
संवाद 24 डेस्क। विद्यार्थियों की पढ़ाई, परीक्षा, भविष्य और भावनात्मक परेशानियों को समझना अब शिक्षकों की व्यावसायिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। इसी दिशा में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने वर्ष 2027 के लिए मार्गदर्शन एवं परामर्श में एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम की प्रवेश प्रक्रिया शुरू की है। इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े योग्य पेशेवरों को विद्यार्थियों की शैक्षणिक, सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक समस्याओं को समझने तथा उन्हें उचित मार्गदर्शन देने के लिए प्रशिक्षित करना है। यह पाठ्यक्रम दिल्ली, अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर, मैसूरु और शिलांग स्थित छह केंद्रों पर संचालित किया जाएगा। प्रत्येक केंद्र पर अधिकतम 50 सीटें निर्धारित हैं, यानी कुल 300 अभ्यर्थियों को प्रवेश मिल सकेगा।
विद्यार्थियों की परेशानियों को समझने पर क्यों दिया जा रहा है जोर?
आज विद्यालयों में विद्यार्थियों के सामने आने वाली चुनौतियां केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने तक सीमित नहीं हैं। पढ़ाई का दबाव, भविष्य में करियर चुनने की चिंता, साथियों से तुलना, आत्मविश्वास की कमी, पारिवारिक परिस्थितियां और सामाजिक संबंधों से जुड़ी परेशानियां भी उनके व्यवहार तथा सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। कई बार विद्यार्थी अपनी समस्या खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसे में शिक्षक की संवेदनशीलता, धैर्य और सही मार्गदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का यह पाठ्यक्रम इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षकों को विद्यार्थियों की समस्याएं ध्यानपूर्वक सुनने, उनके व्यवहार को समझने, कठिन परिस्थितियों में उचित सहायता देने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें विशेषज्ञों तक पहुंचाने के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करना है। हालांकि, परामर्श का प्रशिक्षण प्राप्त करना और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ होना अलग-अलग बातें हैं। गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में प्रशिक्षित विशेषज्ञ की सहायता आवश्यक हो सकती है।
एक वर्षीय पाठ्यक्रम तीन चरणों में होगा पूरा, जनवरी से दिसंबर तक चलेगा प्रशिक्षण
इस डिप्लोमा पाठ्यक्रम की संरचना इस तरह तैयार की गई है कि अभ्यर्थियों को सैद्धांतिक जानकारी के साथ व्यावहारिक अनुभव भी मिल सके। वर्ष 2027 का पाठ्यक्रम तीन चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में जनवरी से जून तक छह महीने का दूरस्थ अध्ययन होगा। इस दौरान अभ्यर्थी अध्ययन सामग्री के माध्यम से विषयों को समझेंगे और मार्गदर्शकों की सहायता से अपनी शंकाओं का समाधान कर सकेंगे।
दूसरे चरण में जुलाई से सितंबर तक तीन महीने का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा। इस दौरान अभ्यर्थियों को निर्धारित अध्ययन केंद्र पर उपस्थित होकर व्यावहारिक गतिविधियों में भाग लेना होगा। तीसरे चरण में अक्टूबर से दिसंबर तक तीन महीने की इंटर्नशिप यानी कार्यस्थल पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह प्रशिक्षण अभ्यर्थी के गृह नगर या संबंधित कार्यस्थल पर निर्धारित व्यवस्था के अनुसार पूरा किया जाएगा।
सेवारत शिक्षकों के लिए यह जानकारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि प्रत्यक्ष प्रशिक्षण की अवधि तीन महीने की होगी। इसलिए प्रवेश लेने से पहले उन्हें अपने विद्यालय या संबंधित विभाग से आवश्यक अनुमति और अवकाश की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। केवल दूरस्थ अध्ययन के आधार पर पूरे पाठ्यक्रम को पूरा मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि व्यावहारिक प्रशिक्षण और इंटर्नशिप भी इसका अनिवार्य हिस्सा हैं।
पाठ्यक्रम में किन विषयों की मिलेगी जानकारी?
