
संवाद 24 डेस्क। दिल्ली के युवा इंजीनियरों ने तकनीक के जरिए एक ऐसी समस्या का समाधान खोजने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो दूरसंचार नेटवर्क के रखरखाव और कर्मचारियों की सुरक्षा, दोनों से जुड़ी है। दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) की छात्र टीम ने ड्रोन, पांचवीं पीढ़ी की मोबाइल नेटवर्क तकनीक यानी 5G और वर्चुअल रियलिटी (VR) को मिलाकर टेलीकॉम टावरों के निरीक्षण का एक नया समाधान विकसित किया है। इस तकनीकी नवाचार को 5G Innovation Hackathon 2026 में सफलता मिली है। टीम के इस प्रयास ने न केवल तकनीकी शिक्षा में हो रहे प्रयोगों को चर्चा में ला दिया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि विश्वविद्यालयों में विकसित विचार देश के डिजिटल बुनियादी ढांचे की व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस उपलब्धि के साथ गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (आईपीयू) के दो प्रोफेसरों का विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में शामिल होना भी दिल्ली के उच्च शिक्षा और अनुसंधान क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण खबर है। एक ओर विद्यार्थी नई तकनीक को वास्तविक समस्याओं से जोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों का शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है। इन दोनों उपलब्धियों को भारत में तकनीकी नवाचार, अनुसंधान और उद्योग की जरूरतों के बीच मजबूत संबंध विकसित करने के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
डीटीयू की टीम ने कैसे हासिल की यह उपलब्धि?
दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की टीम ने ‘वेल्डसाइट’ (WeldSight) नाम से एक तकनीकी समाधान तैयार किया है। इसका उद्देश्य टेलीकॉम टावरों की स्थिति का दूर से निरीक्षण करना और उनकी संरचना में दिखाई देने वाली संभावित खामियों की पहचान करने में सहायता देना है। पारंपरिक व्यवस्था में टावरों की ऊंचाई पर पहुंचकर निरीक्षण करना पड़ सकता है। इस प्रक्रिया में कर्मचारियों को ऊंचाई पर काम करने से जुड़े जोखिमों का सामना करना पड़ता है। ड्रोन आधारित निरीक्षण ऐसे जोखिम को कम करने का विकल्प उपलब्ध करा सकता है।
डीटीयू की टीम को दूरसंचार विभाग के 5G Innovation Hackathon 2026 में पहला स्थान मिला। टीम को केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 के दौरान सम्मानित किया। इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि परियोजना केवल एक तकनीकी अवधारणा प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि दूरसंचार क्षेत्र में सुरक्षा और रखरखाव की वास्तविक जरूरत को ध्यान में रखती है।
क्या है वेल्डसाइट और कैसे काम करेगी यह तकनीक?
वेल्डसाइट का मूल विचार तीन तकनीकी क्षेत्रों को एक साथ जोड़ना है। पहला है ड्रोन, दूसरा 5G नेटवर्क और तीसरा वर्चुअल रियलिटी आधारित दूरस्थ निरीक्षण। ड्रोन टावर के आसपास और उसके विभिन्न हिस्सों की तस्वीरें या अन्य दृश्य डेटा जुटाने में उपयोगी हो सकता है। इस डेटा के माध्यम से जंग, सतह पर दिखाई देने वाली क्षति और संरचना में संभावित खराबियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद नेटवर्क कनेक्टिविटी के माध्यम से निरीक्षण संबंधी जानकारी दूर बैठे विशेषज्ञों तक पहुंचाई जा सकती है।
वर्चुअल रियलिटी का उपयोग निरीक्षण से संबंधित दृश्य जानकारी को अधिक सहज तरीके से देखने और समझने के लिए किया जा सकता है। इससे विशेषज्ञों को टावर के विभिन्न हिस्सों का आकलन करने और आगे की जांच की जरूरत तय करने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, परियोजना की उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह दावा करना उचित नहीं होगा कि यह प्रणाली हर तरह की संरचनात्मक खराबी को अपने आप पहचान सकती है या मानवीय निरीक्षण की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त कर देती है। इसकी वास्तविक क्षमता इस्तेमाल किए गए सेंसर, डेटा की गुणवत्ता, सॉफ्टवेयर और मैदानी परीक्षणों के परिणामों पर निर्भर करेगी।
5G तकनीक की भूमिका क्या होगी?
