पहले नीम की दातून फिर पशुओं के बालों से बना था पहला ब्रश! जानें टूथब्रश की हैरान करने वाली कहानी

संवाद 24 डेस्क। सुबह उठते ही टूथब्रश और टूथपेस्ट से दांत साफ करना आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का इतना सामान्य हिस्सा है कि शायद ही कोई सोचता हो कि आखिर टूथब्रश आया कहां से। क्या हमेशा से दांतों की सफाई के लिए ब्रश और पेस्ट ही इस्तेमाल होते थे? इतिहास पर नजर डालें तो इसका जवाब बेहद दिलचस्प है। आधुनिक टूथब्रश तक पहुंचने से पहले इंसान ने पेड़ की टहनियों, दातून, पशुओं के बाल और कई तरह के प्राकृतिक साधनों का इस्तेमाल किया। कभी नीम और बबूल की टहनी दांतों की सफाई का जरिया थी तो एक दौर में चीन में सूअर के बालों से बने ब्रिसल वाले ब्रश इस्तेमाल किए गए। बाद में घोड़े के बाल भी ब्रश में लगाए गए और आखिरकार 20वीं सदी में नायलॉन ने टूथब्रश की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया। अमेरिकी डेंटल एसोसिएशन और लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के अनुसार आधुनिक स्वरूप वाले सिंथेटिक ब्रिसल टूथब्रश का निर्णायक दौर 1938 में शुरू हुआ।

जब टूथब्रश नहीं था, तब कैसे साफ होते थे दांत?
दांतों की सफाई की परंपरा आधुनिक टूथब्रश से कहीं ज्यादा पुरानी है। लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के अनुसार प्राचीन सभ्यताओं में लगभग 3000 ईसा पूर्व से ही पेड़ की पतली टहनियों के एक सिरे को रेशेदार बनाकर दांतों पर रगड़ने की परंपरा थी। इन्हें सामान्य तौर पर ‘च्यू स्टिक’ यानी चबाने वाली छड़ी कहा जाता है। प्राचीन मिस्र और बेबीलोन की सभ्यताओं में इस तरह के साधनों के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। इसका मूल उद्देश्य वही था जो आज टूथब्रश का है—दांतों की सतह से भोजन के कण और जमा पदार्थ हटाना।
भारत में भी दातून की परंपरा सदियों से चली आ रही है। नीम, बबूल, आम और अन्य पेड़ों की कोमल टहनियों का इस्तेमाल दांतों और मसूड़ों की सफाई के लिए किया जाता रहा है। शोध साहित्य में भारतीय दातून को पारंपरिक मौखिक स्वच्छता के साधन के रूप में दर्ज किया गया है। खास तौर पर नीम और बबूल की टहनियां ग्रामीण क्षेत्रों में दांत साफ करने के लिए लंबे समय से इस्तेमाल होती रही हैं।

नीम की दातून सिर्फ परंपरा थी या इसके पीछे कोई वजह भी थी?
नीम की दातून का इस्तेमाल भारतीय समाज में केवल आदत या परंपरा के कारण नहीं रहा। इसके पीछे पेड़ की टहनी के रेशेदार होने के साथ-साथ उसके प्राकृतिक घटकों को भी महत्वपूर्ण माना गया। कुछ प्रयोगशाला अध्ययनों में नीम और बबूल के अर्क में कुछ मौखिक बैक्टीरिया के खिलाफ एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि देखी गई है। एक अध्ययन में नीम और बबूल के अर्क ने दांतों में कैविटी से जुड़े बैक्टीरिया Streptococcus mutans के खिलाफ गतिविधि दिखाई, हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसा प्रयोगशाला परिणाम सीधे तौर पर हर व्यक्ति में चिकित्सकीय प्रभाव की गारंटी नहीं देता।
एक अन्य भारतीय अध्ययन में नीम, बबूल सहित कई तरह की चबाने वाली टहनियों के जलीय अर्क का डेंटल प्लाक में पाए जाने वाले बैक्टीरिया पर परीक्षण किया गया और इनमें बैक्टीरियल वृद्धि को रोकने की क्षमता देखी गई। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग-अलग पौधों में सक्रिय पदार्थों की मात्रा और संरचना अलग हो सकती है।
इसलिए नीम की दातून के बारे में सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि इसमें पारंपरिक उपयोग के साथ कुछ वैज्ञानिक शोध भी मौजूद हैं, लेकिन इसे आधुनिक दंत चिकित्सा का सार्वभौमिक विकल्प मानना उचित नहीं होगा।

