
संवाद 24 डेस्क। हर साल सितंबर के महीने में जब देश के कारखानों, वर्कशॉप, औद्योगिक इकाइयों, निर्माण स्थलों और दुकानों में मशीनों की सफाई होने लगती है, औजारों को सजाया जाता है और कार्यस्थल पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं, तब एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है—आखिर मशीनों और औजारों की पूजा क्यों की जाती है? जिस मशीन से रोज काम लिया जाता है, जिस हथौड़े, पेचकस, आरी, ड्रिल या उपकरण से किसी व्यक्ति की आजीविका चलती है, उसे एक दिन पूजा के योग्य क्यों माना जाता है?
इस परंपरा का उत्तर केवल धार्मिक अनुष्ठान में नहीं छिपा है। इसके पीछे भारतीय परंपरा में शिल्प, निर्माण, तकनीकी दक्षता और सृजन के प्रति सम्मान की एक लंबी अवधारणा दिखाई देती है। भगवान विश्वकर्मा को परंपरागत रूप से देवशिल्पी, वास्तुकार और निर्माण-कौशल से जुड़े देवता के रूप में स्मरण किया जाता है। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रह जाती, बल्कि काम करने वाले हाथों, तकनीकी ज्ञान और उन उपकरणों के सम्मान का अवसर भी बन जाती है, जिनके माध्यम से निर्माण संभव होता है।
इस वर्ष यानी 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जा रही है। यह दिन कन्या संक्रांति से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार 2026 में सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश 17 सितंबर को सुबह करीब 7 बजकर 58 मिनट पर हो रहा है। अलग-अलग स्थानों पर पुण्यकाल और पूजा के समय में स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है।
17 सितंबर ही क्यों जुड़ा है विश्वकर्मा पूजा से?
विश्वकर्मा पूजा की तारीख को समझने के लिए कन्या संक्रांति को समझना जरूरी है। संक्रांति उस समय को कहा जाता है जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। जिस संक्रांति में सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, उसे कन्या संक्रांति कहा जाता है। आधुनिक कैलेंडर में यह समय सामान्यतः सितंबर के मध्य में आता है और विश्वकर्मा पूजा की परंपरा इसी अवधि से जुड़ी हुई है।
2026 में सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश 17 सितंबर को हुआ है, इसलिए इसी दिन विश्वकर्मा पूजा मनाई जा रही है। इस कारण इस वर्ष 16 और 17 सितंबर को लेकर जो भ्रम दिखाई दिया, उसका संबंध संक्रांति के वास्तविक समय से है। भारत में धार्मिक पर्वों की तिथि निर्धारित करते समय केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि सूर्य की संक्रांति और स्थानीय पंचांग की गणना भी महत्वपूर्ण होती है।
इस पर्व की खास बात यह है कि इसका संबंध किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। कारखाने में मशीन चलाने वाला तकनीशियन, वर्कशॉप में काम करने वाला मैकेनिक, निर्माण कार्य से जुड़ा कारीगर, इंजीनियर, वास्तु विशेषज्ञ, शिल्पकार, उद्योगपति और छोटे स्तर पर अपना व्यवसाय चलाने वाला व्यक्ति—सभी अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार इस दिन विश्वकर्मा पूजा करते हैं।
वेदों में विश्वकर्मा का उल्लेख केवल ‘कारीगर देवता’ के रूप में नहीं
विश्वकर्मा की अवधारणा को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में ऋग्वेद के सूक्त आते हैं। वैदिक हेरिटेज पोर्टल पर ऋग्वेद के मंडल 10 के सूक्त 81 और 82 में विश्वकर्मा का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद 10.81 में विश्वकर्मा को ऐसी सत्ता के रूप में संबोधित किया गया है जो संसार की रचना से जुड़ी हुई है। सूक्त में पूछा जाता है कि वह आधार क्या था जिससे पृथ्वी और द्युलोक की रचना हुई।
