
संवाद 24 डेस्क। पानी घर तक पहुंच जाना ही सुरक्षित पेयजल की गारंटी नहीं है। कई ऐसे इलाकों में जहां पानी टैंकरों या अनियमित आपूर्ति के माध्यम से पहुंचता है, उसे बाल्टी, ड्रम, मटके या अन्य बर्तनों में लंबे समय तक संग्रहित करना पड़ता है। इस दौरान पानी में दोबारा सूक्ष्मजीवों के पनपने का खतरा बना रहता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए दिल्ली की छात्रा देविका राज बत्रा ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो संग्रहित पानी को रसायन मिलाए बिना यूवी-सी एलईडी की मदद से कीटाणुरहित करने पर केंद्रित है। इस पहल को प्रोजेक्ट अमृत नाम दिया गया है और इसका इस्तेमाल दिल्ली की कुसुमपुर पहाड़ी बस्ती में किया जा रहा है।
नल तक पहुंचा पानी, फिर भी क्यों बना रहता है संक्रमण का खतरा?
पानी की समस्या को आम तौर पर पाइपलाइन, टंकी या जलापूर्ति की समस्या के रूप में देखा जाता है। लेकिन दिल्ली की कुसुमपुर पहाड़ी जैसी बस्तियों में चुनौती का एक दूसरा चरण भी है—घर पहुंचने के बाद पानी को सुरक्षित रखना। टैंकर से मिलने वाला पानी कई बार घरों में बाल्टियों, ड्रम और मटकों में जमा किया जाता है। ऐसे में पानी के संग्रहण और उपयोग के बीच का समय उसकी गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्रोजेक्ट अमृत की शुरुआत इसी व्यावहारिक समस्या को समझने के बाद हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार देविका ने कुसुमपुर पहाड़ी में फील्ड रिसर्च की और पाया कि सुरक्षित पानी की समस्या केवल जलस्रोत तक सीमित नहीं है। खासकर महिलाओं और परिवारों पर पानी को इकट्ठा करने, रखने और सुरक्षित बनाए रखने का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
छात्रा ने बनाया पानी के बर्तन में सीधे इस्तेमाल होने वाला उपकरण
प्रोजेक्ट अमृत की खासियत इसका कॉम्पैक्ट सबमर्सिबल यूवी-सी एलईडी स्टेरिलाइजेशन यूनिट है। इसे सीधे उस बर्तन में रखा जा सकता है जिसमें पानी संग्रहित है। इसका उद्देश्य पानी में मौजूद सूक्ष्मजीवों को यूवी-सी प्रकाश के संपर्क में लाकर निष्क्रिय करना है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार यह उपकरण एक ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर डिवाइस यानी यूवी-सी लाइट-एमिटिंग डायोड पर आधारित है।
इस तकनीक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह बताई गई है कि इसमें पानी में रसायन मिलाने की जरूरत नहीं होती। पारंपरिक रासायनिक कीटाणुशोधन से अलग, यह प्रणाली प्रकाश आधारित प्रक्रिया का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा इसमें मर्करी लैंप की आवश्यकता नहीं बताई गई है, जिससे उपकरण को छोटे स्तर पर उपयोग के लिए अधिक कॉम्पैक्ट बनाने की संभावना पैदा होती है।
यूवी-सी आखिर पानी में कैसे करता है काम?
यूवी-सी कोई नई वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है। पराबैंगनी विकिरण के यूवी-सी हिस्से की तरंगदैर्ध्य 100 से 280 नैनोमीटर के बीच होती है। वैज्ञानिक तौर पर यूवी विकिरण सूक्ष्मजीवों के न्यूक्लिक एसिड को नुकसान पहुंचाकर उनकी वृद्धि और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। सीडीसी के अनुसार यूवी विकिरण का उपयोग पेयजल के कीटाणुशोधन में भी किया जाता है।
हालांकि यूवी तकनीक को समझते समय एक सावधानी जरूरी है। यूवी प्रकाश पानी में मौजूद हर तरह के प्रदूषक को नहीं हटाता। सीडीसी के अनुसार यूवी सिस्टम मुख्य रूप से पानी में मौजूद कुछ परजीवी, बैक्टीरिया और वायरस को निष्क्रिय करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन रासायनिक प्रदूषकों को हटाना उनका काम नहीं है। साथ ही ज्यादा गंदले या मटमैले पानी में पहले फिल्ट्रेशन की जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि कण सूक्ष्मजीवों को यूवी प्रकाश से बचा सकते हैं।
रसायन के बिना कीटाणुशोधन, यही है तकनीक की खासियत
प्रोजेक्ट अमृत को उन इलाकों के लिए डिजाइन किया गया है जहां पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है और लोग पानी को घर में संग्रहित करते हैं। ऐसे स्थानों पर पानी की प्रत्येक खेप को उपयोग से पहले सुरक्षित करना व्यावहारिक चुनौती हो सकता है।
इस प्रणाली में किसी रासायनिक पदार्थ को पानी में मिलाने की जरूरत नहीं बताई गई है। अमर उजाला के अनुसार यूनिट के इस्तेमाल में बार-बार किसी उपभोज्य सामग्री को बदलने या रासायनिक कचरे को संभालने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। इससे रखरखाव को अपेक्षाकृत सरल बनाने की कोशिश की गई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पेयजल के उपचार में यूवी तकनीक को एक मान्य विकल्प के रूप में शामिल करता है। हालांकि डब्ल्यूएचओ की सामग्री यह भी स्पष्ट करती है कि यूवी उपचार की प्रभावशीलता पानी की गुणवत्ता, तकनीकी व्यवस्था, पर्याप्त यूवी डोज और रखरखाव जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
700 से ज्यादा घरों तक पहुंची पहल
