल्स की सड़कों पर प्रदर्शनकारियों ने जब बैरिकेड्स तोड़कर सरकारी दफ्तरों की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस को वाटर कैनन और आंसू गैस का प्रयोग करना पड़ा। इससे पूर्व लीज शहर में हुई हिंसक झड़पों में दर्जनों पुलिसकर्मी घायल हुए थे और 100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
यूरोप के नीति-निर्माताओं के सामने गंभीर संकट
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यूरोपीय संघ (EU) के देशों में लगातार बढ़ती ब्याज दरों, ऊर्जा संकट और जीवन-यापन की भारी लागत ने मध्यम वर्ग और युवाओं की कमर तोड़ दी है। कई देशों में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं पर सरकारी बजट में की जा रही कटौती जनता के सब्र का बांध तोड़ रही है। यदि सरकारों ने आर्थिक राहत पैकेज और बातचीत के जरिए तनाव कम करने की ठोस पहल नहीं की, तो यह अशांति अन्य यूरोपीय देशों में भी फैल सकती है।






