
संवाद 24 डेस्क। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की 20 वर्षीय अरविंदा बरसागड़े की कहानी सिर्फ एक युवा के इंजीनियर बनने की कहानी नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है जिसने हिंसा, अभाव और अस्थिरता के दौर से निकलकर शिक्षा और रोजगार को अपना रास्ता बनाया। अरविंदा ने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा करने के बाद अब प्रशिक्षु इंजीनियर के रूप में अपने पेशेवर सफर की शुरुआत की है। उनके पिता कभी माओवादी संगठन से जुड़े थे, लेकिन वर्ष 2010 में उन्होंने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। आज उनकी बेटी उसी क्षेत्र के विकास से जुड़े काम में अपना योगदान दे रही है।
बचपन में नहीं थीं बुनियादी सुविधाएं, लेकिन सपनों पर नहीं लगा विराम
अरविंदा का बचपन गढ़चिरौली की सिरोंचा तहसील के भोगापुर गांव में बीता। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उस समय गांव में बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं। जिस उम्र में किसी बच्चे की दुनिया स्कूल, खेल और परिवार तक सीमित होती है, उस समय अरविंदा का परिवार माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। उनके पिता राजबाबू बरसागड़े पहले ग्राम पंचायत में काम करते थे, लेकिन वर्ष 2005 में माओवादी संगठन से जुड़ गए। अरविंदा की मां लता को परिवार संभालने के लिए बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
अरविंदा ने एक इंटरव्यू में अपने बचपन की परिस्थितियों को याद करते हुए बताया कि उनकी मां कभी-कभी उन्हें साथ लेकर जंगलों में पिता की तलाश करने जाती थीं। यह दौर परिवार के लिए असुरक्षा और अनिश्चितता से भरा था। वर्ष 2010 में उनके पिता ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद परिवार ने धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौटने की कोशिश शुरू की और अरविंदा की शिक्षा को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।
पिता के अतीत को पीछे छोड़ अरविंदा ने चुना शिक्षा का रास्ता
परिस्थितियां चाहे जितनी चुनौतीपूर्ण रही हों, अरविंदा ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी की और बाद में इंजीनियरिंग की दिशा में कदम बढ़ाया। शुरुआत में उनकी रुचि कानून की पढ़ाई में थी और अधिवक्ता कविता मोहरकर से उन्हें प्रेरणा मिली। लेकिन बाद में उन्होंने तकनीकी शिक्षा को अपना करियर बनाने का रास्ता चुना और गढ़चिरौली के सरकारी पॉलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया। उन्होंने वर्ष 2025 में यह डिप्लोमा पूरा किया।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अरविंदा ने जिस क्षेत्र में शिक्षा हासिल की, वही क्षेत्र लंबे समय तक बुनियादी ढांचे और विकास की चुनौतियों से जूझता रहा है। सिविल इंजीनियरिंग का चुनाव उनके लिए केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने आसपास बदलती परिस्थितियों का हिस्सा बनने का अवसर भी है।
अब उसी क्षेत्र के विकास में निभा रही हैं भूमिका
सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा करने के बाद अरविंदा लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी के हेदरी स्थित एलटी गोंडवाना स्किल हब से जुड़ीं। अब वह कंपनी की टाउनशिप परियोजना में प्रशिक्षु साइट इंजीनियर के रूप में काम कर रही हैं। इस तरह जिस इलाके में उनका बचपन अभाव और असुरक्षा के बीच बीता, वहीं अब वह निर्माण और विकास से जुड़े काम का हिस्सा बन रही हैं।
अरविंदा की वर्तमान नौकरी को उनके व्यक्तिगत संघर्ष से आगे गढ़चिरौली में बदलते माहौल के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। कभी माओवादी गतिविधियों के कारण चर्चा में रहने वाला यह क्षेत्र अब शिक्षा, रोजगार, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विस्तार की संभावनाओं के साथ नई पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है।
गढ़चिरौली में बदल रहा माहौल, विकास की राह हुई आसान
गढ़चिरौली लंबे समय तक देश के वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित प्रमुख जिलों में रहा है। केंद्र सरकार के आंकड़ों में 2025 में भी महाराष्ट्र का गढ़चिरौली सबसे अधिक प्रभावित जिलों की सूची में शामिल था। इसके बाद सुरक्षा अभियानों, आत्मसमर्पण और पुनर्वास तथा विकास संबंधी प्रयासों के चलते स्थिति में बड़ा बदलाव आया। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में देश को नक्सलवाद से प्रभावी रूप से मुक्त होने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज होने की जानकारी दी।
