टाटा समूह विवाद: टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद, आमने-सामने आए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी

​​​​संवाद 24 नई दिल्ली।​​​​ टाटा समूह के अंदरूनी विवाद को लेकर देश के दो वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी कानूनी रूप से आमने-सामने आ गए हैं। पूर्व में साइरस मिस्त्री विवाद के दौरान ये दोनों ही वरिष्ठ वकील सुप्रीम कोर्ट में टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स की ओर से एक साथ पैरवी कर रहे थे। अब बदले हुए घटनाक्रम में दोनों अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
इस मामले में डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी टाटा ट्रस्ट्स की ओर से पक्ष रख रहे हैं, जो टाटा संस के कुछ हालिया निर्णयों पर सवाल उठा रहा है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे टाटा संस प्रबंधन और उसके चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के समर्थन में खड़े हैं।

​​​​अभिषेक मनु सिंघवी के तर्क और आरोप​​​​
डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट साझा करते हुए टाटा संस के मौजूदा प्रबंधन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
​​​​शेयरधारकों के अधिकार:​​​​ सिंघवी का कहना है कि टाटा संस प्रबंधन द्वारा लिए जा रहे निर्णय शेयरधारकों के अधिकारों को कमजोर कर रहे हैं।
​​​​कॉर्पोरेट गवर्नेंस:​​​​ उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी तय कॉर्पोरेट गवर्नेंस नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी कर रही है।
​​​​सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संदर्भ:​​​​ सिंघवी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने टाटा बनाम साइरस मिस्त्री मामले में जो ऐतिहासिक फैसला दिया था, उसमें स्पष्ट तौर पर टाटा संस पर टाटा ट्रस्ट्स की प्राथमिकता और उसकी सर्वोच्च स्थिति को रेखांकित किया गया था। उनका आरोप है कि मौजूदा प्रबंधन उस फैसले की भावना की अनदेखी कर रहा है।
​​​​कानूनी समाधान:​​​​ सिंघवी ने स्पष्ट किया कि जब नियमों और अधिकारों को लेकर इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका अंतिम और उचित समाधान केवल कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।

​​​​हरीश साल्वे का रुख और पब्लिक लिस्टिंग की दलील​​​​
टाटा संस और चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने सार्वजनिक रूप से प्रबंधन के कदमों का समर्थन किया है:
​​​​एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का समर्थन:​​​​ साल्वे ने एन. चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन नियुक्त किए जाने के निर्णय का बचाव किया है और इसे समूह के व्यावसायिक संचालन के लिए आवश्यक बताया है।
​​​​पब्लिक लिस्टिंग को बताया हल:​​​​ साल्वे का तर्क है कि टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध (पब्लिक लिस्ट) किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनी होने के कारण जो प्रतिबंधात्मक नियम लागू हैं, वही इस पूरे विवाद और बोर्डरूम में होने वाले टकराव की मुख्य वजह हैं। कंपनी के पब्लिक होते ही ये बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।
​​​​विरोध करने वालों पर टिप्पणी:​​​​ साल्वे ने कहा कि जो लोग टाटा संस की पब्लिक लिस्टिंग का विरोध कर रहे हैं, वे कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर चिंतित नहीं हैं, बल्कि वे अपने निजी हितों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते इसका विरोध कर रहे हैं।

​​​​टाटा-मिस्त्री विवाद से वर्तमान स्थिति की तुलना​​​​
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2016 के साइरस मिस्त्री विवाद के समय स्थितियां पूरी तरह भिन्न थीं:
1- उस समय टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स एक साझा पक्ष के रूप में कोर्ट में थे।
2- हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी दोनों ने मिलकर यह दलील दी थी कि टाटा समूह में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका मुख्य और मार्गदर्शक की है।
3- वर्तमान में, टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड के बीच अधिकारों, निर्णयों और स्वायत्तता को लेकर मतभेद उभरे हैं, जिसके चलते दोनों दिग्गज वकील अब एक-दूसरे के विपरीत पक्षों की पैरवी कर रहे हैं।
वर्तमान में इस विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु यह है कि क्या टाटा संस के बोर्ड को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है या फिर टाटा ट्रस्ट्स के वीटो और विशेषाधिकारों की प्राथमिकता पहले की तरह प्रभावी रहेगी। दोनों पक्षों की कानूनी दलीलों के बाद अब यह मामला आगे किस प्रकार सुलझता है, इस पर कॉर्पोरेट और कानूनी जगत की निगाहें टिकी हैं।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *