
संवाद 24 डेस्क। भारत में खरीदारी का तरीका पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदला है, उसमें क्विक कॉमर्स सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक बनकर उभरा है। कभी किराना, सब्जी और रोजमर्रा की जरूरतों के सामान के लिए बाजार या नजदीकी दुकान तक जाना सामान्य बात थी, लेकिन अब मोबाइल पर कुछ क्लिक के बाद वही सामान कुछ ही मिनटों में घर पहुंच रहा है। ताजा Google और Redseer Strategy Consultants की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का क्विक कॉमर्स बाजार वित्त वर्ष 2025-26 के करीब 13 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2030-31 तक 70 से 90 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यानी अगले कुछ वर्षों में इसमें लगभग पांच से सात गुना तक वृद्धि का अनुमान है।
सिर्फ महानगरों की कहानी नहीं रहा क्विक कॉमर्स
क्विक कॉमर्स की शुरुआत मुख्य रूप से बड़े महानगरों में सुविधा और तेजी के मॉडल के रूप में हुई थी। शुरुआती दौर में इसका इस्तेमाल दूध, ब्रेड, फल-सब्जियां, स्नैक्स और घरेलू जरूरत की छोटी-मोटी वस्तुएं तुरंत मंगाने के लिए किया जाता था। लेकिन अब इसका विस्तार महानगरों की सीमाओं से बाहर निकलकर छोटे और मध्यम शहरों तक पहुंच चुका है। CLSA की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2026 तक देश में क्विक कॉमर्स के डार्क स्टोर 477 शहरों तक फैल चुके थे। कंपनियां छोटे शहरों में अपेक्षाकृत छोटे नेटवर्क के जरिए मांग और कारोबार की व्यवहार्यता को परख रही हैं।
यही बदलाव इस क्षेत्र के भविष्य को महत्वपूर्ण बनाता है। महानगरों में जहां उपभोक्ता पहले से ही ऑनलाइन खरीदारी और डिजिटल भुगतान के आदी हैं, वहीं छोटे शहरों में स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल भुगतान की बढ़ती पहुंच क्विक कॉमर्स के लिए नया ग्राहक आधार तैयार कर रही है। Google-Redseer के अनुमान के मुताबिक गैर-महानगरीय इलाकों में मासिक लेनदेन करने वाले क्विक कॉमर्स उपयोगकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2025-26 के 1.2-1.6 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2030-31 तक 5.5-6 करोड़ तक पहुंच सकती है।
सात गुना वृद्धि का मतलब आखिर कितना बड़ा बाजार?
क्विक कॉमर्स के संभावित विस्तार को समझने के लिए बाजार के मौजूदा आकार पर नजर डालना जरूरी है। Redseer और Google के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय क्विक कॉमर्स बाजार करीब 13 अरब डॉलर का था। वित्त वर्ष 2030-31 तक इसके 70-90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इस दौरान बाजार की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 41-48 प्रतिशत के बीच रह सकती है। यदि यह अनुमान साकार होता है तो क्विक कॉमर्स भारत के कुल खुदरा बाजार का करीब 4-5 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर सकता है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि क्विक कॉमर्स अब केवल ‘10 मिनट में सामान’ पहुंचाने की सेवा नहीं रह गया है। इसका दायरा धीरे-धीरे रोजमर्रा की जरूरतों से आगे बढ़कर सौंदर्य उत्पाद, व्यक्तिगत देखभाल, इलेक्ट्रॉनिक एक्सेसरीज, बेबी केयर और अन्य गैर-खाद्य श्रेणियों तक पहुंच रहा है। Google-Deloitte की 2026 की रिपोर्ट ने भी अनुमान जताया है कि 2030 तक क्विक कॉमर्स करीब 50 अरब डॉलर का बाजार बन सकता है और गैर-खाद्य श्रेणियां इसके खर्च में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हासिल करेंगी।
छोटे शहर क्यों बन रहे हैं अगला बड़ा मैदान?