5G को आम तौर पर तेज इंटरनेट और बेहतर मोबाइल कनेक्टिविटी के संदर्भ में समझा जाता है, लेकिन इसका उपयोग औद्योगिक निरीक्षण, मशीनों के बीच संचार, रियल-टाइम डेटा ट्रांसमिशन और दूरस्थ संचालन जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। टेलीकॉम टावरों के निरीक्षण में ड्रोन से एकत्रित बड़ी मात्रा में दृश्य डेटा को समय पर संबंधित विशेषज्ञों तक पहुंचाना उपयोगी हो सकता है। ऐसे कार्यों में नेटवर्क की उपलब्धता, डेटा ट्रांसमिशन की गति और विलंब यानी लेटेंसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालांकि, 5G की मौजूदगी अपने आप में किसी समाधान की सफलता की गारंटी नहीं है। टावरों के दूरदराज के स्थानों पर नेटवर्क कवरेज, मौसम, हवा की गति, ड्रोन की उड़ान अवधि, बैटरी क्षमता और डेटा की सुरक्षा जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। इसलिए वेल्डसाइट जैसे नवाचार की वास्तविक उपयोगिता का आकलन प्रयोगशाला के प्रदर्शन के साथ-साथ अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों के आधार पर किया जाना चाहिए।
टीम में कौन-कौन शामिल हैं और किसने किया मार्गदर्शन?
टीम बिटक्वेस्ट में हर्ष भाटिया टीम लीडर के रूप में शामिल हैं। इनके साथ सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के अर्पित मदान और कंप्यूटर विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग की विनीता कुमारी मीना ने भी योगदान दिया। परियोजना को डीटीयू के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की डॉ. अनामिका चौहान और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग विभाग के कौस्तुभ रंजन सिंह ने मार्गदर्शन दिया।
किसी तकनीकी परियोजना की सफलता के पीछे केवल एक अच्छा विचार नहीं, बल्कि विभिन्न विषयों की विशेषज्ञता और टीम के सदस्यों के बीच समन्वय भी होता है। वेल्डसाइट में कंप्यूटर विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, संचार तकनीक और ड्रोन आधारित निरीक्षण की अवधारणाओं को एक साथ लाने का प्रयास दिखाई देता है। इस तरह की परियोजनाएं विद्यार्थियों को कक्षा में सीखी गई अवधारणाओं को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने का अवसर देती हैं।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रतीक शर्मा ने भी इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की। इस नवाचार को उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यावहारिक शोध और तकनीकी प्रयोगों की संभावनाओं के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
5G इनोवेशन हैकाथॉन 2026 में कितनी टीमों ने लिया हिस्सा?
भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो की 9 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति के अनुसार, 5G Innovation Hackathon 2026 में 1,400 से अधिक प्रस्ताव प्राप्त हुए। इनमें से 50 टीमों को अपने विचारों को विकसित करने के लिए चुना गया। इनमें से 35 टीमें इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में अपने नवाचार प्रदर्शित कर रही हैं। इस मंच पर प्रतिभागियों को उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से संवाद करने और अपने समाधानों के आगे विकास तथा व्यावसायीकरण की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिला।
यह हैकाथॉन दूरसंचार विभाग की 100 5G Use Case Labs पहल से जुड़ा है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों, स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को 5G तकनीक पर आधारित व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसमें 5G एडवांस्ड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, नेटवर्क सुरक्षा और अन्य उभरते तकनीकी क्षेत्रों से जुड़े विचार शामिल किए गए।
पुरस्कार राशि को लेकर क्या है महत्वपूर्ण तथ्य?
