
संवाद 24 डेस्क। उड़ीसा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर भारत की उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जहां देवता की उपासना केवल मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। भगवान जगन्नाथ को ‘जगत के नाथ’ अर्थात समस्त संसार के स्वामी के रूप में देखा जाता है। पुरी का मंदिर 12वीं शताब्दी से जगन्नाथ परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है और आज भी देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार, मंदिर की वर्तमान भव्य संरचना 12वीं शताब्दी से जुड़ी है और बाद की शताब्दियों में इसमें अनेक निर्माण और विस्तार हुए।
भगवान जगन्नाथ की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उनकी लकड़ी से बनी प्रतिमा है। उनके साथ बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन की भी पूजा होती है। सामान्य हिंदू मंदिरों में जहां पत्थर या धातु की मूर्तियां अधिक दिखाई देती हैं, वहीं पुरी की परंपरा में इन देव विग्रहों का लकड़ी से निर्मित होना अपने आप में अनोखी धार्मिक परंपरा है। इसी कारण भगवान जगन्नाथ को ‘दारुब्रह्म’ से भी जोड़ा जाता है।
कथा की शुरुआत होती है नीलमाधव से
भगवान जगन्नाथ की लोकप्रिय पौराणिक कथा का एक महत्वपूर्ण पात्र है—नीलमाधव। स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य से जुड़ी परंपरा के अनुसार, नीलाचल क्षेत्र में भगवान विष्णु के एक अत्यंत दिव्य रूप नीलमाधव की पूजा होती थी। यह पूजा सामान्य राजकीय व्यवस्था से अलग, वन क्षेत्र में रहने वाले शबर समुदाय से जुड़े विश्वावसु द्वारा की जाती थी। इसी कारण जगन्नाथ परंपरा में शबर या आदिवासी परंपरा की चर्चा विशेष रूप से होती है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं में एकमत नहीं है। ओडिशा की कई परंपराएं और शोध इसे आदिवासी पूजा-परंपराओं से जोड़ते हैं, जबकि इसके विकास को वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध और अन्य धार्मिक धाराओं के प्रभावों से भी समझा गया है। इसलिए नीलमाधव और विश्वावसु की कथा को धार्मिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है, न कि इसे निर्विवाद ऐतिहासिक घटना मानना।
राजा इंद्रद्युम्न को कैसे मिली नीलमाधव की खबर?
कथा के अनुसार अवंती के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के महान भक्त थे। उन्हें जब पता चला कि ओड्र देश में नीलाचल पर्वत पर भगवान विष्णु नीलमाधव के रूप में विराजमान हैं, तो उनके मन में उस दिव्य स्वरूप के दर्शन की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। राजा ने अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को नीलमाधव का पता लगाने के लिए भेजा। स्कंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य में इंद्रद्युम्न की कथा को विस्तार से बताया गया है।
विद्यापति खोज करते हुए उस क्षेत्र में पहुंचे और शबर प्रमुख विश्वावसु के संपर्क में आए। कथा के अनुसार विश्वावसु नीलमाधव के गुप्त उपासक थे और बाहरी लोगों को उस पूजा स्थल की जानकारी नहीं देते थे। विद्यापति ने अंततः विश्वावसु का विश्वास प्राप्त किया। कई लोकप्रिय संस्करणों में बताया जाता है कि विश्वावसु ने अपनी पुत्री ललिता का विवाह विद्यापति से कर दिया और इसके बाद विद्यापति नीलमाधव के दर्शन कर सके।
