“700 श्लोक, एक जीवन दर्शन: डॉ. भागवत ने बताई श्रीमद्भगवद्गीता की अद्भुत शक्ति”
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संवाद 24 लखनऊ ।
दिव्य गीता कार्यक्रम के मंच पर रविवार को आध्यात्मिक विचारों, राष्ट्रीय कर्तव्यबोध और सनातन मूल्यों का एक समन्वित संदेश देखने को मिला। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल अध्ययन का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली साधना है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि कार्यक्रम का समापन मात्र औपचारिकता है, जबकि गीता के संदेश को जीवन में उतारना ही वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए। सरसंघचालक जी के अनुसार “गीता के 700 श्लोकों में जीवन के हर प्रश्न का उत्तर है। यदि प्रतिदिन दो श्लोक पढ़कर उनके सार को व्यवहार में उतारा जाए, तो एक वर्ष में जीवन पूरी तरह ‘गीतामय’ होने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।” “दुनिया आज उसी मोह और दुविधा में है, जिसमें युद्धभूमि पर अर्जुन थे।”
अपने संबोधन में भागवत जी ने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों की तुलना महाभारतकालीन संघर्ष से करते हुए कहा कि आज का विश्व भय, मोह और असंतुलन से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि भौतिक समृद्धि बढ़ने के बावजूद मनुष्य के भीतर शांति और संतोष का अभाव बढ़ा है। “हजार वर्ष पहले जो विकृतियाँ थीं, वे आज भी रूप बदलकर मौजूद हैं। लोग महसूस कर रहे हैं कि अब सही मार्ग चुनने का समय है, और वह मार्ग भारत की सनातन परंपरा तथा गीता के ज्ञान से ही निकलता है।”
सरसंघचालक जी ने गीता को उपनिषदों और समस्त दर्शन का सार बताते हुए कहा कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जिसे धर्म, सत्व और कर्तव्य का पथ बताया था, वही आज मानवता के लिए भी पथप्रदर्शक है। उन्होंने कहा –
- समस्या से भागना नहीं, उसका सामना करना गीता का पहला संदेश है।
- असली कर्ता परमात्मा है, मनुष्य केवल माध्यम है।
- गीता का आचरण भय, मोह और दुर्बलता से ऊपर उठाता है।
- परोपकार का छोटा-सा कार्य भी श्रेष्ठ माना जाता है।
भागवत जी ने विश्वास जताया कि गीता के मार्ग पर चलकर ही विश्व में स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है और भारत पुनः विश्वगुरु की भूमिका निभा सकता है।
“धर्म हमारे यहाँ जीवन जीने की कला है” मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी गीता के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत में सनातन परंपरा गीता के 18 अध्यायों और 700 श्लोकों को जीवन की रीति मानकर चलती आई है।
सीएम योगी ने कहा “हमारे लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का विज्ञान है। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। अधर्म किसी भी क्षेत्र में विनाश का कारण बनता है।” उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष की चर्चा करते हुए कहा कि विश्वभर में संघ के कार्यों को लेकर उत्सुकता है। “दुनिया भर के राजनयिक हमसे पूछते हैं कि क्या हमारा संघ से संबंध है। हम गर्व से कहते हैं, हाँ, हम स्वयंसेवक हैं।”
सीएम ने संघ के सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन जाति, मत, धर्म, भाषा से ऊपर उठकर हर पीड़ित व्यक्ति की निस्वार्थ सेवा करता है। “संघ की शिक्षा है, राष्ट्र प्रथम। पीड़ित के साथ खड़ा होना ही सेवा है, और यही भारत को परम वैभव तक ले जाने का मार्ग है।”
संतों ने गीता के व्यापक संदेश को बताया युगोपयोगी
कार्यक्रम में उपस्थित संतों ने भी गीता के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला –
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज ने कहा कि दिव्य गीता प्रेरणा उत्सव पूरे देश में सकारात्मक संदेश पहुंचा रहा है। उन्होंने बताया कि संघ का पंच-परिवर्तन संदेश समाज में नई ऊर्जा का संचार कर रहा है।
रामानन्द आचार्य श्रीधर महाराज ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक समाधान गीता और वैदिक परंपरा में निहित है। उन्होंने यज्ञ, जल संरक्षण और प्रकृति रक्षा को आधुनिक समय की सबसे प्रमुख आवश्यकता बताया।
स्वामी परमात्मानन्द जी महाराज ने कहा “गीता का पहला और अंतिम शब्द ‘धर्म’ है। इसलिए गीता का सार ही धर्म का संदेश है।”
दिव्य गीता कार्यक्रम आध्यात्मिकता, सामाजिक कर्तव्य और राष्ट्रीय चेतना का एक समन्वित संदेश छोड़ते हुए सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम ने इस बात को पुनः रेखांकित किया कि गीता भारतीय जीवन-दर्शन की धुरी है और समाज को संतुलन, मार्गदर्शन और प्रेरणा देने की शक्ति आज भी उसी में निहित है।






