भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल्यांकन में आंकड़ों की आधुनिक व्यवस्था अब ज्यादा सटीक होगी देश में जीडीपी की तस्वीर; दूध-घी से हवाई सफर तक का खर्च भी जुड़ेगा?

संवाद 24 डेस्क। भारत अपनी अर्थव्यवस्था के आकार और उसकी विकास दर को मापने की प्रणाली में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना प्रक्रिया में व्यापक संशोधन किए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस नए बदलाव के तहत अब लोगों की रोज़मर्रा की जीवनशैली से जुड़े सूक्ष्म से सूक्ष्म खर्चों से लेकर तकनीक संचालित सेवाओं को जीडीपी के आंकड़ों में स्थान दिया जाएगा। चाहे वह सुबह की चाय के लिए उपयोग होने वाला दूध और देशी घी हो, ऑनलाइन शॉपिंग का भुगतान हो, यूपीआई (UPI) के जरिए की जाने वाली सूक्ष्म खरीदारी हो, या फिर हवाई सफर और डिजिटल सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च—इन सभी पहलुओं को अब राष्ट्रीय आय के वास्तविक ढांचे में शामिल किया जाएगा।
आखिर देश की अर्थव्यवस्था का पैमाना बदलने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई और इन बदलावों से आम नागरिक तथा देश की समग्र साख पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) तथा राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा तैयार की जा रही इस नई व्यवस्था का प्राथमिक ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि देश के जीडीपी आंकड़े वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं का सही और सटीक प्रतिनिधित्व कर सकें।

क्यों पड़ी आधार वर्ष और गणना प्रणाली को बदलने की जरूरत?
किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि को मापने के लिए एक निश्चित ‘आधार वर्ष’ (Base Year) तय किया जाता है, जिसके संदर्भ में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों की तुलना की जाती है। भारत में अब तक जीडीपी की गणना वर्ष 2011-12 को आधार वर्ष मानकर की जा रही थी। हालांकि, बीते डेढ़ दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के ताने-बाने में अमूलचूल परिवर्तन आ चुके हैं।
2011 में जब आधार वर्ष तय हुआ था, तब देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था, गिग इकोनॉमी, स्टार्टअप संस्कृति, व्यापक यूपीआई नेटवर्क और ऑनलाइन सेवाओं का अस्तित्व न के बराबर या शुरुआती चरण में था। 2011 के पैमाने से 2026 की आधुनिक और गतिशील अर्थव्यवस्था को मापना पुराने चश्मे से नए ज़माने की तस्वीर देखने जैसा था। इस पुरानी व्यवस्था में अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा या तो छूट जाता था या फिर केवल अनुमानित आंकड़ों (Proxies) के आधार पर उसका आकलन होता था। इसी विसंगति को दूर करने के लिए नए आधार वर्ष (2022-23) के साथ-साथ गणना पद्धतियों में व्यापक विस्तार की रूपरेखा तैयार की गई है।

निजी खपत का दायरा: 46 से बढ़कर 128 श्रेणियों का विस्तार
प्रस्तावित सुधारों में सबसे बड़ा और दूरगामी कदम निजी अंतिम उपभोग व्यय (Private Final Consumption Expenditure – PFCE) का दायरा बढ़ाना है।
उपभोग मदों में अभूतपूर्व वृद्धि: अब तक निजी उपभोग का आकलन मुख्य रूप से लगभग 46 व्यापक श्रेणियों के आधार पर किया जाता था। नई व्यवस्था में इसे बढ़ाकर लगभग 128 उपभोग श्रेणियों में विभाजित करने का प्रस्ताव है।
दैनिक आवश्यकताओं से लेकर प्रीमियम खर्च तक: इस विस्तार से भोजन, अनाज, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, परिवहन, मनोरंजन और व्यक्तिगत देखभाल जैसी मदों के अंतर्गत होने वाले छोटे-छोटे खर्चों को ज्यादा गहराई से दर्ज किया जा सकेगा।
वर्गीकरण में आधुनिक बदलाव: उत्पादों के वर्गीकरण में भी वैज्ञानिक सुधार प्रस्तावित हैं। उदाहरण के लिए, मक्खन और घी को डेयरी उत्पादों के पारंपरिक वर्ग से हटाकर तेल एवं वसा (Oils and Fats) समूह में रखने की योजना है। आइसक्रीम को चीनी और डेजर्ट समूह में वर्गीकृत किया जाएगा। वहीं कपड़ों की सिलाई के खर्च को कपड़ों की मरम्मत और सफाई वाली श्रेणी में जोड़ा जाएगा।
संचार से सूचना प्रौद्योगिकी तक: ‘संचार’ श्रेणी का नाम बदलकर अब ‘सूचना एवं संचार’ (Information and Communication) किया जाएगा, ताकि इंटरनेट, डेटा प्लान और डिजिटल सब्सक्रिप्शन सेवाओं को सटीक पहचान मिल सके।