इस डिप्लोमा में मार्गदर्शन एवं परामर्श की प्रक्रियाओं, मानव व्यवहार, व्यक्तित्व विकास, सामाजिक समायोजन और करियर संबंधी निर्णयों को समझने पर जोर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक आकलन, विद्यार्थियों की विशेष आवश्यकताओं, मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कठिन परिस्थितियों से निपटने के कौशल जैसे विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।
अभ्यर्थियों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि अलग-अलग परिस्थितियों में विद्यार्थियों को किस प्रकार का मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी को विषय चुनने में कठिनाई हो सकती है, कोई परीक्षा के दबाव से परेशान हो सकता है, तो किसी अन्य विद्यार्थी को अपने साथियों के साथ तालमेल बैठाने में समस्या आ सकती है। ऐसी परिस्थितियों में समस्या को समझना, विद्यार्थी की बात ध्यान से सुनना और उचित सहायता की दिशा सुझाना प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं।
पाठ्यक्रम में व्यावहारिक अभ्यास, कार्यशालाएं, मार्गदर्शन सत्र और विद्यालयों से संबंधित गतिविधियां भी शामिल हैं। प्रशिक्षण के दौरान अभ्यर्थियों को वास्तविक परिस्थितियों में अपने कौशल का उपयोग करने का अवसर मिलेगा। इंटर्नशिप के माध्यम से वे अपने ज्ञान को व्यवहार में लागू करना सीखेंगे।
दिल्ली से शिलांग तक छह केंद्रों पर मिलेगा प्रवेश
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों के अभ्यर्थियों को ध्यान में रखते हुए छह अध्ययन केंद्र निर्धारित किए हैं। इनमें नई दिल्ली स्थित शैक्षिक मनोविज्ञान एवं शिक्षा के आधार विभाग और पांच क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान शामिल हैं।
नई दिल्ली, अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर, मैसूरु और शिलांग में पाठ्यक्रम संचालित होगा। प्रत्येक केंद्र पर अधिकतम 50 अभ्यर्थियों को प्रवेश देने की व्यवस्था है। इस प्रकार सभी केंद्रों की कुल प्रवेश क्षमता 300 सीटें है। प्रवेश और केंद्र आवंटन क्षेत्रीय आधार पर किया जाएगा। आरक्षण संबंधी नियम भारत सरकार के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार लागू होंगे।
उत्तर प्रदेश के अभ्यर्थियों के लिए अजमेर केंद्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उपलब्ध प्रवेश विवरण के अनुसार उत्तर प्रदेश के अभ्यर्थियों को क्षेत्रीय व्यवस्था के तहत अजमेर केंद्र से जोड़ा गया है। वहीं दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के लिए नई दिल्ली केंद्र निर्धारित है। हालांकि, आवेदन करते समय अभ्यर्थियों को वर्ष 2027 की आधिकारिक विवरण पुस्तिका में दिए गए केंद्र आवंटन संबंधी नियमों की पुष्टि अवश्य करनी चाहिए।
कौन कर सकता है आवेदन? जानिए शैक्षणिक योग्यता
इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए अलग-अलग शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले अभ्यर्थियों को अवसर दिया गया है। सेवारत शिक्षकों के लिए स्नातक के साथ शिक्षण संबंधी उपाधि होना आवश्यक है। वर्तमान में नौकरी नहीं कर रहे ऐसे अभ्यर्थी भी पात्र हो सकते हैं, जिन्होंने स्नातक के साथ शिक्षण संबंधी उपाधि प्राप्त की हो और जिनके पास कम से कम दो वर्ष का शिक्षण या संबंधित कार्य का अनुभव हो।
इसके अतिरिक्त मनोविज्ञान, शिक्षा, सामाजिक कार्य, बाल विकास या विशेष शिक्षा में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त अभ्यर्थी भी निर्धारित शर्तों के अनुसार आवेदन कर सकते हैं। ऐसे अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है जिनके पास कम से कम एक वर्ष का शिक्षण या संबंधित क्षेत्र का अनुभव हो।
पात्रता की सामान्य शर्तों के तहत अर्हक परीक्षा में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक आवश्यक हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों को पांच प्रतिशत अंकों की छूट का प्रावधान दिया गया है। अंतिम पात्रता, आवश्यक दस्तावेज और चयन की शर्तों के लिए वर्ष 2027 की आधिकारिक विवरण पुस्तिका को ही आधार बनाया जाना चाहिए।
