
संवाद 24 नई दिल्ली। देश की राजधानी में लगातार होने वाले धरने-प्रदर्शनों, चक्का जाम और उसके कारण आम जनजीवन व व्यापार पर पड़ने वाले व्यापक असर को लेकर मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। हालिया प्रदर्शनों के चलते कारोबारियों को हुए करीब 2,000 करोड़ रुपये के भारी आर्थिक नुकसान और प्रमुख व्यापारिक केंद्र कनॉट प्लेस सहित अदालती परिसरों तक आवागमन बाधित होने के बाद वकीलों और व्यापारिक संगठनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाओं में मांग की गई है कि राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों के लिए एक सख्त और स्पष्ट ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) लागू की जाए, ताकि लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में नागरिकों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियां बंधक न बनें।कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष जब इस मामले का त्वरित उल्लेख किया गया, तो अदालत ने इस पर सुनवाई करने की सहमति जताई। वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने अदालत को अवगत कराया कि राजधानी में प्रदर्शनों की व्यवस्था और संतुलन से जुड़े कानूनी पहलुओं पर पहले से ही शीर्ष अदालत भी विचार कर रही है।
व्यापारियों और वकीलों की पीड़ा: 2,000 करोड़ का नुकसान और जाम की मार
वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन पुरी और याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं ने अदालत में तर्क रखा कि राजधानी में हाल के दिनों में बिना पूर्व योजना या अनियंत्रित तरीके से आयोजित हुए विरोध-प्रदर्शनों के चलते कनॉट प्लेस जैसे प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र पूरी तरह कट गए थे।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलीलें:
1- आर्थिक नुकसान: अनियोजित प्रदर्शनों और नाकेबंदी के कारण व्यापारियों को अल्प समय में ही 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापारिक घाटा उठाना पड़ा है।
2- अदालती कामकाज प्रभावित: वकीलों और वादकारियों को समय पर अदालतों तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे न्यायिक कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ा।
3- कानूनी नजीरों का हवाला: याचिकाओं में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों (मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ और अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर) का हवाला देते हुए मांग की गई कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को आम नागरिकों के अबाध आवागमन के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना आवश्यक है।
प्रशासन और सरकार का रुख: व्यवस्था और सुरक्षा सर्वोपरि
इस पूरे विवाद में दिल्ली पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की भूमिका विधि-व्यवस्था को बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। राजधानी की संवेदनशीलता, वीवीआईपी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को देखते हुए अनियंत्रित भीड़ को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा उठाए जाने वाले सुरक्षात्मक कदम अपरिहार्य हो जाते हैं।
वैकल्पिक और सुव्यवस्थित स्थलों का चयन: प्रशासन ने जंतर-मंतर जैसे अत्यंत व्यस्त और संकरे क्षेत्र पर बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए सुरक्षा समीक्षा के तहत रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड जैसे बड़े और सुगम स्थानों को प्रदर्शनों के लिए चिन्हित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसका उद्देश्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी सुरक्षित रहे और राजधानी की लाइफलाइन भी न थमे।
संविधान सम्मत संतुलन: सरकार का स्पष्ट मानना है कि लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का अधिकार असीमित नहीं हो सकता। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण एकत्र होने का अधिकार जनहित, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अधीन है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक मार्गों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पुलिस की स्टैंडिंग ऑर्डर्स का अनुपालन: प्रशासन पहले से ही दिल्ली पुलिस के नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था का प्रबंधन करता आ रहा है। याचिका के माध्यम से यदि एक सुदृढ़ SOP तैयार होती है, तो इससे पुलिस बलों को भी कानूनी दायरे में त्वरित और निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद मिलेगी।
अधिकार बनाम नागरिक दायित्व
लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति दर्ज कराना और अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। किंतु जब यह प्रदर्शन लाखों अन्य नागरिकों की रोजी-रोटी, आपातकालीन सेवाओं और सामान्य आवागमन को पंगु बनाने लगे, तो वहां नियमन और संस्थागत अनुशासन अनिवार्य हो जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन यह मामला न केवल राजधानी की कानून-व्यवस्था बल्कि पूरे देश के लिए एक नजीर बन सकता है कि विरोध की आवाज और कानून का राज एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर कैसे चल सकते हैं।