चीन में आया वह बदलाव, जिसने दातून को ब्रश में बदल दिया
दांत साफ करने के इतिहास में एक बड़ा बदलाव चीन में हुआ। लगभग 15वीं सदी के अंत में वहां ऐसा ब्रश विकसित हुआ जिसमें लकड़ी या हड्डी के हैंडल पर पशु के बालों को ब्रिसल के रूप में लगाया जाता था। लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के अनुसार 1498 के आसपास चीन में सूअर की गर्दन के पीछे के कठोर बालों से बने ब्रिसल को बांस या हड्डी के हैंडल से जोड़े जाने का उल्लेख मिलता है। यही वह संरचना थी जो आधुनिक टूथब्रश के डिजाइन के काफी करीब दिखाई देती है।
यह बदलाव महत्वपूर्ण था क्योंकि अब दांतों की सफाई के लिए पूरी टहनी का इस्तेमाल करने के बजाय एक अलग हैंडल और उस पर लगाए गए रेशों का इस्तेमाल किया जा रहा था। यानी दांतों की सफाई का साधन धीरे-धीरे अधिक नियंत्रित और उपकरण आधारित होने लगा।

यूरोप पहुंचा तो सूअर के बालों की जगह घोड़े के बाल क्यों आए?
चीन से ब्रिसल वाले टूथब्रश का विचार यूरोप तक पहुंचा तो उसमें स्थानीय पसंद के अनुसार बदलाव हुए। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक यूरोप में कुछ ब्रशों में सूअर के बालों के स्थान पर घोड़े के बालों का इस्तेमाल किया गया। कुछ डिजाइनों में पक्षियों के पंखों का भी उपयोग हुआ। इसका कारण उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री और उनके अलग-अलग गुण थे।
हालांकि आज के नजरिए से इन प्राकृतिक ब्रिसल वाले ब्रशों की तुलना आधुनिक टूथब्रश से करना आसान नहीं है। उस समय न तो सिंथेटिक फाइबर उपलब्ध थे और न ही आधुनिक दंत स्वच्छता के वैज्ञानिक मानक विकसित हुए थे। फिर भी यह दौर टूथब्रश के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

1780 में आया विलियम एडिस का टूथब्रश
टूथब्रश के इतिहास में ब्रिटेन के विलियम एडिस का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। लगभग 1780 के आसपास उन्होंने एक अधिक आधुनिक डिजाइन वाला टूथब्रश तैयार किया। इसका हैंडल पशु की हड्डी से बनाया गया था और इसमें भी सूअर के बालों का इस्तेमाल किया गया था। इस डिजाइन ने टूथब्रश को उस स्वरूप की ओर आगे बढ़ाया जिसमें अलग हैंडल और ब्रिसल वाला सिरा होता है।
एडिस से जुड़ी कहानी अक्सर टूथब्रश के औद्योगिक विकास के संदर्भ में भी बताई जाती है। इसके बाद धीरे-धीरे टूथब्रश एक व्यक्तिगत उपयोग की वस्तु से आगे बढ़कर बाजार में बिकने वाला उत्पाद बनने लगा। डिजाइन में भी बदलाव होते गए और ब्रिसल की व्यवस्था को बेहतर बनाया गया।

1844 में तीन पंक्तियों वाला ब्रश, फिर बढ़ती तकनीक
टूथब्रश का विकास एक ही आविष्कार से पूरा नहीं हुआ। 1844 में तीन पंक्तियों वाले ब्रिसल ब्रश का डिजाइन सामने आया। इससे ब्रिसल की व्यवस्था और दांतों की सतह तक पहुंच को बेहतर बनाने की कोशिश दिखाई देती है।
यह वह दौर था जब औद्योगिक उत्पादन और उपभोक्ता उत्पादों के विकास ने व्यक्तिगत स्वच्छता की वस्तुओं को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया था। टूथब्रश धीरे-धीरे हाथ से बनाए जाने वाले साधन से बड़े पैमाने पर तैयार होने वाली वस्तु बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

फिर आया नायलॉन और बदल गई टूथब्रश की दुनिया
टूथब्रश के इतिहास में सबसे बड़ा तकनीकी मोड़ 1930 के दशक में आया। नायलॉन के विकास ने पहली बार ऐसा सिंथेटिक पदार्थ उपलब्ध कराया जिसे ब्रिसल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था। अमेरिकी डेंटल एसोसिएशन के इतिहास संबंधी दस्तावेज के अनुसार 1938 में नायलॉन ब्रिसल वाला टूथब्रश बाजार में आया।
लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस भी 1938 को आधुनिक टूथब्रश के महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में दर्ज करती है और बताती है कि इसी समय ड्यूपॉन्ट के नायलॉन ब्रिसल ने पुराने पशु-रोम वाले ब्रिसल की जगह लेना शुरू किया।
इस बदलाव का महत्व केवल इतना नहीं था कि ब्रश अब पशु के बालों से नहीं बन रहा था। नायलॉन के कारण ब्रिसल की मोटाई, कठोरता और आकार को अधिक नियंत्रित तरीके से विकसित करना संभव हुआ। आगे चलकर नरम ब्रिसल वाले टूथब्रश भी लोकप्रिय हुए।

1950 के दशक में नरम ब्रिसल क्यों लोकप्रिय हुए?
टूथब्रश का विकास केवल मजबूत और अधिक प्रभावी ब्रिसल बनाने की दिशा में नहीं हुआ। समय के साथ यह समझ भी बढ़ी कि बहुत कठोर तरीके से दांतों को रगड़ना हमेशा बेहतर सफाई का अर्थ नहीं होता। कोलगेट के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1950 के दशक तक नरम नायलॉन ब्रिसल वाले ब्रश विकसित होने लगे और लोगों ने इन्हें पसंद किया।
आज भी अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन सामान्य उपयोग के लिए soft-bristle toothbrush की सलाह देती है। ADA के अनुसार दांतों को दिन में दो बार लगभग दो मिनट तक ब्रश करना और ब्रश को लगभग तीन से चार महीने में बदलना चाहिए, या उससे पहले यदि ब्रिसल घिसकर फैल जाएं।

जब टूथब्रश में बिजली भी दौड़ने लगी
टूथब्रश का विकास नायलॉन के बाद भी नहीं रुका। विद्युत से चलने वाले टूथब्रश के शुरुआती प्रयोग 1930 के दशक के अंत तक पहुंच चुके थे। कोलगेट के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1939 में शुरुआती इलेक्ट्रिक टूथब्रश सामने आया, जबकि अमेरिका में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले शुरुआती मॉडलों में 1960 का Broxodent शामिल था।
आज इलेक्ट्रिक टूथब्रश में कंपन, घूमने वाले हेड और अलग-अलग सफाई मोड जैसी तकनीकें देखने को मिलती हैं। इसके बावजूद मूल विचार वही है जो हजारों वर्ष पहले दातून में था—दांतों की सतह से जमा पदार्थ हटाना।

दातून बनाम टूथब्रश: क्या पुराना तरीका आज भी कारगर है?
यह सवाल आज भी अक्सर पूछा जाता है कि अगर दातून इतनी पुरानी परंपरा है तो फिर टूथब्रश की जरूरत क्यों पड़ी। इसका उत्तर सीधा नहीं है। दातून का सही इस्तेमाल यांत्रिक रूप से दांतों की सफाई में मदद कर सकता है और कुछ पौधों में ऐसे प्राकृतिक पदार्थ भी पाए जाते हैं जिन पर एंटीमाइक्रोबियल प्रभाव के लिए शोध हुआ है। लेकिन दातून और आधुनिक टूथब्रश की प्रभावशीलता एक जैसी है, ऐसा सार्वभौमिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। पारंपरिक तरीकों पर उपलब्ध शोध में भी कई सीमाएं हैं।
इसके अलावा आधुनिक टूथपेस्ट में फ्लोराइड जैसे ऐसे घटक शामिल हो सकते हैं जिनकी भूमिका दांतों में क्षय से बचाव के संदर्भ में स्थापित है। इसलिए व्यक्तिगत मौखिक स्वास्थ्य की जरूरत के अनुसार दंत चिकित्सक की सलाह महत्वपूर्ण रहती है।

इतिहास से आधुनिक आदत तक पहुंची एक ही जरूरत
अगर हजारों वर्षों के इस सफर को देखा जाए तो तकनीक जरूर बदली, लेकिन जरूरत नहीं बदली। प्राचीन मनुष्य पेड़ की टहनी से दांत साफ करता था। भारत में नीम और बबूल की दातून लोकप्रिय हुई। चीन में ब्रिसल को हैंडल से जोड़कर एक अलग प्रकार का टूथब्रश विकसित हुआ। यूरोप ने उसमें अपने हिसाब से बदलाव किए। विलियम एडिस के डिजाइन ने आधुनिक ब्रश की दिशा को आगे बढ़ाया और 1938 में नायलॉन ने टूथब्रश को आधुनिक औद्योगिक स्वरूप देने में बड़ी भूमिका निभाई।
आज बाजार में साधारण मैनुअल ब्रश से लेकर इलेक्ट्रिक और स्मार्ट टूथब्रश तक उपलब्ध हैं। इनके आकार, ब्रिसल, हैंडल और तकनीक में भले ही जमीन-आसमान का अंतर हो, लेकिन मूल उद्देश्य हजारों वर्ष पुराना ही है—दांतों और मसूड़ों को साफ रखना।

दातून से नायलॉन तक, लेकिन मकसद वही
टूथब्रश का इतिहास वास्तव में मानव सभ्यता के बदलते जीवन, उपलब्ध संसाधनों और तकनीकी विकास की कहानी है। लगभग 3000 ईसा पूर्व इस्तेमाल होने वाली चबाने वाली टहनियों से लेकर 1498 के आसपास चीन में विकसित ब्रिसल वाले ब्रश और फिर 1938 के नायलॉन ब्रिसल तक पहुंचने में हजारों साल लगे।
इस इतिहास का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि आधुनिक टूथब्रश ने पुरानी दातून की मूल सोच को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे नए पदार्थ और तकनीक के साथ आगे बढ़ाया। आज हम जिस टूथब्रश को सुबह-शाम कुछ मिनटों के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसके पीछे मानव इतिहास की एक लंबी यात्रा छिपी है पेड़ की टहनी, नीम की दातून, पशु के बाल, हड्डी और बांस के हैंडल से होते हुए नायलॉन और इलेक्ट्रिक मोटर तक। यही यात्रा बताती है कि मानव की तकनीक बदलती रही, लेकिन स्वस्थ दांतों और साफ मुंह की जरूरत हमेशा से वही रही है।

Geeta Singh
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