
संवाद 24 डेस्क। सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में ब्रह्म पुराण का विशेष स्थान माना जाता है। इसे कई परंपराओं में आदि पुराण भी कहा गया है, क्योंकि यह महापुराणों की सूची में प्रथम स्थान पर आता है। यद्यपि इसके नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से संबंधित होगा, लेकिन वास्तव में इसका स्वरूप अत्यंत व्यापक है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, देवताओं की कथाएं, राजवंशों का इतिहास, धर्म, योग, दान, व्रत, मंदिरों की महिमा और सबसे बढ़कर भारत के अनेक पवित्र तीर्थों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। उपलब्ध पांडुलिपियों में इसका बड़ा भाग तीर्थ-माहात्म्य और पवित्र भूगोल (Sacred Geography) को समर्पित है।
तीर्थ केवल स्थान नहीं, आत्मशुद्धि का माध्यम हैं
ब्रह्म पुराण तीर्थयात्रा को केवल धार्मिक पर्यटन नहीं मानता। इसके अनुसार यदि मन, वाणी और आचरण शुद्ध न हों तो केवल नदियों में स्नान करने से पूर्ण पुण्य की प्राप्ति नहीं होती। पुराण स्पष्ट करता है कि वास्तविक तीर्थ मनुष्य का निर्मल अंतःकरण है और बाहरी तीर्थ उसी आंतरिक शुद्धि के साधन हैं। इस कारण तीर्थयात्रा का उद्देश्य केवल मंदिर दर्शन नहीं बल्कि आत्मसंयम, सेवा, दान और ईश्वर-चिंतन भी है।
भारत को देवभूमि के रूप में प्रस्तुत करता है ब्रह्म पुराण
ब्रह्म पुराण भारतवर्ष को कर्मभूमि और मोक्षभूमि बताता है। इसमें पर्वतों, नदियों, समुद्रों, वनों और नगरों को दिव्य शक्ति से युक्त माना गया है। विशेष रूप से गोदावरी क्षेत्र, उत्कल (वर्तमान ओडिशा), पुरुषोत्तम क्षेत्र, कोणार्क तथा अनेक प्राचीन तीर्थों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। विद्वानों का मत है कि वर्तमान उपलब्ध ब्रह्म पुराण के लगभग 60 प्रतिशत अध्याय किसी न किसी रूप में तीर्थों और पवित्र स्थलों की महिमा पर केंद्रित हैं।
पुष्कर : ब्रह्मा की आराधना का सर्वोच्च तीर्थ
ब्रह्म पुराण में सर्वप्रथम जिन प्रमुख तीर्थों का उल्लेख मिलता है, उनमें राजस्थान का पुष्कर अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि यहां स्वयं ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था और उनके कमल के गिरने से पवित्र पुष्कर सरोवर की उत्पत्ति हुई। इसी कारण यह संसार में भगवान ब्रह्मा के प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है। पुराण के अनुसार पुष्कर में स्नान, पितरों का तर्पण, दान तथा भगवान ब्रह्मा की उपासना से अनेक जन्मों के पापों का नाश होता है और साधक को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।
नैमिषारण्य : जहां ऋषियों ने सुनी पुराणों की कथा
उत्तर प्रदेश स्थित नैमिषारण्य का भी ब्रह्म पुराण में अत्यंत आदर के साथ उल्लेख मिलता है। यह वही स्थान माना जाता है जहां शौनक आदि ऋषियों ने महर्षि सूत से अनेक पुराणों का श्रवण किया। पुराण इसे तप, यज्ञ, वेदाध्ययन और ज्ञान प्राप्ति का श्रेष्ठ केंद्र बताता है। मान्यता है कि यहां किया गया जप, हवन और दान सामान्य स्थानों की अपेक्षा कई गुना अधिक फलदायी होता है। इसलिए नैमिषारण्य को ज्ञान और साधना की भूमि के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है।
प्रभास क्षेत्र : जहां शिव और श्रीकृष्ण दोनों की स्मृतियां जुड़ी हैं
गुजरात का प्रभास क्षेत्र भी ब्रह्म पुराण में प्रमुख तीर्थ के रूप में वर्णित है। यह क्षेत्र भगवान शिव के प्रसिद्ध सोमनाथ ज्योतिर्लिंग तथा भगवान श्रीकृष्ण के अंतिम लीला-स्थल के कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है। पुराण के अनुसार यहां स्नान, शिवपूजन और पितृ तर्पण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। प्रभास क्षेत्र को देवताओं और ऋषियों की तपोभूमि भी कहा गया है, जहां अनेक यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।
गंगाद्वार (हरिद्वार) : मोक्ष का प्रवेश द्वार
ब्रह्म पुराण में गंगाद्वार अर्थात वर्तमान हरिद्वार का भी विशेष महत्व बताया गया है। हिमालय से उतरकर गंगा का मैदानों में प्रवेश यहीं से माना जाता है। इसलिए इसे देवताओं का द्वार और मोक्ष का प्रवेश मार्ग कहा गया है। पुराण के अनुसार गंगाद्वार में स्नान, दान, श्राद्ध और जप करने से मनुष्य के पाप क्षीण होते हैं तथा उसे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यही कारण है कि आज भी करोड़ों श्रद्धालु हरिद्वार को अपनी तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र मानते हैं।
(क्रमशः — भाग-2 में पढ़िए: ब्रह्म पुराण में प्रयागराज, काशी, गया, गोदावरी, पुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथ पुरी), कोणार्क, एकाम्र क्षेत्र और अन्य प्रमुख तीर्थों का विस्तृत वर्णन।)