रास्ते में गिराए गए सरसों के दाने और खुल गया रहस्य
भगवान जगन्नाथ की कथा का यह हिस्सा सबसे अधिक रोचक माना जाता है। लोकप्रचलित और स्कंद पुराण से जुड़ी कथा के अनुसार, विश्वावसु विद्यापति को नीलमाधव के दर्शन कराने के लिए ले गए, लेकिन रास्ता गुप्त रखने के लिए उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी। विद्यापति ने रास्ते को याद रखने के लिए चुपके से सरसों के दाने रास्ते में गिरा दिए।
कुछ समय बाद जब सरसों के पौधे उगे तो विद्यापति उस रास्ते को पहचान सके। इस तरह नीलमाधव के गुप्त स्थान का पता राजा इंद्रद्युम्न तक पहुंचा। यह प्रसंग केवल कथा का रोमांच नहीं बढ़ाता, बल्कि यह भी दिखाता है कि लोकपरंपरा में भगवान के दर्शन की इच्छा को कितनी गहरी आध्यात्मिक आकांक्षा के रूप में देखा गया।
राजा पहुंचे, लेकिन नीलमाधव वहां नहीं थे
विद्यापति से जानकारी मिलने के बाद राजा इंद्रद्युम्न स्वयं नीलाचल की ओर चल पड़े। लेकिन कथा में यहां एक बड़ा मोड़ आता है। जब राजा उस स्थान पर पहुंचे तो नीलमाधव वहां दिखाई नहीं दिए। जिस देवता के दर्शन के लिए राजा इतनी दूर आए थे, उनका अचानक अदृश्य हो जाना इंद्रद्युम्न के लिए गहरा आघात था।
पौराणिक आख्यान में इस घटना को भगवान की लीला के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नीलमाधव का अंतर्धान इस बात का संकेत माना गया कि भगवान अब किसी एक गुप्त स्वरूप में सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि व्यापक रूप में भक्तों के सामने प्रकट होंगे। इसके बाद कथा नीलमाधव से जगन्नाथ के रूप में भगवान के नए प्राकट्य की ओर बढ़ती है।
समुद्र से आया वह रहस्यमय काष्ठ
नीलमाधव के अदृश्य होने से दुखी राजा को आगे भगवान के दारु रूप में प्रकट होने का संकेत मिलता है। कथा के अनुसार समुद्र तट पर एक दिव्य काष्ठ दिखाई दिया। उसमें भगवान विष्णु से जुड़े चिह्न होने की बात कही गई। राजा ने उस काष्ठ को प्राप्त कराया और उससे भगवान के नए विग्रहों के निर्माण की तैयारी शुरू हुई।
यहीं से ‘दारुब्रह्म’ की अवधारणा सामने आती है—अर्थात लकड़ी में दिव्य सत्ता का निवास। भगवान जगन्नाथ की परंपरा में लकड़ी केवल मूर्ति बनाने की सामग्री नहीं रह जाती, बल्कि वह भगवान के शरीर का प्रतीक बनती है। यही कारण है कि जगन्नाथ मंदिर की परंपरा में समय-समय पर पुराने काष्ठ विग्रहों को बदलने की विशेष प्रक्रिया होती है।
जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह कैसे बने?
दिव्य काष्ठ से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह बनाए जाने की कथा अलग-अलग परंपराओं में कुछ भिन्न रूपों में मिलती है। एक लोकप्रिय परंपरा में भगवान स्वयं वृद्ध कारीगर के रूप में आते हैं और शर्त रखते हैं कि जब तक निर्माण पूरा न हो, कोई दरवाजा नहीं खोलेगा। अन्य कथाओं में इस कारीगर को विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।
श्री जगन्नाथ परंपरा से जुड़े विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि निर्माण के दौरान राजा को विग्रह निर्माण स्थल में प्रवेश न करने की चेतावनी दी गई थी। लेकिन जब भीतर से काफी समय तक कोई आवाज नहीं आई तो चिंता और जिज्ञासा बढ़ती गई। अंततः द्वार खोला गया और वहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शन के विशिष्ट रूप दिखाई दिए।
आखिर भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं?
यही प्रश्न भगवान जगन्नाथ की कथा को सबसे रहस्यमय बनाता है। उनके विग्रहों में सामान्य मूर्तियों की तरह स्पष्ट हाथ-पैर नहीं हैं। बड़ी आंखें, विशिष्ट आकार और लकड़ी का शरीर उन्हें भारतीय मूर्तिकला की सामान्य परंपरा से अलग पहचान देते हैं।
लोकप्रिय कथा में कहा जाता है कि निर्माण पूरा होने से पहले ही कक्ष का द्वार खोल दिया गया, जिसके कारण विग्रहों का निर्माण अधूरा रह गया। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। यह ‘अधूरी प्रतिमा’ वाली कहानी लोकप्रिय स्थानीय परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है, जबकि स्कंद पुराण के उपलब्ध आख्यान में इसके विवरण अलग हैं। शोधपरक लेखन में इन दोनों को एक ही ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय ‘पौराणिक कथा’ और ‘स्थानीय परंपरा’ के रूप में अलग-अलग समझना अधिक उचित है।
अधूरापन या पूर्णता का अलग दर्शन?
भगवान जगन्नाथ के विग्रहों का स्वरूप भक्तों और दार्शनिकों के लिए लंबे समय से चिंतन का विषय रहा है। सामान्य मूर्तिकला में देवता की शारीरिक पूर्णता को महत्व दिया जाता है, लेकिन जगन्नाथ का रूप इस परंपरा से अलग दिखाई देता है।
भक्ति परंपरा में इसे इस भाव से समझा जाता है कि ईश्वर किसी निश्चित मानवीय शरीर की सीमा में बंधे नहीं हैं। उनके लिए पूर्णता का अर्थ केवल शारीरिक अंगों का पूरा होना नहीं, बल्कि समस्त जगत में उनकी उपस्थिति है। यही कारण है कि जगन्नाथ का विशिष्ट स्वरूप भक्तिभाव में एक गहरे दार्शनिक प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
तीन देवताओं में छिपी एक बड़ी परंपरा
पुरी में भगवान जगन्नाथ के साथ बलभद्र और सुभद्रा की पूजा होती है। यह त्रयी जगन्नाथ संस्कृति की केंद्रीय पहचान है। रथ यात्रा के दौरान तीनों अलग-अलग रथों पर विराजमान होते हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार, जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है।
इस त्रयी को लेकर भी विभिन्न धार्मिक व्याख्याएं मिलती हैं। वैष्णव परंपरा में जगन्नाथ को कृष्ण से, बलभद्र को बलराम से और सुभद्रा को उनकी बहन के रूप में जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, जगन्नाथ परंपरा का व्यापक सांस्कृतिक विकास केवल एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा। ओडिशा सरकार से जुड़े शोध-सामग्री में जगन्नाथ संस्कृति में विभिन्न धार्मिक और लोक परंपराओं के प्रभाव की चर्चा मिलती है।
रथ यात्रा में भगवान खुद निकलते हैं भक्तों के बीच
भगवान जगन्नाथ की सबसे प्रसिद्ध परंपरा रथ यात्रा है। आमतौर पर मंदिरों में भक्त देवता के दर्शन करने मंदिर पहुंचते हैं, लेकिन पुरी की रथ यात्रा में इसके उलट भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं।
रथ यात्रा में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को भव्य लकड़ी के रथों पर विराजमान कराया जाता है और भक्त उनके रथ खींचते हैं। यात्रा गुंडिचा मंदिर तक जाती है और वापसी को बहुड़ा यात्रा कहा जाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष ‘छेरा पहरा’ भी है, जिसमें पुरी के गजपति महाराजा रथ के मंच की प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। इसे विनम्रता और ईश्वर के सामने समानता के भाव से जोड़ा जाता है। सत्ता और वैभव से ऊपर सेवा का यह प्रतीक रथ यात्रा की सामाजिक व्याख्या को भी महत्वपूर्ण बनाता है।
महाप्रसाद क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
जगन्नाथ संस्कृति में भोजन केवल प्रसाद नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुरी मंदिर का महाप्रसाद अपनी विशिष्ट पाक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार, मंदिर में पारंपरिक ढंग से मिट्टी के बर्तनों में भोजन तैयार किया जाता है और एक के ऊपर एक रखे बर्तनों में पकाने की व्यवस्था होती है।
महाप्रसाद की अवधारणा में भगवान को अर्पित भोजन बाद में भक्तों के लिए प्रसाद बनता है। जगन्नाथ संस्कृति में इसे सामूहिकता और साझा आस्था से जोड़ा गया है। भोजन की यह परंपरा बताती है कि धार्मिक संस्कृति केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह समाज के दैनिक जीवन और सामुदायिक संबंधों को भी प्रभावित करती है।
नीलचक्र से लेकर पतितपावन ध्वज तक
पुरी मंदिर का स्थापत्य और उससे जुड़े अनुष्ठान भी जगन्नाथ परंपरा को विशिष्ट बनाते हैं। मंदिर के शीर्ष पर स्थित नीलचक्र और उसके ऊपर फहराया जाने वाला ध्वज विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार, नीलचक्र अष्टधातु से निर्मित है और मंदिर के ध्वज को प्रतिदिन बदले जाने की परंपरा है।
मंदिर के चार प्रमुख द्वार चारों दिशाओं की ओर हैं। पूर्व दिशा का मुख्य द्वार सिंहद्वार कहलाता है। मंदिर परिसर की स्थापत्य संरचना, धार्मिक अनुष्ठान और सदियों से चली आ रही सेवायत परंपराएं मिलकर पुरी को केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाती हैं।
नवकलेवर: जब भगवान को मिलता है नया शरीर
भगवान जगन्नाथ की परंपरा का सबसे अनोखा पक्ष नवकलेवर है। ‘नवकलेवर’ का सामान्य अर्थ है—नया शरीर। क्योंकि जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के विग्रह लकड़ी के होते हैं, इसलिए विशेष परिस्थितियों में पुराने विग्रहों के स्थान पर नए काष्ठ विग्रह स्थापित किए जाते हैं।
ओडिशा सरकार की सामग्री के अनुसार, नवकलेवर की प्रक्रिया में विशेष ‘दारु’ अर्थात पवित्र वृक्ष की खोज की जाती है। इस प्रक्रिया से जुड़ी वनयाग यात्रा और विशिष्ट पहचान-चिह्नों की परंपरा भी है।
यह परंपरा जगन्नाथ दर्शन के एक महत्वपूर्ण विचार को सामने रखती है—शरीर बदल सकता है, लेकिन दिव्यता की निरंतरता बनी रहती है। इसीलिए नवकलेवर को केवल मूर्ति बदलने की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि शरीर और आत्मा के संबंध से जुड़े धार्मिक प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
जगन्नाथ संस्कृति केवल वैष्णव परंपरा तक सीमित क्यों नहीं रही?
जगन्नाथ परंपरा के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि इसके विकास में अनेक सांस्कृतिक धाराओं का प्रभाव दिखाई देता है। भारत सरकार की एक आधिकारिक सामग्री जगन्नाथ परंपरा को विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक धाराओं के संगम के रूप में वर्णित करती है। ओडिशा की शोध-सामग्री में भी आदिवासी, वैष्णव, शैव, शाक्त और अन्य परंपराओं के बीच अंतःक्रिया का उल्लेख मिलता है।
यही बहुलता जगन्नाथ संस्कृति को विशेष बनाती है। यहां भगवान का स्वरूप किसी एक सीमित धार्मिक पहचान के भीतर बंद नहीं दिखाई देता, बल्कि समय के साथ विकसित हुई अनेक परंपराओं को अपने भीतर समाहित करता नजर आता है।
इतिहास क्या कहता है?