यह परियोजना अभी केवल प्रयोगशाला या विज्ञान प्रदर्शनी तक सीमित नहीं है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार कुसुमपुर पहाड़ी में यह प्रणाली 700 से अधिक घरों और 5,000 से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। निगरानी के दौरान 300 से अधिक लोगों के स्वास्थ्य में सुधार दर्ज किए जाने का भी दावा किया गया है।
अन्य तकनीकी रिपोर्टों में भी परियोजना के सामुदायिक मॉडल का उल्लेख है। Electronics For You के अनुसार प्रोजेक्ट अमृत में तकनीकी उपकरण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर जागरूकता और अपनाने के लिए Amrit Ambassadors का नेटवर्क बनाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि परियोजना का लक्ष्य केवल उपकरण बनाना नहीं, बल्कि तकनीक को समुदाय के रोजमर्रा के जीवन में शामिल करना भी है।
विज्ञान प्रोजेक्ट से आगे बढ़ा विचार
देविका राज बत्रा की पहल को ब्रिटिश साइंस एसोसिएशन के Gold CREST Award से भी मान्यता मिली है। अमर उजाला के अनुसार इस मान्यता के पीछे माइक्रोबायोलॉजिकल परीक्षण और फील्ड डेटा को भी आधार बनाया गया। परियोजना के लिए पेटेंट आवेदन किए जाने की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई है।
तकनीक से जुड़े अन्य स्रोतों के अनुसार देविका ने प्रोजेक्ट को स्कूल स्तर के विज्ञान प्रयोग से आगे ले जाकर वास्तविक समुदाय में लागू करने पर काम किया है। Electronics For You ने उन्हें दिल्ली की कक्षा 12 की छात्रा बताया है, जबकि CIO&Leader की रिपोर्ट में भी कुसुमपुर पहाड़ी में फील्ड रिसर्च और तकनीकी समाधान के विकास का उल्लेख है।
7 लाख रुपये के निवेश से विस्तार की तैयारी
परियोजना को शुरुआती व्यावसायिक परीक्षण के बाद 7 लाख रुपये का एंजेल निवेश मिलने की जानकारी भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार इस निवेश का उद्देश्य परियोजना को केवल प्रोटोटाइप तक सीमित न रखकर बड़े स्तर पर विस्तार की दिशा में ले जाना है। इसके लिए 70 अमृत एंबेसडर का प्रशिक्षित नेटवर्क तैयार किए जाने की बात कही गई है।
टीम का अनुमान है कि अधिक यूनिटों के उत्पादन और स्थापना के साथ यह मॉडल 10,000 से अधिक लोगों तक पहुंच सकता है।
तकनीक के सामने अभी भी हैं कुछ चुनौतियां
किसी भी जल-शोधन तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने से पहले उसके प्रदर्शन, सुरक्षा, लागत, ऊर्जा जरूरत और रखरखाव की लगातार जांच जरूरी है। यूवी तकनीक के मामले में पानी की पारदर्शिता और सूक्ष्मजीवों तक पर्याप्त प्रकाश पहुंचना महत्वपूर्ण है। डब्ल्यूएचओ और सीडीसी दोनों के स्रोत इस बात पर जोर देते हैं कि अधिक गंदले पानी में यूवी उपचार की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है और कई परिस्थितियों में प्री-फिल्ट्रेशन उपयोगी होता है।
इसके अलावा यूवी उपचार पानी को उपचार के बाद दोबारा दूषित होने से अपने आप नहीं बचाता। सीडीसी के अनुसार यूवी उपचार का कोई ऐसा स्थायी अवशिष्ट प्रभाव नहीं होता जो पाइप या भंडारण के दौरान दोबारा आने वाले संक्रमण को रोक सके। इसलिए साफ बर्तन, सुरक्षित भंडारण और स्वच्छ उपयोग की आदतें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
सेमीकंडक्टर और सामाजिक समस्या का अनोखा मेल
प्रोजेक्ट अमृत की सबसे बड़ी कहानी केवल एक यूवी-सी उपकरण बनाने की नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि सेमीकंडक्टर और ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीक को स्थानीय और सामाजिक समस्याओं के समाधान में कैसे लगाया जा सकता है।
भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र को लेकर बड़े स्तर पर औद्योगिक और रणनीतिक प्रयास चल रहे हैं। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट में भी भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र, डिजाइन क्षमता और नई तकनीकों के विकास को महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है।
देविका का प्रोजेक्ट इसी व्यापक बदलाव का जमीनी उदाहरण प्रस्तुत करता है—जहां चिप और सेमीकंडक्टर तकनीक केवल इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल या कंप्यूटर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि स्वच्छ पानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के समाधान का हिस्सा बनती है।
जब छात्र की सोच जमीन पर बदलाव लाए
कुसुमपुर पहाड़ी में शुरू हुआ प्रोजेक्ट अमृत यह दिखाता है कि नवाचार के लिए केवल बड़ी प्रयोगशाला या बड़ी कंपनी का होना जरूरी नहीं। किसी वास्तविक समस्या को समझना, उसका वैज्ञानिक अध्ययन करना और फिर तकनीक को लोगों की जरूरत के अनुरूप ढालना भी नवाचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
देविका राज बत्रा की पहल में सेमीकंडक्टर आधारित यूवी-सी एलईडी तकनीक, वैज्ञानिक परीक्षण और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े परियोजना की पहुंच और शुरुआती प्रभाव को दर्शाते हैं, जबकि बड़े स्तर पर इसके परिणामों के लिए निरंतर स्वतंत्र परीक्षण और दीर्घकालिक निगरानी महत्वपूर्ण होगी।