छोटे शहरों में क्विक कॉमर्स की सफलता के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है उपभोक्ताओं की बदलती अपेक्षा। छोटे शहरों का ग्राहक भी अब वही डिजिटल सुविधा चाहता है जो बड़े शहरों के उपभोक्ताओं को उपलब्ध है। मोबाइल इंटरनेट और डिजिटल भुगतान ने इस अंतर को काफी हद तक कम कर दिया है। दूसरी ओर, युवा आबादी और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल ने डिजिटल खरीदारी को सामान्य व्यवहार का हिस्सा बना दिया है।
कंपनियों के लिए भी छोटे शहर आकर्षक हैं क्योंकि महानगरों में प्रतिस्पर्धा पहले से बहुत तेज है। ऐसे में कम सेवा वाले शहरों में पहले प्रवेश करने से ग्राहक आधार विकसित करने का अवसर मिलता है। CLSA के अनुसार नए खिलाड़ी अपेक्षाकृत कम प्रतिस्पर्धा वाले इलाकों को लक्ष्य बना रहे हैं, जबकि स्थापित कंपनियां भी नए शहरों में नेटवर्क बढ़ा रही हैं।
डार्क स्टोर बदलेंगे शहरों का खुदरा नक्शा
क्विक कॉमर्स की पूरी व्यवस्था का आधार डार्क स्टोर हैं। ये ऐसे छोटे गोदाम होते हैं जहां ग्राहकों के लिए उत्पाद प्रदर्शित नहीं किए जाते, बल्कि ऑनलाइन ऑर्डर पूरा करने के लिए सामान व्यवस्थित रखा जाता है। ग्राहक ऐप पर ऑर्डर करता है, नजदीकी डार्क स्टोर से सामान चुना जाता है और डिलीवरी कर्मचारी उसे लेकर ग्राहक तक पहुंचता है।
Savills India के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 तक देश में लगभग 2,525 क्विक कॉमर्स डार्क स्टोर थे और 2030 तक इनकी संख्या लगभग 7,500 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। यानी डार्क स्टोर का नेटवर्क करीब तीन गुना हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार कुल डार्क स्टोर क्षेत्र भी लगभग 1.3 करोड़ वर्ग फुट से बढ़कर करीब 3.8 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच सकता है।
इसका असर केवल ऑनलाइन खरीदारी पर नहीं पड़ेगा। शहरों में छोटी व्यावसायिक संपत्तियों, गोदामों और स्थानीय लॉजिस्टिक्स की मांग भी बढ़ सकती है। यानी क्विक कॉमर्स एक ऐसा खुदरा तंत्र तैयार कर रहा है जिसका प्रभाव ई-कॉमर्स कंपनियों के बाहर रियल एस्टेट और डिलीवरी नेटवर्क तक दिखाई दे सकता है।
अब सिर्फ दूध-ब्रेड नहीं, पूरा घरेलू बजट बदलने की कोशिश
क्विक कॉमर्स का शुरुआती मॉडल ‘टॉप-अप खरीदारी’ पर आधारित था। यानी घर में अचानक दूध खत्म हो गया, मेहमान आ गए या कोई जरूरी सामान तुरंत चाहिए तो ऐप से ऑर्डर कर दिया। लेकिन अगला चरण इससे कहीं बड़ा है।
Google-Redseer के मुताबिक महानगरों में कंपनियां अब 3,000-4,000 रुपये तक की योजनाबद्ध मासिक किराना खरीदारी को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने की कोशिश कर रही हैं। इसका अर्थ है कि क्विक कॉमर्स केवल ‘जरूरत पड़ने पर तुरंत सामान’ से आगे बढ़कर नियमित घरेलू खरीदारी का हिस्सा बनना चाहता है।
यदि ऐसा होता है तो उपभोक्ता के खरीदारी व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। महीने की शुरुआत में सुपरमार्केट जाकर बड़ी खरीदारी करने के बजाय उपभोक्ता अपनी जरूरत के अनुसार अलग-अलग समय पर छोटे या मध्यम ऑर्डर कर सकता है। इससे सुविधा बढ़ेगी, लेकिन दूसरी ओर बार-बार खरीदारी करने के कारण अनियोजित खर्च भी बढ़ सकता है।
क्या किराना दुकानों पर बढ़ेगा दबाव?