ऋग्वेद 10.82 में विश्वकर्मा को ‘धाता’ और ‘विधाता’ जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है। एक मंत्र में उन्हें ऐसा जानने वाला बताया गया है जो समस्त लोकों और उनके धामों को जानता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है। आधुनिक समय में भगवान विश्वकर्मा की लोकप्रिय छवि मुख्य रूप से देवताओं के वास्तुकार और दिव्य शिल्पी की है, लेकिन वैदिक संदर्भ में ‘विश्वकर्मा’ की अवधारणा अधिक व्यापक है। वहां यह शब्द सृष्टि के निर्माण और व्यवस्था से जुड़े दार्शनिक अर्थों में भी आता है।
बाद की धार्मिक और पौराणिक परंपराओं में यही अवधारणा धीरे-धीरे देवशिल्पी के अधिक स्पष्ट स्वरूप से जुड़ती दिखाई देती है। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की एक सामग्री में भी ऋग्वेद, पद्म पुराण, मत्स्य पुराण, महाभारत, रामायण और अन्य ग्रंथों में विश्वकर्मा के विभिन्न संदर्भों का उल्लेख किया गया है।
‘विश्वकर्मा’ शब्द में ही छिपा है सृजन का अर्थ
‘विश्वकर्मा’ शब्द को सामान्य अर्थ में देखें तो इसमें ‘विश्व’ और ‘कर्म’ की अवधारणा जुड़ती है। धार्मिक परंपरा में यह नाम उस शक्ति की ओर संकेत करता है जो निर्माण और सृजन से संबद्ध है।
ऋग्वेद 10.82 में विश्वकर्मा को पिता, जनिता और विधाता के रूप में संबोधित करने वाली पंक्तियां मिलती हैं। इसका भाव यह है कि विश्वकर्मा को सृष्टि के निर्माण और व्यवस्था से जोड़कर देखा गया।
यही कारण है कि विश्वकर्मा पूजा को केवल किसी मशीन की पूजा के रूप में समझना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देना होगा। मशीन स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं है। मशीन के पीछे ज्ञान है, कौशल है, श्रम है और किसी वस्तु को आकार देने की मानवीय क्षमता है।
इस दृष्टि से देखें तो विश्वकर्मा पूजा उस विचार को सामने लाती है जिसमें ‘बनाने वाले’ का सम्मान किया जाता है।
फिर मशीन और औजार पूजा का हिस्सा कैसे बने?
यह प्रश्न सबसे दिलचस्प है। आज विश्वकर्मा पूजा की पहचान ही मशीनों, औजारों और तकनीकी उपकरणों की पूजा से होती है। कारखानों में बड़ी मशीनों की सफाई की जाती है। वर्कशॉप में मोटर, इंजन और उपकरणों को सजाया जाता है। कई स्थानों पर वाहन भी पूजा में शामिल किए जाते हैं।
जागरण की रिपोर्ट के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा के साथ मशीनों, औजारों, कारखानों और वाहनों की पूजा की परंपरा है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि ये सभी निर्माण और कार्य के साधन हैं तथा विश्वकर्मा की शिल्प परंपरा से जुड़े प्रतीक माने जाते हैं।
लेकिन इसका एक सामाजिक अर्थ भी है। जिस उपकरण से व्यक्ति अपनी आजीविका कमाता है, उसकी उपयोगिता को स्वीकार करना और उसके प्रति सम्मान व्यक्त करना श्रम-संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।
शोधपरक अध्ययन भी बताते हैं कि भारत और दक्षिण एशिया के विभिन्न हिस्सों में औजारों, मशीनों और अन्य उपकरणों को कुछ अवसरों पर रोककर या विश्राम देकर पूजा का केंद्र बनाया जाता रहा है। शोधकर्ताओं ने विश्वकर्मा पूजा को कारीगरी, निर्माण और भौतिक वस्तुओं के धार्मिक महत्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण माना है।
पूजा के दिन मशीनों को ‘आराम’ देने की परंपरा क्यों?