इस खबर के संदर्भ में पुरस्कार राशि का उल्लेख करते समय आधिकारिक आंकड़ों को प्राथमिकता देना जरूरी है। दूरसंचार विभाग के हैकाथॉन पोर्टल पर प्रथम पुरस्कार पांच लाख रुपये, उपविजेता के लिए तीन लाख रुपये और दूसरे उपविजेता के लिए डेढ़ लाख रुपये निर्धारित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ विचार के लिए 50 हजार रुपये का पुरस्कार भी घोषित किया गया था। हालांकि, डीटीयू की टीम को मिली विशिष्ट पुरस्कार राशि की पुष्टि संबंधित आधिकारिक विजेता सूची या प्रमाणपत्र से की जानी चाहिए। इसलिए टीम को ढाई लाख रुपये मिलने के दावे को बिना स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि के अंतिम तथ्य के रूप में प्रकाशित करना उचित नहीं होगा।
इस पहल की खासियत यह है कि इसमें केवल पुरस्कार देकर प्रतिभागियों को विदा करने के बजाय विचारों को प्रोटोटाइप में बदलने पर जोर दिया गया है। चयनित टीमों को मार्गदर्शन, प्रयोगशाला सुविधाओं और शुरुआती वित्तीय सहायता का अवसर दिया जाता है। इससे ऐसे विचारों को आगे बढ़ाया जा सकता है, जिनमें उद्योग की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने की क्षमता हो।
टेलीकॉम टावरों की सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह नवाचार?
भारत में मोबाइल नेटवर्क का विस्तार दूरसंचार टावरों और उनसे जुड़े उपकरणों के प्रभावी रखरखाव पर निर्भर करता है। टावरों की संरचना, धातु के हिस्सों, कनेक्टिविटी उपकरणों और अन्य महत्वपूर्ण घटकों की नियमित जांच जरूरी होती है। समय पर खराबी की पहचान न होने पर मरम्मत में देरी, सेवा में व्यवधान और रखरखाव की लागत बढ़ने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
ड्रोन आधारित निरीक्षण से कुछ ऐसे हिस्सों की तस्वीरें और दृश्य जानकारी प्राप्त करना आसान हो सकता है, जहां तक पहुंचने के लिए कर्मचारियों को ऊंचाई पर चढ़ना पड़ता है। यदि इस डेटा का विश्लेषण उपयुक्त सॉफ्टवेयर की मदद से किया जाए, तो संभावित खराबियों को प्राथमिकता के आधार पर जांचने में सहायता मिल सकती है। इससे निरीक्षण की योजना बनाने और मरम्मत की जरूरत वाले हिस्सों की पहचान करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
फिर भी, किसी टावर की वास्तविक संरचनात्मक मजबूती का निर्णय केवल तस्वीरों के आधार पर नहीं किया जा सकता। कुछ दोषों की पुष्टि के लिए अतिरिक्त सेंसर, भौतिक जांच और योग्य इंजीनियरों का आकलन जरूरी हो सकता है। ड्रोन उड़ाने के नियमों, सुरक्षित परिचालन, मौसम और डेटा की विश्वसनीयता को ध्यान में रखना भी उतना ही आवश्यक है। वेल्डसाइट की दीर्घकालिक उपयोगिता इस बात से तय होगी कि यह मौजूदा निरीक्षण प्रणालियों के साथ कितनी प्रभावी तरह से काम करता है।
आईपीयू के दो प्रोफेसरों को वैश्विक पहचान, कौन हैं ये वैज्ञानिक?
डीटीयू की तकनीकी उपलब्धि के साथ गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के दो प्रोफेसरों को वर्ष 2026 की स्टैनफोर्ड-एल्सेवियर विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में स्थान मिलना भी उल्लेखनीय है। अमर उजाला की 11 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें प्रो. सत्यव्रत महापात्र और प्रो. गगनदीप शर्मा शामिल हैं।
प्रो. सत्यव्रत महापात्र को अनुप्रयुक्त भौतिकी यानी एप्लाइड फिजिक्स के क्षेत्र में लगातार सातवें वर्ष इस सूची में जगह मिली है। वहीं, प्रो. गगनदीप शर्मा को प्रबंधन यानी मैनेजमेंट के क्षेत्र में लगातार दूसरी बार शामिल किया गया है। विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री प्रो. डॉ. महेश वर्मा ने दोनों शिक्षकों को बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि उनकी उपलब्धि दूसरे शिक्षकों और शोधार्थियों को भी अनुसंधान के लिए प्रेरित करेगी।
क्या है विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची का महत्व?