क्विक कॉमर्स के विस्तार का सबसे बड़ा सवाल स्थानीय किराना दुकानों को लेकर है। भारत का खुदरा बाजार लंबे समय से लाखों छोटी दुकानों पर निर्भर रहा है। किराना दुकानों की ताकत स्थानीय ग्राहक से संबंध, उधार की सुविधा, व्यक्तिगत सेवा और आसपास उपलब्धता रही है।
लेकिन क्विक कॉमर्स की ताकत है डिजिटल सुविधा, उत्पादों की विविधता और तेज डिलीवरी। Datum Intelligence के 2024 के अध्ययन में सर्वेक्षण किए गए 67 प्रतिशत किराना दुकानदारों ने बताया था कि क्विक कॉमर्स आने के बाद उनकी बिक्री प्रभावित हुई है, जबकि 74 प्रतिशत ने इसे दीर्घकालिक खतरे के रूप में देखा।
फिर भी तस्वीर एकतरफा नहीं है। छोटे शहरों में स्थानीय दुकानदारों की भूमिका पूरी तरह समाप्त होना आसान नहीं होगा। स्थानीय भरोसा, उधार, व्यक्तिगत संबंध और कई इलाकों में तत्काल उपलब्धता अब भी उनकी ताकत है। भविष्य में संभव है कि किराना और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच सीधा मुकाबला होने के बजाय दोनों के बीच सहयोग के नए मॉडल सामने आएं।
असली चुनौती है ‘तेज डिलीवरी’ को लाभदायक बनाना
क्विक कॉमर्स की सबसे बड़ी खूबी उसकी तेजी है, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी लागत भी है। ग्राहक तक कुछ ही मिनटों में सामान पहुंचाने के लिए डार्क स्टोर को ग्राहक के आसपास रखना पड़ता है। इसके साथ डिलीवरी कर्मचारी, तकनीकी ढांचा, इन्वेंटरी प्रबंधन और छूट जैसी लागत जुड़ती है।
इसलिए बाजार तेजी से बढ़ने के बावजूद कंपनियों के सामने लाभप्रदता की चुनौती बनी हुई है। UBS ने 2025 में भी संकेत दिया था कि तेज विस्तार और बढ़ती प्रतिस्पर्धा से मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। साथ ही, क्विक कॉमर्स का दायरा 100 से अधिक शहरों तक पहुंचने और नई श्रेणियों के जुड़ने से पारंपरिक ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स के बीच की सीमाएं भी धुंधली हो रही हैं।
छोटे शहरों में भरोसा और गुणवत्ता होगी निर्णायक
गैर-महानगरीय बाजारों में सिर्फ डिलीवरी की गति पर्याप्त नहीं होगी। Redseer ने छोटे शहरों में कम ऑर्डर मूल्य, उत्पादों की ताजगी और उपभोक्ता भरोसे को प्रमुख चुनौतियों में गिना है।
मसलन, फल-सब्जियां या दूध जैसे उत्पादों में ग्राहक कीमत से ज्यादा गुणवत्ता और ताजगी को महत्व दे सकता है। यदि किसी शहर में खराब गुणवत्ता या गलत उत्पाद मिलने की शिकायतें बढ़ती हैं तो तेज डिलीवरी का आकर्षण जल्दी कम हो सकता है। इसलिए छोटे शहरों में क्विक कॉमर्स की अगली सफलता डिलीवरी के समय से ज्यादा भरोसे, उत्पाद की गुणवत्ता और सही कीमत पर निर्भर करेगी।
खरीदारी ‘जरूरत’ से ‘आदत’ में बदल सकती है
क्विक कॉमर्स का सबसे गहरा प्रभाव शायद बाजार के आकार से ज्यादा उपभोक्ता की आदत पर पड़ेगा। जब ग्राहक को यह भरोसा हो जाए कि जरूरी वस्तु 10-20 मिनट में घर आ सकती है, तो वह घर में ज्यादा सामान जमा रखने के बजाय जरूरत के समय खरीदारी करने की आदत अपना सकता है।