पौराणिक कथा और ऐतिहासिक प्रमाणों को अलग-अलग देखना जरूरी है। इंद्रद्युम्न की कथा धार्मिक साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन आधुनिक इतिहास के स्तर पर उनके समय और उनके द्वारा वर्तमान मंदिर के निर्माण को लेकर निश्चित ऐतिहासिक प्रमाणों पर मतभेद हैं।
पुरी के वर्तमान मंदिर की निर्माण परंपरा सामान्यतः गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव से जोड़ी जाती है। पुरी जिला प्रशासन की सामग्री वर्तमान मंदिर को 12वीं शताब्दी के गंग वंशीय निर्माण से जोड़ती है, जबकि अन्य ऐतिहासिक परंपराओं में अनंगभीम देव के शासनकाल में मंदिर परिसर के पूर्ण होने की चर्चा मिलती है।
इसलिए यह कहना अधिक तथ्यात्मक होगा कि इंद्रद्युम्न की कथा जगन्नाथ परंपरा की पौराणिक आधार-कथा है, जबकि वर्तमान पुरी मंदिर की ऐतिहासिक संरचना मध्यकालीन ओडिशा के राजवंशों से जुड़ी है।
जगन्नाथ कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
भगवान जगन्नाथ की कथा में कई स्तरों पर संदेश दिखाई देता है। राजा इंद्रद्युम्न की भक्ति बताती है कि ईश्वर की खोज केवल राजसी शक्ति से नहीं, बल्कि समर्पण से जुड़ी है। नीलमाधव की गुप्त पूजा लोक और जनजातीय परंपराओं की भूमिका को सामने लाती है। दारु रूप यह संकेत देता है कि दिव्यता किसी एक पदार्थ या स्वरूप में सीमित नहीं है।
अधूरे दिखाई देने वाले विग्रह यह विचार सामने रखते हैं कि ईश्वर की पूर्णता को केवल मानवीय सौंदर्य के मानकों से नहीं मापा जा सकता। रथ यात्रा में भगवान का मंदिर से बाहर आना भक्त और भगवान के संबंध को और अधिक निकट बनाता है। वहीं महाप्रसाद सामूहिकता और साझी आस्था का प्रतीक बन जाता है।
कथा से परंपरा तक, परंपरा से संस्कृति तक
भगवान जगन्नाथ की कथा को केवल एक चमत्कारिक कहानी के रूप में पढ़ना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देगा। नीलमाधव से जगन्नाथ तक की यात्रा में लोकविश्वास, पुराण, राजसत्ता, मंदिर परंपरा, आदिवासी संस्कृति, वैष्णव भक्ति और ओडिशा की सामाजिक स्मृति की कई धाराएं दिखाई देती हैं।
आज पुरी का जगन्नाथ मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। रथ यात्रा देश और दुनिया के अनेक हिस्सों में आयोजित होती है और जगन्नाथ संस्कृति ओडिशा की पहचान के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।
भगवान जगन्नाथ की कथा का आकर्षण शायद इसी में है कि इसमें एक साथ कई प्रश्न उठते हैं—नीलमाधव कौन थे, विश्वावसु की पूजा परंपरा कैसे विकसित हुई, इंद्रद्युम्न की कथा का ऐतिहासिक आधार क्या है, लकड़ी के विग्रहों की परंपरा क्यों बनी और जगन्नाथ का स्वरूप अन्य देव प्रतिमाओं से इतना अलग क्यों है? इन प्रश्नों के धार्मिक उत्तर अलग हो सकते हैं और इतिहासकारों की व्याख्याएं भी अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि पुरी का जगन्नाथ परंपरा-क्षेत्र भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण जीवित परंपरा है।
भगवान जगन्नाथ की कथा नीलमाधव से शुरू होकर पुरुषोत्तम, दारुब्रह्म और जगन्नाथ संस्कृति तक पहुंचती है। राजा इंद्रद्युम्न, विद्यापति, विश्वावसु और नीलमाधव से जुड़े प्रसंग इस कथा को रोमांच और आध्यात्मिकता देते हैं, जबकि रथ यात्रा, महाप्रसाद और नवकलेवर इसे आज भी जीवंत बनाए रखते हैं।
पुराणों और स्थानीय परंपराओं में कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं, इसलिए इन्हें इतिहास के प्रमाणों से अलग रखते हुए समझना जरूरी है। इसी संतुलित दृष्टि से देखें तो भगवान जगन्नाथ केवल पुरी के मंदिर के देवता नहीं, बल्कि ओडिशा की सामूहिक स्मृति, लोकपरंपरा और भारतीय धार्मिक संस्कृति में विकसित हुई एक ऐसी परंपरा हैं, जिसमें भक्ति के साथ विविधता और सांस्कृतिक समन्वय की भी गहरी छाप दिखाई देती है।