विश्वकर्मा पूजा से जुड़ी एक लोकप्रिय परंपरा यह भी है कि पूजा के दौरान मशीनों और औजारों का इस्तेमाल न किया जाए। हालांकि हर उद्योग, क्षेत्र और परिवार में यह नियम एक जैसा नहीं है, लेकिन कई कार्यस्थलों में इस दिन मशीनों को साफ करके उन्हें सजाया जाता है और पूजा के बाद उनका उपयोग किया जाता है।
इसे केवल धार्मिक निषेध के रूप में देखने के बजाय श्रम और उपकरणों के संबंध के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। साल भर लगातार काम करने वाली मशीन के लिए एक दिन का निरीक्षण, सफाई और रखरखाव व्यावहारिक दृष्टि से भी उपयोगी हो सकता है।
यानी परंपरा और आधुनिक कार्य-सुरक्षा के बीच यहां एक दिलचस्प संबंध दिखाई देता है। मशीन को केवल उत्पादन का साधन न मानकर उसकी देखभाल करना, उसकी स्थिति जांचना और उसे व्यवस्थित रखना किसी भी उद्योग की कार्यक्षमता के लिए आवश्यक है।
हालांकि पूजा के धार्मिक नियम और औद्योगिक सुरक्षा के नियम अलग-अलग विषय हैं। मशीन की पूजा करने का अर्थ यह नहीं कि उसके रखरखाव या सुरक्षा संबंधी आधुनिक मानकों की जगह धार्मिक अनुष्ठान ले सकता है। दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है।
विश्वकर्मा की पौराणिक छवि में क्या-क्या शामिल है?
पौराणिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पी के रूप में वर्णित किया गया है। उनसे अनेक दिव्य नगरों, भवनों, अस्त्रों और उपकरणों के निर्माण की कथाएं जुड़ी हैं।
लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में स्वर्ण लंका, इंद्रपुरी, द्वारका और पुष्पक विमान जैसे निर्माणों का संबंध विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है। इन कथाओं का उद्देश्य ऐतिहासिक निर्माण-प्रमाण देना नहीं, बल्कि विश्वकर्मा की दिव्य निर्माण-कुशलता को धार्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना है। जागरण और अन्य धार्मिक स्रोतों में भी इन पौराणिक निर्माणों का उल्लेख विश्वकर्मा से जुड़ी मान्यताओं के रूप में किया गया है।
यहां तथ्य और आस्था के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। इन नगरों और दिव्य वस्तुओं की कथाएं धार्मिक साहित्य और परंपरा का हिस्सा हैं; इन्हें आधुनिक इतिहास या पुरातात्विक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
भगवान विश्वकर्मा और आधुनिक इंजीनियरिंग के बीच क्या संबंध है?
आज विश्वकर्मा पूजा का दायरा केवल पारंपरिक कारीगरों तक सीमित नहीं है। इंजीनियरिंग कॉलेजों, तकनीकी संस्थानों, ITI, पॉलिटेक्निक, फैक्ट्रियों और आधुनिक औद्योगिक इकाइयों में भी इस दिन को अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है।
इसका कारण समझना कठिन नहीं है। इंजीनियरिंग मूल रूप से ज्ञान को व्यवहार में बदलने की प्रक्रिया है। मशीन डिजाइन करना, पुल बनाना, भवन की संरचना तैयार करना, वाहन विकसित करना, उत्पादन लाइन स्थापित करना या किसी तकनीकी समस्या का समाधान करना—इन सभी में ज्ञान के साथ कौशल और निर्माण की क्षमता की आवश्यकता होती है।
प्रभात खबर की रिपोर्ट में भी विश्वकर्मा पूजा को इंजीनियरिंग, ITI और तकनीकी शिक्षा से जोड़ते हुए कौशल और व्यावहारिक प्रशिक्षण के महत्व पर जोर दिया गया है।
इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा का आधुनिक संदेश यह हो सकता है कि तकनीकी शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहे। ज्ञान तब अधिक उपयोगी होता है जब वह वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो।
क्या विश्वकर्मा पूजा केवल मशीनों की पूजा है?
नहीं। यही इस पर्व को समझने का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
यदि केवल मशीन ही पूजा का केंद्र होती तो जिस व्यक्ति ने उस मशीन को डिजाइन किया, बनाया, चलाया और उसकी मरम्मत की, उसकी भूमिका पीछे चली जाती। जबकि विश्वकर्मा की पूरी अवधारणा में ‘निर्माण’ और ‘कौशल’ केंद्रीय तत्व हैं।
इसलिए विश्वकर्मा पूजा को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है—सृजन, साधन और श्रम।
सृजन का अर्थ है कुछ नया बनाना। साधन का अर्थ है उस निर्माण के लिए आवश्यक उपकरण और तकनीक। श्रम का अर्थ है वह मानवीय प्रयास जो ज्ञान और साधन को वास्तविक परिणाम में बदलता है।
यही वजह है कि यह पर्व कारीगरों और तकनीकी कामगारों के लिए विशेष महत्व रखता है।
श्रम के सम्मान का पर्व भी है विश्वकर्मा पूजा
भारतीय समाज में श्रम के अनेक रूप रहे हैं। खेती से लेकर धातु-कर्म, लकड़ी का काम, वस्त्र निर्माण, भवन निर्माण, मूर्तिकला, आभूषण निर्माण और अन्य हस्तशिल्प तक—कुशल हाथों ने भारतीय सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विश्वकर्मा पूजा इस श्रम को सांस्कृतिक सम्मान देती दिखाई देती है। आधुनिक समय में जब मशीनों और ऑटोमेशन के कारण उत्पादन प्रक्रियाएं बदल रही हैं, तब भी किसी मशीन को संचालित करने, उसका रखरखाव करने, उसकी खराबी पहचानने और उत्पादन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए प्रशिक्षित मानव कौशल की आवश्यकता बनी हुई है।
दूरदर्शन न्यूज की एक हालिया सामग्री ने भी विश्वकर्मा पूजा को सृजन, श्रम, कौशल, तकनीकी दक्षता और निर्माण की परंपरा के सम्मान से जोड़ा है।
इसलिए इस पर्व का आधुनिक अर्थ केवल ‘मशीन की पूजा’ नहीं, बल्कि उस पूरी श्रम-व्यवस्था के प्रति सम्मान भी है जो किसी उत्पाद या संरचना को अस्तित्व में लाती है।
बदलती तकनीक के दौर में विश्वकर्मा पूजा का अर्थ
आज औजारों की सूची बदल चुकी है। कभी कारीगर के हाथ में हथौड़ा, छेनी और आरी प्रमुख उपकरण थे। आज उसके साथ CNC मशीन, रोबोटिक सिस्टम, कंप्यूटर, 3D प्रिंटर, ड्रोन, ऑटोमेशन सिस्टम और अत्याधुनिक परीक्षण उपकरण भी जुड़ गए हैं।
तकनीक बदलती रहती है, लेकिन निर्माण का मूल सिद्धांत वही रहता है—ज्ञान, कौशल, उपकरण और मानवीय प्रयास।
इसी कारण विश्वकर्मा पूजा आधुनिक तकनीक से असंगत नहीं है। बल्कि इसे तकनीकी युग में नए अर्थ के साथ देखा जा सकता है। आज किसी इंजीनियर के लिए उसका कंप्यूटर और डिजाइन सॉफ्टवेयर उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना किसी पारंपरिक कारीगर के लिए उसका औजार।
हालांकि धार्मिक अनुष्ठान की स्थानीय परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन पर्व की मूल भावना को तकनीकी बदलाव के साथ जोड़ा जा सकता है।
कार्यस्थल की सफाई से शुरू होती है पूजा
विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कार्यस्थल की सफाई एक प्रमुख परंपरा है। मशीनों और औजारों की सफाई भी की जाती है। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है।
जागरण और अन्य समकालीन रिपोर्टों में पूजा से पहले कार्यस्थल, मशीनों और उपकरणों की सफाई तथा पूजा के बाद पुष्प, चंदन, रोली आदि अर्पित करने जैसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
व्यावहारिक दृष्टि से भी यह अवसर कार्यस्थल की स्वच्छता और उपकरणों की स्थिति की जांच के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। विशेषकर औद्योगिक इकाइयों में मशीनों की नियमित सफाई, निरीक्षण और रखरखाव सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या घर में भी की जा सकती है विश्वकर्मा पूजा?