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं और एल्सेवियर के सहयोग से तैयार की जाने वाली यह सूची वैज्ञानिकों के शोध प्रभाव का आकलन करने के लिए उद्धरण संबंधी आंकड़ों और अन्य शोध संकेतकों का इस्तेमाल करती है। इसमें शोधपत्रों को मिले उद्धरण, एच-इंडेक्स, सहलेखन और लेखकीय योगदान जैसे मानकों से संबंधित संकेतकों का उपयोग किया जाता है। इस सूची में स्थान मिलना किसी शोधकर्ता के अकादमिक योगदान और शोध कार्य के प्रभाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
हालांकि, इसे किसी वैज्ञानिक की संपूर्ण क्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। विभिन्न विषयों में उद्धरण की परंपराएं अलग-अलग होती हैं और शोध की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए उसके सामाजिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रभाव को भी देखना आवश्यक है। इस तरह की सूचियां शोध के प्रभाव को समझने का एक माध्यम हैं, न कि अकादमिक उत्कृष्टता का एकमात्र पैमाना।
भारत की तकनीकी शिक्षा के लिए क्या संदेश देती हैं ये उपलब्धियां?
डीटीयू की छात्र टीम का नवाचार और आईपीयू के प्रोफेसरों की शोध उपलब्धि उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान की बदलती भूमिका को रेखांकित करती है। आज तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना या डिग्री हासिल करना नहीं रह गया है। विद्यार्थियों को वास्तविक समस्याओं की पहचान करने, प्रयोग करने, तकनीकी समाधान विकसित करने और उन्हें उपयोग के योग्य बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
दूरसंचार विभाग की 100 5G Use Case Labs पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्ति के मुताबिक, अगस्त 2026 तक इन प्रयोगशालाओं का उपयोग 17,400 से अधिक विद्यार्थी कर चुके थे। 97 संस्थानों में 5G से संबंधित पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे थे, जिनमें 21,000 से अधिक विद्यार्थी नामांकित थे। इसी पहल के अंतर्गत 634 उत्पादों और उपयोग संबंधी समाधानों के विकास तथा 158 बौद्धिक संपदा संबंधी फाइलिंग का उल्लेख भी किया गया है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच सहयोग को मजबूत बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इन प्रयासों का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब विकसित तकनीकें प्रयोगशाला से बाहर निकलकर वास्तविक परिस्थितियों में सफल हों, उनकी लागत व्यावहारिक हो और उनका रखरखाव आसानी से किया जा सके।
शोध से समाधान तक पहुंचना होगी अगली बड़ी चुनौती
दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की टीम बिटक्वेस्ट का वेल्डसाइट समाधान इस बात का उदाहरण है कि युवा इंजीनियर तकनीक को केवल सैद्धांतिक विषय के रूप में देखने के बजाय वास्तविक समस्याओं के समाधान से जोड़ सकते हैं। ड्रोन, 5G और वर्चुअल रियलिटी का संयोजन टेलीकॉम टावरों के निरीक्षण को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की संभावना प्रस्तुत करता है। वहीं, आईपीयू के दो प्रोफेसरों की अंतरराष्ट्रीय शोध सूची में मौजूदगी यह रेखांकित करती है कि उच्च शिक्षा में अनुसंधान और अकादमिक योगदान का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
अब सबसे महत्वपूर्ण चरण इन उपलब्धियों को दीर्घकालिक प्रभाव में बदलना है। वेल्डसाइट को अलग-अलग परिस्थितियों में परखना, उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करना, लागत का आकलन करना और दूरसंचार कंपनियों की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना आवश्यक होगा। यदि विश्वविद्यालय, सरकारी संस्थान और उद्योग मिलकर ऐसे नवाचारों को आगे बढ़ाते हैं, तो भारत में विकसित तकनीकी समाधान न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, बल्कि वैश्विक दूरसंचार क्षेत्र में भी अपनी उपयोगिता साबित कर सकते हैं।