प्रवेश कैसे मिलेगा? आवेदन से पहले इन बातों का रखें ध्यान
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्ष 2027 के लिए मार्गदर्शन एवं परामर्श डिप्लोमा पाठ्यक्रम की प्रवेश सूचना, विवरण पुस्तिका और ऑनलाइन आवेदन का विकल्प उपलब्ध कराया गया है। इच्छुक अभ्यर्थियों को सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संबंधित प्रवेश सूचना पढ़नी चाहिए।
इसके बाद अपनी शैक्षणिक योग्यता, कार्य अनुभव और अन्य आवश्यक शर्तों की जांच करनी चाहिए। आवेदन में व्यक्तिगत जानकारी, शैक्षणिक विवरण और अनुभव से संबंधित प्रमाणपत्र सही तरीके से भरना जरूरी है। चयन प्रक्रिया में पात्रता के आधार पर अभ्यर्थियों की छंटनी के बाद चयन परीक्षा, निबंध लेखन और साक्षात्कार जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं। इनका अंतिम विवरण वर्तमान प्रवेश सूचना से सत्यापित किया जाना चाहिए।
वर्ष 2027 के प्रवेश के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 6 नवंबर 2026 बताई गई है। इसलिए इच्छुक उम्मीदवारों को अंतिम दिन का इंतजार करने के बजाय समय रहते आवेदन पूरा करना चाहिए। आधिकारिक प्रवेश पृष्ठ यहां देखा जा सकता है: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का आधिकारिक प्रवेश पृष्ठ।
पाठ्यक्रम की फीस कितनी है?
पाठ्यक्रम की फीस अभ्यर्थी की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग निर्धारित की गई है। उपलब्ध आधिकारिक प्रवेश विवरण में केंद्र सरकार से वित्तपोषित संस्थानों द्वारा प्रायोजित अभ्यर्थियों के लिए 19,500 रुपये, राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभागों से प्रायोजित अभ्यर्थियों के लिए 6,000 रुपये और निजी अभ्यर्थियों के लिए 30,000 रुपये का उल्लेख है।
हालांकि, ये शुल्क पूर्ववर्ती प्रवेश विवरण में दिए गए हैं। वर्ष 2027 के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को संबंधित सत्र की आधिकारिक प्रवेश सूचना में फीस की पुष्टि करनी चाहिए। प्रत्यक्ष प्रशिक्षण के दौरान आवास, भोजन और अन्य व्यक्तिगत खर्चों की व्यवस्था भी अभ्यर्थियों को स्वयं करनी पड़ सकती है।
विद्यालयी शिक्षा में क्या बदलाव ला सकता है यह डिप्लोमा?
विद्यालयी शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, निर्णय क्षमता और सामाजिक व्यवहार का विकास करना भी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी विद्यार्थियों के समग्र विकास और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित आवश्यकताओं को महत्व दिया गया है। इस संदर्भ में प्रशिक्षित शिक्षक विद्यार्थियों की समस्याओं को समय रहते पहचानने और उन्हें उचित सहायता उपलब्ध कराने में योगदान दे सकते हैं। इस पाठ्यक्रम की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद विद्यालयों में इन कौशलों का कितना प्रभावी उपयोग किया जाता है। विद्यार्थियों की समस्याओं को गंभीरता से सुनना, उनकी निजता का सम्मान करना, जरूरत पड़ने पर अभिभावकों और विशेषज्ञों से समन्वय करना तथा संवेदनशील वातावरण बनाना इसके महत्वपूर्ण पहलू होंगे। कुल मिलाकर, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का एक वर्षीय मार्गदर्शन एवं परामर्श डिप्लोमा शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र के योग्य पेशेवरों के लिए उपयोगी अवसर है। छह केंद्रों पर 300 सीटों की व्यवस्था के साथ यह पाठ्यक्रम विद्यालयों में विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक और भावनात्मक सहयोग देने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इच्छुक अभ्यर्थियों को आवेदन करने से पहले पात्रता, केंद्र आवंटन, फीस और चयन प्रक्रिया की पुष्टि आधिकारिक सूचना से अवश्य करनी चाहिए।