दूध-घी से हवाई यात्रा तक: हर खर्च का लेखा-जोखा
भारतीय परिवारों के खर्च करने के तौर-तरीके पिछले कुछ वर्षों में काफी बदले हैं। खाद्य सामग्री के स्तर पर जहां डिब्बाबंद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का उपभोग बढ़ा है, वहीं सेवाओं के क्षेत्र में यात्रा और मनोरंजन पर व्यय कई गुना बढ़ चुका है।
नए ढांचे के तहत डेयरी उत्पादों जैसे दूध, दही, पनीर और घी के उपभोग के आंकड़ों को अधिक प्रामाणिक डेटा स्रोतों से जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही, भारत में तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग द्वारा किए जा रहे परिवहन खर्च, विशेष रूप से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा (Air Travel), एक्सप्रेसवे पर टोल टैक्स, प्राइवेट वाहनों के पंजीकरण और कैब सेवाओं को वास्तविक समय के प्रशासनिक डेटा (जैसे ई-वाहन पोर्टल और नागरिक उड्डयन आंकड़े) के ज़रिए मापा जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि आम नागरिक अपनी आय का कितना हिस्सा बुनियादी जरूरतों पर और कितना हिस्सा आरामदायक या विलासितापूर्ण सेवाओं पर खर्च कर रहे हैं।

डिजिटल क्रांति और यूपीआई का जीडीपी में समावेश
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने भारत में लेन-देन के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, यूपीआई के माध्यम से रोजाना करोड़ों का कारोबार होता है।
जीडीपी की नई गणना पद्धति में यूपीआई लेन-देन के रुझानों और वेतन संबंधी आंकड़ों का उपयोग सेवा क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को ज्यादा सूक्ष्मता से समझने के लिए किया जाएगा। हालांकि, विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि यूपीआई की पूरी लेन-देन राशि को सीधे तौर पर जीडीपी में नहीं जोड़ा जा सकता (क्योंकि एक ही पैसे का कई बार हस्तांतरण हो सकता है), लेकिन यह डिजिटल डेटा नेटवर्क आर्थिक गतिविधियों, उपभोक्ता मांग और अनौपचारिक क्षेत्र के औपचारिक रूप में बदलने की रफ्तार को मापने का एक सशक्त संकेतक बनेगा।

जीएसटी, ई-वाहन और पीएफएमएस: प्राथमिक और प्रशासनिक डेटा का उपयोग
पुरानी जीडीपी गणना में एक बड़ी सीमा यह थी कि इसमें कई क्षेत्रों के विकास का अनुमान लगाने के लिए पुराने सर्वेक्षणों पर आधारित आनुपातिक फार्मूलों का इस्तेमाल करना पड़ता था। नए संशोधन में तकनीक और डिजिटल प्रशासनिक डेटा स्रोतों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है।
जीएसटी नेटवर्क (GSTN): वस्तु एवं सेवा कर के विस्तृत आंकड़ों का उपयोग विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के राज्य-वार और त्रैमासिक प्रदर्शन को सटीक रूप से मापने के लिए किया जाएगा।
ई-वाहन पोर्टल: सड़क परिवहन और निजी वाहनों की खरीद का सटीक लेखा-जोखा ई-वाहन डेटा से लिया जाएगा।
सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS): केंद्र और राज्यों के बजट खर्च को वास्तविक समय में ट्रैक करने के लिए पीएफएमएस के डेटा का सहारा लिया जाएगा, जिससे सरकारी खर्च का सही आकलन संभव होगा।
असंगठित क्षेत्र के नए सर्वेक्षण: असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के नए आंकड़ों को सीधे मॉडल में शामिल किया जाएगा, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी का वास्तविक खाका उभरेगा।

दोहरी मुद्रास्फीति समायोजन (Double Deflation) और तकनीकी सूक्ष्मता
केवल खर्च की मदों को बढ़ाना ही काफी नहीं होता, बल्कि महंगाई (Inflation) के प्रभाव को हटाकर ‘वास्तविक जीडीपी’ (Real GDP) निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF और विश्व बैंक) ने अक्सर भारत की जीडीपी गणना पद्धतियों पर यह सवाल उठाया था कि भारत में इनपुट और आउटपुट दोनों के लिए अलग-अलग मूल्य सूचकांकों का उपयोग नहीं किया जा रहा था।
नई श्रृंखला में विनिर्माण और कृषि क्षेत्र के लिए ‘डबल डिफ्लेशन’ (Double Deflation) तकनीक को अपनाया जा रहा है। इसका अर्थ है कि कच्चे माल (Inps) और तैयार उत्पाद (Outputs) दोनों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को अलग-अलग मूल्यांकित किया जाएगा। इससे यह लाभ होगा कि यदि कच्चे माल की कीमतें अचानक गिरती हैं या बढ़ती हैं, तो उससे वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के अतिरंजित या कम आंके जाने का जोखिम समाप्त हो जाएगा।

वैश्विक साख और नीति-निर्माण पर इसका दूरगामी असर
सटीक और प्रामाणिक आंकड़े किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। जीडीपी के आंकड़ों में इस क्रांतिकारी सुधार से बहुआयामी फायदे होंगे:
अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता में बढ़ोतरी: वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) अक्सर भारत के सांख्यिकी डेटा की समकालीनता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते थे। आंकड़ों में इस प्रकार के आधुनिक सुधारों से वैश्विक निवेशकों का भारत की आर्थिक साख पर विश्वास और मजबूत होगा।
बेहतर और लक्षित नीतियां: जब सरकार के पास इस बात का सटीक डेटा होगा कि किस क्षेत्र में किस वस्तु या सेवा की मांग बढ़ रही है, तो आर्थिक नीतियां, कर दरें और बजटीय सहायता अधिक प्रभावी ढंग से तय की जा सकेंगी।
राजकोषीय घाटे का यथार्थवादी आकलन: जीडीपी के संशोधित आधार और अधिक व्यापक कवरेज से देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और कर्ज-जीडीपी अनुपात का बेहतर और पारदर्शी प्रबंधन किया जा सकेगा।

Geeta Singh
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