
संवाद 24 नई दिल्ली। अफ्रीकी महाद्वीप पर आंतरिक कलह और सैन्य टकराव किस कदर बेकाबू हो चुका है, इसका दिल दहला देने वाला मंजर एक बार फिर सामने आया है। सूडान और दक्षिण सूडान के बीच रणनीतिक व तेल समृद्ध विवादित क्षेत्र अब्येई में सोमवार दोपहर को हुए एक भीषण हवाई ड्रोन हमले ने पूरे इलाके को श्मशान में तब्दील कर दिया। रोजमर्रा की तरह जब लोग स्थानीय बाजार में खरीदारी और अपनी आजीविका में व्यस्त थे, तभी अचानक आसमान से आग के गोले बरसने लगे। पलक झपकते ही चारों तरफ लाशों के ढेर, मलबे और चीख-पुकार का खौफनाक मंजर छा गया। इस दर्दनाक हमले में अब तक 150 से अधिक निर्दोष नागरिकों की जान जा चुकी है, जिनमें भारी तादाद में मासूम बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हैं।
दोपहर की चहल-पहल के बीच अचानक गूंजे धमाके
प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, यह खूनी हमला सोमवार दोपहर के वक्त हुआ। विवादित सीमाई क्षेत्र अब्येई का मुख्य बाजार उस समय स्थानीय व्यापारियों, राहगीरों और ग्राहकों से पूरी तरह भरा हुआ था। तभी एक के बाद एक कई सटीक ड्रोन स्ट्राइक की गईं। शुरुआती जानकारी में मरने वालों की संख्या 70 के आसपास आंकी जा रही थी, लेकिन जैसे-जैसे मलबे से शव निकाले गए और गंभीर घायलों ने दम तोड़ा, यह आंकड़ा तेजी से बढ़ता चला गया। अब्येई में सूचना मामलों के कार्यवाहक मंत्री योहाना अकोल नगोर ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए पुष्टि की है कि हमले में मृतकों की संख्या 73 से बढ़कर 153 तक पहुंच चुकी है। उन्होंने इस बर्बर नरसंहार के लिए सूडानी सेना की कार्रवाई को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) की ओर से अभी तक इस हमले को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
आखिर निशाने पर कौन था? ईंधन डिपो की आड़ में आम जनता बनी ढाल
राजनयिक और सामरिक सूत्रों के अनुसार, यह हवाई हमला कथित तौर पर बाजार क्षेत्र में स्थित एक ईंधन डिपो और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को नष्ट करने के मकसद से किया गया था। गृहयुद्ध के दौरान विद्रोही गुटों और विरोधी सैन्य टुकड़ियों के आवागमन को रोकने के लिए ईंधन के ठिकानों को रणनीतिक लक्ष्य बनाया जाता रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि घनी आबादी वाले नागरिक बाजार के बीच ऐसे जानलेवा हमले की योजना क्यों बनाई गई? नतीजा यह हुआ कि रणनीतिक लक्ष्य को ध्वस्त करने के चक्कर में ईंधन टैंकों में लगी आग और धमाकों की चपेट में सैकड़ों बेकसूर आ गए, जिससे मरने वालों का आंकड़ा भयावह रूप से बढ़ गया। अस्पतालों में इस समय स्थिति बेहद विकट है। स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों पर बुनियादी दवाओं, रक्त और सर्जिकल सुविधाओं की भारी कमी देखी जा रही है। दर्जनों घायल गंभीर रूप से झुलसी हालत में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं, जिसके कारण मृतकों की संख्या में अभी और इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है।
महाद्वीप में हिंसा का दोहरा तांडव: माली में भी कत्लेआम
अफ्रीका में जारी यह मानवीय संकट केवल सूडान तक ही सीमित नहीं है। इसी घटनाक्रम के समानांतर, पश्चिमी अफ्रीकी देश माली के पूर्वी इलाके मेनाका से भी रूह कंपा देने वाली खबर सामने आई है। वहां आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े उग्रवादियों ने निहत्थे नागरिकों पर अंधाधुंध हमला कर दिया। स्थानीय सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस हमले में कम से कम 48 निर्दोष ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी गई, जिनमें अधिकांश बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। आतंकियों ने नागरिकों पर यह क्रूर आरोप लगाते हुए हमला किया कि उन्होंने माली की राष्ट्रीय सेना को आतंकी ठिकानों के बारे में गुप्त सूचनाएं मुहैया कराई थीं, जिसके आधार पर सेना ने पहले ड्रोन हमले किए थे। इसी बदले की भावना में आतंकियों ने निर्दोषों का कत्लेआम कर दिया।
वैश्विक बिरादरी के लिए गंभीर चेतावनी
अब्येई और माली की ये दोनों ही घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों (Geneva Conventions) की सरेआम धज्जियां उड़ाए जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। नागरिक बस्तियों, बाजारों और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाना स्पष्ट रूप से युद्ध अपराध के दायरे में आता है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय शांति मिशनों की मौजूदगी के बावजूद इन विवादित क्षेत्रों में आम नागरिक लगातार दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और विश्व शक्तियां सूडान व पड़ोसी देशों में चल रहे इस अंतहीन गृहयुद्ध पर लगाम लगाने के लिए कोई कड़ा कूटनीतिक दबाव नहीं बनाती हैं, तो आने वाले दिनों में यह मानवीय संकट पूरे महाद्वीप को अपनी चपेट में ले लेगा। सवाल वही बरकरार है कि सत्ता और नियंत्रण की इस सैन्य महत्वाकांक्षा में आखिर कब तक निर्दोष बच्चों और आम नागरिकों का खून बहता रहेगा?