इस बदलाव का असर स्थानीय युवाओं के अवसरों पर भी दिखाई देता है। पहले जिन क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार तक पहुंच कठिन थी, वहां अब औद्योगिक गतिविधियां और कौशल विकास से जुड़े प्रयास बढ़ रहे हैं। अरविंदा की कहानी इसी बदलाव को व्यक्तिगत स्तर पर सामने लाती है।
पढ़ाई में मिला शिक्षकों और पुलिस का सहयोग
अरविंदा अपनी सफलता का श्रेय केवल अपनी मेहनत को नहीं देतीं। उन्होंने अपनी मां के साथ-साथ कॉलेज शिक्षक अनिल दामोडे और अधिवक्ता कविता मोहरकर के मार्गदर्शन को भी महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार दामोडे ने उन्हें सकारात्मक सोच बनाए रखने के लिए प्रेरित किया, जबकि मोहरकर ने करियर को लेकर मार्गदर्शन दिया।
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी कैडरों के बच्चों की पढ़ाई में पुलिस प्रशासन की ओर से भी सहायता मिली। अरविंदा ने पढ़ाई के लिए लैपटॉप की जरूरत जताई थी, जिसके बाद पुलिस की कल्याण शाखा से जुड़े अधिकारियों ने उनकी मदद की। यह पहल इस बात की ओर संकेत करती है कि पुनर्वास का अर्थ केवल पूर्व उग्रवादियों को मुख्यधारा में लाना नहीं, बल्कि उनके परिवारों और बच्चों को शिक्षा तथा अवसर उपलब्ध कराना भी है।
नौकरी मिली, लेकिन मंजिल अभी बाकी है
अरविंदा के लिए प्रशिक्षु इंजीनियर की नौकरी सफलता का अंतिम पड़ाव नहीं है। उनका लक्ष्य आगे पढ़ाई जारी रखना और बीटेक की डिग्री हासिल करना है। नौकरी के साथ उच्च शिक्षा पूरी करने की उनकी योजना बताती है कि वह मौजूदा अवसर को अपनी अंतिम मंजिल नहीं बल्कि अगले चरण की शुरुआत मानती हैं।
उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने अपने परिवार के अतीत को अपनी पहचान की सीमा नहीं बनने दिया। पिता के जीवन में आया कठिन दौर उनकी जिंदगी की शुरुआत का हिस्सा जरूर रहा, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान शिक्षा, कौशल और मेहनत से बनाने का रास्ता चुना।
एक परिवार की कहानी से आगे, बदलते गढ़चिरौली की तस्वीर
अरविंदा की उपलब्धि को केवल व्यक्तिगत सफलता के तौर पर देखना इस कहानी को छोटा कर देगा। यह उदाहरण बताता है कि किसी संघर्षग्रस्त क्षेत्र में शांति और विकास का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब वहां के बच्चों को शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर मिलने लगते हैं।
गढ़चिरौली में माओवादी प्रभाव कम होने के साथ उद्योग और बुनियादी ढांचे से जुड़े अवसरों की चर्चा बढ़ी है। केंद्र सरकार ने भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ सड़क, संचार, शासन की पहुंच और आर्थिक अवसरों को बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया है।
अरविंदा आज निर्माण स्थल पर एक प्रशिक्षु इंजीनियर के रूप में काम कर रही हैं। यह तस्वीर उस बदलाव को समझने के लिए काफी है—एक ऐसा क्षेत्र जहां कभी हिंसा और भय की खबरें प्रमुख थीं, वहीं अब एक युवा महिला अपने तकनीकी ज्ञान के जरिए विकास की प्रक्रिया में भागीदारी कर रही है।
मां के संघर्ष को सफलता में बदला
अरविंदा की कहानी में उनकी मां लता का संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब पिता परिवार से दूर हो गए थे, तब बच्चों की परवरिश और परिवार की जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने बेटी की शिक्षा जारी रखी। अरविंदा आज जिस मुकाम पर पहुंची हैं, उसे वह अपनी मां के संघर्ष का परिणाम भी मानती हैं।
एक युवा बेटी का इंजीनियर बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उपलब्धि उस सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति को चुनौती देती है जिसमें उसके परिवार ने वर्षों बिताए। अरविंदा ने परिस्थितियों को अपनी नियति मानने के बजाय शिक्षा को परिवर्तन का माध्यम बनाया।
अतीत चाहे जैसा हो, भविष्य शिक्षा से बदला जा सकता है
अरविंदा बरसागड़े की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी जरूर लग सकती है, लेकिन इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, मां का त्याग, शिक्षकों का मार्गदर्शन और खुद अरविंदा की मेहनत है। माओवादी हिंसा से प्रभावित बचपन, बुनियादी सुविधाओं से वंचित गांव और परिवार की कठिन परिस्थितियों से निकलकर सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा हासिल करना और अब प्रशिक्षु साइट इंजीनियर के रूप में काम करना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को दिखाता है।
उनका अगला लक्ष्य बीटेक करना है। यानी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। शायद यही इस उपलब्धि का सबसे बड़ा संदेश भी है किसी व्यक्ति का अतीत उसकी पूरी पहचान नहीं होता। शिक्षा, अवसर और निरंतर प्रयास मिलें तो कठिन परिस्थितियों में पला-बढ़ा युवा भी अपने साथ-साथ अपने क्षेत्र की नई तस्वीर बनाने में योगदान दे सकता है।