इसके साथ ऐप आधारित सिफारिशें, व्यक्तिगत ऑफर और डिजिटल विज्ञापन खरीदारी के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। यानी भविष्य में ग्राहक केवल वह सामान नहीं खरीदेगा जिसकी उसे पहले से जरूरत थी, बल्कि ऐप उसे ऐसे उत्पाद भी दिखा सकता है जिनकी खरीदारी उसने पहले नहीं सोची थी।
महानगरों और छोटे शहरों की जरूरतें अलग रहेंगी
हालांकि क्विक कॉमर्स का विस्तार पूरे देश में हो रहा है, लेकिन हर शहर में इसका मॉडल एक जैसा नहीं होगा। महानगरों में चुनौती बड़े किराना बास्केट और गैर-खाद्य श्रेणियों को हासिल करने की होगी। इसके विपरीत छोटे शहरों में कंपनियों को पहले उपभोक्ता भरोसा, पर्याप्त उत्पाद उपलब्धता और व्यवहार्य डिलीवरी लागत का संतुलन बनाना होगा।
Google-Redseer के अनुसार वित्त वर्ष 2030-31 तक शीर्ष आठ महानगर—मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, पुणे और अहमदाबाद—क्विक कॉमर्स के अतिरिक्त GMV में करीब 60 प्रतिशत योगदान दे सकते हैं। वहीं गैर-महानगरीय बाजार शेष करीब 40 प्रतिशत वृद्धि का आधार बन सकते हैं।
आगे का बाजार सिर्फ क्विक नहीं, ‘स्मार्ट कॉमर्स’ का होगा
आने वाले वर्षों में प्रतिस्पर्धा केवल इस बात पर नहीं होगी कि कौन सबसे तेजी से सामान पहुंचाता है। कंपनियों को कीमत, गुणवत्ता, उत्पाद विविधता, व्यक्तिगत सुझाव, ग्राहक अनुभव और लाभप्रदता—इन सभी मोर्चों पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
भारत का ई-कॉमर्स बाजार भी तेजी से विस्तृत हो रहा है। BCG के अनुसार 2030 तक भारत का ई-कॉमर्स बाजार 280-300 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और छोटे शहरों तथा ग्रामीण उपभोक्ताओं की भागीदारी बढ़ सकती है। ऐसे में क्विक कॉमर्स इस बड़े डिजिटल खुदरा बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
बदल रहा है खरीदारी का समय, तरीका और सोच
भारत में क्विक कॉमर्स की कहानी केवल 10 मिनट में सामान पहुंचाने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें उपभोक्ता सुविधा, समय और उपलब्धता को खरीदारी के मूल्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मानने लगा है। 13 अरब डॉलर से 70-90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान इस बदलाव के संभावित पैमाने को दिखाता है।
छोटे शहरों का बढ़ता बाजार इस कहानी का अगला बड़ा अध्याय है। यदि कंपनियां कम ऑर्डर मूल्य, ताजगी, भरोसे और लाभप्रदता जैसी चुनौतियों को हल कर पाती हैं, तो क्विक कॉमर्स भारत के खुदरा बाजार की संरचना को काफी हद तक बदल सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि पारंपरिक किराना दुकानें खत्म हो जाएंगी। अधिक संभावना यह है कि आने वाले समय में भारत का खुदरा बाजार किराना, सुपरमार्केट, ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स—इन सभी के मिश्रित मॉडल की ओर बढ़ेगा।
आखिरकार उपभोक्ता उसी माध्यम को चुनेगा जो उसे सही सामान, सही कीमत, भरोसेमंद गुणवत्ता और सही समय पर उपलब्ध करा सके। क्विक कॉमर्स ने ‘जल्दी’ को खरीदारी की नई कसौटी बना दिया है। अब असली परीक्षा यह होगी कि क्या कंपनियां इस तेजी को लंबे समय तक टिकाऊ और लाभदायक कारोबार में बदल पाती हैं।