विश्वकर्मा पूजा को केवल फैक्ट्री या वर्कशॉप तक सीमित मानना जरूरी नहीं है। वर्तमान धार्मिक परंपरा में घर पर भी भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने की बात कही जाती है। विशेष रूप से वे लोग जो किसी तकनीकी, निर्माण या शिल्प संबंधी कार्य से जुड़े हैं, अपनी कार्य-संबंधी वस्तुओं को पूजा में शामिल कर सकते हैं।
जागरण की 2026 की जानकारी के अनुसार भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए घर पर पूजा करने पर कोई ऐसा सार्वभौमिक कठोर नियम नहीं बताया गया है, जो इसे केवल कारखानों तक सीमित करता हो।
फिर भी पूजा की विधि, मुहूर्त और स्थानीय परंपरा के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग या परिवार की परंपरा को प्राथमिकता देना उचित है।
पूजा में सुरक्षा को नजरअंदाज न करें
विश्वकर्मा पूजा मशीनों और औजारों से जुड़ा पर्व है, इसलिए सुरक्षा का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारी मशीनों, विद्युत उपकरणों, मोटरों या औद्योगिक संयंत्रों पर पूजा करते समय सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है।
गीले हाथों से विद्युत उपकरण छूना, मशीन के खुले हिस्सों पर बिना सुरक्षा के पूजा सामग्री रखना या चलती मशीन के पास अनावश्यक भीड़ करना उचित नहीं है।
धार्मिक आस्था अपनी जगह है और औद्योगिक सुरक्षा अपने स्थान पर। दोनों के बीच संतुलन रखना ही जिम्मेदार तरीका है।
पूजा के अवसर पर मशीन बंद हो तो उसके मुख्य सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए सफाई और निरीक्षण किया जा सकता है। किसी भी विद्युत या भारी औद्योगिक उपकरण के साथ कंपनी की सुरक्षा प्रक्रिया को धार्मिक अनुष्ठान से ऊपर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
विश्वकर्मा पूजा और ‘स्किल इंडिया’ जैसी आधुनिक अवधारणाएं
आज भारत में तकनीकी कौशल, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार योग्य क्षमताओं पर जोर बढ़ा है। ऐसे समय में विश्वकर्मा पूजा की सांस्कृतिक अवधारणा को कौशल के सम्मान से जोड़कर देखना स्वाभाविक है।
यह पर्व यह संदेश देता है कि हाथ से काम करना, मशीन चलाना, वस्तु बनाना या तकनीकी समस्या हल करना किसी भी समाज की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण कार्य हैं।
लेकिन यहां भी धार्मिक परंपरा और सरकारी कौशल कार्यक्रमों को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा। दोनों अलग संदर्भ हैं। फिर भी सामाजिक स्तर पर दोनों के बीच ‘कौशल के सम्मान’ का एक साझा विचार दिखाई दे सकता है।
महिलाओं और नई पीढ़ी के लिए भी है इसका संदेश
विश्वकर्मा पूजा का एक आधुनिक पहलू यह भी है कि तकनीकी और शिल्प क्षेत्र को केवल पुरुषों तक सीमित न समझा जाए। आज महिलाएं इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, डिजाइन, विनिर्माण, रोबोटिक्स, आर्किटेक्चर और अनेक तकनीकी क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
नई पीढ़ी के लिए इस पर्व को केवल पूजा के दिन के रूप में नहीं, बल्कि ‘कुछ बनाने’ की प्रेरणा के रूप में भी समझा जा सकता है।
स्कूलों और तकनीकी संस्थानों में इस अवसर पर विद्यार्थियों को भारतीय शिल्प परंपरा, इंजीनियरिंग इतिहास, मशीनों की भूमिका और आधुनिक तकनीक के विकास से परिचित कराया जा सकता है।
इस तरह परंपरा केवल स्मृति नहीं रहती, बल्कि शिक्षा का माध्यम बन सकती है।
विश्वकर्मा पूजा की सबसे बड़ी सीख क्या है?
विश्वकर्मा पूजा के केंद्र में आखिरकार ‘निर्माण’ है। चाहे वह धार्मिक कथा का दिव्य निर्माण हो या आधुनिक इंजीनियर द्वारा तैयार की गई मशीन—दोनों में सृजन की अवधारणा मौजूद है।
यह पर्व याद दिलाता है कि कोई भी वस्तु अपने आप अस्तित्व में नहीं आती। उसके पीछे किसी का विचार, किसी का श्रम, किसी की तकनीकी दक्षता और किसी साधन का उपयोग होता है।
इसी कारण मशीनों और औजारों की पूजा को अंधविश्वास की दृष्टि से देखने के बजाय उसके सांस्कृतिक अर्थ को समझना अधिक उपयोगी है। एक मशीन स्वयं पूजा का अंतिम उद्देश्य नहीं है; वह मानव कौशल और श्रम की अभिव्यक्ति का साधन है।
शोधकर्ताओं ने भी विश्वकर्मा पूजा के अध्ययन में इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि समय के साथ यह पूजा केवल पारंपरिक कारीगर समुदायों तक सीमित न रहकर आधुनिक औद्योगिक और तकनीकी समाज में भी नए अर्थ ग्रहण करती गई।
धार्मिक आस्था और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन जरूरी
विश्वकर्मा पूजा की धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं। भगवान विश्वकर्मा को दिव्य वास्तुकार या देवशिल्पी मानना धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। दूसरी ओर मशीनों की कार्यक्षमता, इंजीनियरिंग डिजाइन, उत्पादन क्षमता और सुरक्षा विज्ञान के नियमों पर आधारित होते हैं।
इसलिए किसी मशीन की पूजा को उसकी तकनीकी देखभाल का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। पूजा श्रद्धा का विषय है और रखरखाव तकनीकी आवश्यकता।
इसी संतुलित दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा को देखा जाए तो यह पर्व आधुनिक जीवन के लिए भी सार्थक संदेश देता है—जिस साधन से काम करते हैं, उसकी कद्र करें; जिस कौशल से निर्माण करते हैं, उसका सम्मान करें और जिस श्रम से समाज आगे बढ़ता है, उसे गरिमा दें।
आज जब मशीनें बदल रही हैं, तब विश्वकर्मा पूजा का महत्व क्यों बना हुआ है?
तकनीक तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन ने उत्पादन और कार्य की प्रकृति में बड़े बदलाव किए हैं। आने वाले समय में कई ऐसे काम भी मशीनों और सॉफ्टवेयर से होने लगेंगे जिन्हें आज मनुष्य करते हैं।
लेकिन निर्माण की मूल प्रक्रिया में मानवीय रचनात्मकता, निर्णय क्षमता और कौशल की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यही कारण है कि विश्वकर्मा पूजा की अवधारणा आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है।
कभी औजार लकड़ी और लोहे के होते थे, फिर मशीनें आईं, अब डिजिटल उपकरण और रोबोटिक प्रणालियां हैं। साधन बदल गए, लेकिन ‘सृजन के साधन का सम्मान’ करने की भावना बनी हुई है।
मशीन से आगे बढ़कर मशीन बनाने वाले हाथों तक पहुंचती है यह परंपरा
विश्वकर्मा पूजा को केवल मशीनों पर फूल चढ़ाने और औजारों की पूजा करने वाले पर्व के रूप में देखना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देता है।
ऋग्वेद में विश्वकर्मा से जुड़ी अवधारणा सृष्टि और निर्माण के व्यापक दार्शनिक प्रश्नों से जुड़ी दिखाई देती है। बाद की पौराणिक परंपराओं में वे देवशिल्पी और वास्तुकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आधुनिक भारत में उनकी पूजा कारखानों, वर्कशॉप, निर्माण स्थलों और तकनीकी संस्थानों तक फैल गई है।
मशीन और औजार इसलिए पूजे जाते हैं क्योंकि वे काम के साधन हैं। लेकिन उनके पीछे जिस मनुष्य का ज्ञान और श्रम है, विश्वकर्मा पूजा का सांस्कृतिक संदेश उससे भी आगे जाता है।
यह पर्व कहता है कि निर्माण करने वाले हाथों का सम्मान होना चाहिए, कौशल को महत्व मिलना चाहिए और काम के साधनों की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है जितना उनसे उत्पादन लेना।
आज के तकनीकी युग में शायद विश्वकर्मा पूजा का सबसे आधुनिक अर्थ यही है—तकनीक का सम्मान केवल मशीन के रूप में नहीं, बल्कि उस ज्ञान, कौशल, श्रम और जिम्मेदारी के रूप में किया जाए जो मशीन को उपयोगी बनाती है।
17 सितंबर को जब देश के अलग-अलग हिस्सों में मशीनों और औजारों पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाए जाएंगे, तब उस दृश्य को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखने के बजाय भारतीय समाज की उस लंबी परंपरा के रूप में भी समझा जा सकता है, जिसमें ‘बनाने’ की क्षमता को स्वयं एक मूल्य माना गया है।
और शायद यही कारण है कि हजारों साल पुरानी विश्वकर्मा की अवधारणा आज भी कारखाने की मशीन से लेकर आधुनिक इंजीनियर के कंप्यूटर तक अपना सांस्कृतिक अर्थ खोज लेती है।






