
संवाद 24 नई नई दिल्ली। दक्षिण एशिया के सबसे संवेदनशील और अशांत सीमांत क्षेत्र में एक बार फिर बारूद की गंध फैल गई है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की साझी सीमा पर दोनों पक्षों के बीच भीषण सैन्य झड़पें शुरू हो गई हैं, जिसमें अफगान तालिबान लड़ाकों को भारी नुकसान पहुंचने का दावा किया गया है। खैबर पख्तूनख्वा से सटी पहाड़ियों में शनिवार को अचानक दोनों तरफ से भारी गोलाबारी शुरू हुई। इसके बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने आक्रामक पलटवार करते हुए सीमा पार स्थित तालिबान की सामरिक चौकियों और प्रमुख बेस कैंपों को तबाह कर दिया। इस घटनाक्रम ने लंबे समय से चले आ रहे दोनों मुल्कों के तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।
टोपसर और शिपोला पर भीषण प्रहार, सैन्य बेस जमींदोज
पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा के संवेदनशील सीमांत इलाकों – तैदा सेक्टर, अपर कुर्रम और गूज गढ़ी – में अफगान सीमा की ओर से अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू की गई थी। पाकिस्तानी अधिकारियों का आरोप है कि अफगान तालिबान द्वारा यह गोलीबारी सीमा पार से आतंकवादियों की अवैध घुसपैठ को कवर देने के मकसद से की गई थी। इस अप्रत्याशित हमले के जवाब में पाकिस्तानी सेना ने तोपखाने और भारी हथियारों का इस्तेमाल करते हुए जवाबी कार्रवाई शुरू की। सेना ने अफगान सीमा के बेहद करीब स्थित तालिबान की प्रसिद्ध ‘टोपसर चौकी’ और ‘शिपोला बेस कैंप’ को सटीक निशानों से ध्वस्त कर दिया। रक्षा सूत्रों का दावा है कि शिपोला कैंप पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुका है और इस कार्रवाई में तालिबान के कई लड़ाके मारे गए हैं। हमले की तीव्रता इतनी अधिक थी कि सीमावर्ती मोर्चों पर तैनात कई तालिबानी लड़ाके अपनी चौकियां छोड़कर पीछे हटने को मजबूर हो गए।
टीटीपी के पनाहगाहों पर बढ़ता विवाद और ऑपरेशन का दौर
यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के बीच सीमा पर बंदूकें गरजी हों। वर्ष 2021 में काबुल की सत्ता पर तालिबान के काबिज होने के बाद से ही इस्लामाबाद और काबुल के संबंधों में निरंतर कड़वाहट आ रही है। पाकिस्तान का लगातार यह आरोप रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) – जिसे पाकिस्तानी हुकूमत आधिकारिक तौर पर ‘फितना अल-खवारिज’ करार देती है – अफगानिस्तान की धरती से अपनी आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहा है।
हाल ही में पाकिस्तान ने अफगान भूभाग के भीतर टीटीपी के संदिग्ध ठिकानों पर लक्षित हवाई हमले (सर्जिकल एयरस्ट्राइक) भी किए थे। हालांकि पाकिस्तानी विदेश व सूचना मंत्रालय ने इन हमलों को बेहद सीमित और सुनियोजित कार्रवाई बताया था, लेकिन अफगान तालिबान ने इसे अपनी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन बताते हुए कड़ी चेतावनी दी थी। सीमा पर हुई ताज़ा भिड़ंत को उसी तनातनी और अविश्वास की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
12 साल का सबसे खूनी दौर: रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हिंसा
यह ताजा झड़प ऐसे समय पर सामने आई है जब पाकिस्तान के भीतर आंतरिक सुरक्षा हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। इस्लामाबाद स्थित स्वतंत्र शोध संस्थान ‘पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज’ (PICSS) की हालिया रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर माह में पाकिस्तान भर में उग्रवादी और आतंकी हमलों की कुल 225 घटनाएं दर्ज की गईं। अगस्त महीने में दर्ज 199 घटनाओं के मुकाबले यह सीधे तौर पर 13 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी है। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह आंकड़ा पिछले 12 वर्षों में किसी एक महीने के भीतर दर्ज की गई सबसे भयावह हिंसा का रिकॉर्ड है। लगातार तीसरे महीने हमलों का यह ग्राफ ऊपर चढ़ा है, जिसका सबसे घातक प्रभाव खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में देखने को मिला है।
टूटे सीजफायर समझौते और गहराता क्षेत्रीय संकट
सीमा पर तनाव कम करने के लिए पूर्व में भी प्रयास हुए थे। विभिन्न मोर्चों पर हुई हिंसक झड़पों के पश्चात युद्धविराम पर सहमति बनी थी। लेकिन सीमा पार से होने वाली लगातार घुसपैठ और हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन गजब लिल-हक’ छेड़ा। उच्चायोग स्तर और सैन्य कमांडरों के बीच कई दौर की वार्ताओं के बावजूद जमीनी स्तर पर अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सीमा पार यह सैन्य टकराव इसी प्रकार जारी रहा, तो यह न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार और आम नागरिकों की आवाजाही को पूरी तरह ठप कर देगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक नए सुरक्षा संकट को जन्म दे सकता है। फिलहाल सरहद के दोनों तरफ सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं और सीमावर्ती गांवों में दहशत का माहौल बना हुआ है।






