
संवाद 24 डेस्क। कुछ कहानियां उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन संघर्षों से बड़ी बनती हैं जिनसे गुजरकर उपलब्धि हासिल की जाती है। पुणे के प्रथमेश सिन्हा की कहानी ऐसी ही है। महज 16 महीने की उम्र में ब्रेन ट्यूमर के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई। डॉक्टरों ने बताया कि ट्यूमर ऑप्टिक काइज्म जैसी संवेदनशील जगह पर था, जहां दोनों आंखों की नसें मिलती हैं। इसके बाद इलाज, अस्पताल और जांच उनके बचपन का हिस्सा बन गए। लेकिन इस चुनौती ने प्रथमेश को रोकने के बजाय उनके भीतर आगे बढ़ने का जज्बा मजबूत किया।
स्कूल ने नहीं दिया दाखिला, घर बना शिक्षा का केंद्र
दृष्टिबाधिता के कारण प्रथमेश के सामने अगली बड़ी चुनौती शिक्षा की थी। कई स्कूलों ने उन्हें प्रवेश नहीं दिया। ऐसे समय में उनके माता-पिता ने हार नहीं मानी और घर को ही स्कूल बना दिया। होम स्कूलिंग के दौरान प्रथमेश ने पढ़ाई के साथ संवाद और अन्य कौशल पर भी काम किया। परिवार ने उन्हें उनकी परिस्थितियों से परिभाषित होने के बजाय अपनी क्षमताओं को पहचानने के लिए प्रेरित किया। यही पारिवारिक सहयोग आगे चलकर उनके आत्मविश्वास की महत्वपूर्ण नींव बना।
यहां प्रथमेश की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। दिव्यांगता को अक्सर व्यक्ति की सीमाओं के रूप में देखा जाता है, लेकिन प्रथमेश के मामले में परिवार ने परिस्थितियों को उनकी पूरी पहचान बनने नहीं दिया। शिक्षा का रास्ता बदला, लक्ष्य नहीं।
2019 में फिर लौटा ट्यूमर, संघर्ष एक बार फिर सामने
प्रथमेश की मुश्किलें यहीं समाप्त नहीं हुईं। वर्ष 2019 में ब्रेन ट्यूमर दोबारा उसी क्षेत्र में पाया गया और उनका इलाज फिर शुरू हुआ। लेकिन इस बार अस्पताल जाने वाला बच्चा केवल अपने उपचार पर ध्यान देने वाला मरीज नहीं था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वह डॉक्टरों और दूसरे मरीजों से बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाता था। उनके आत्मविश्वास से प्रभावित होकर डॉक्टर भी दूसरे मरीजों को उनका उदाहरण देते थे।
यही अनुभव आगे चलकर उनके मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में उभरने की वजह बना। प्रथमेश की कहानी में बीमारी केवल एक कठिनाई बनकर नहीं आती, बल्कि वह उनके व्यक्तित्व में संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति सहानुभूति को भी मजबूत करती दिखाई देती है।
ब्रेल ने खोला सीखने का नया रास्ता
बाद में प्रथमेश को पुणे के एक स्कूल में प्रवेश मिला, जहां उन्होंने ब्रेल लिपि सीखना शुरू किया। इसी दौरान कोरोना महामारी ने शिक्षा की व्यवस्था बदल दी। स्कूल बंद हुए और पढ़ाई डिजिटल तथा वैकल्पिक माध्यमों की ओर बढ़ी। दृष्टिबाधित बच्चों के लिए यह बदलाव अतिरिक्त चुनौती लेकर आया।
इसी दौर में प्रथमेश की मुलाकात ANNIE नामक स्व-शिक्षण ब्रेल उपकरण से हुई। Thinkerbell Labs द्वारा विकसित यह उपकरण दृष्टिबाधित लोगों को ब्रेल पढ़ने, लिखने और सीखने में सहायता देने के उद्देश्य से बनाया गया था। प्रथमेश इसके उपयोगकर्ता बने और इसकी उपयोगिता को समझने के बाद इसके बारे में लोगों तक जानकारी पहुंचाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
शार्क टैंक इंडिया में दिखाया आत्मविश्वास
ANNIE के साथ प्रथमेश का जुड़ाव उन्हें राष्ट्रीय मंच Shark Tank India तक ले गया। उस समय वह बेहद कम उम्र में कार्यक्रम में दिखाई दिए और Thinkerbell Labs के ब्रेल उपकरण का प्रदर्शन किया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वह शो में सबसे कम उम्र के प्रतिभागियों में रहे और उनके आत्मविश्वास ने दर्शकों और शार्क्स का ध्यान खींचा।
यहां खास बात यह थी कि प्रथमेश केवल मंच पर मौजूद बच्चे नहीं थे। वह उस तकनीक के वास्तविक उपयोगकर्ता थे और इसलिए ANNIE किस तरह दृष्टिबाधित बच्चों के लिए उपयोगी हो सकता है, इसे अपने अनुभव से समझा सकते थे। Thinkerbell Labs के सह-संस्थापकों ने भी बताया था कि प्रथमेश स्कूल में ANNIE का इस्तेमाल कर चुके थे और उत्पाद की उपयोगिता को वास्तविक उपयोगकर्ता के नजरिए से समझाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी किया ANNIE का प्रदर्शन
Shark Tank India के बाद प्रथमेश की पहचान और व्यापक हुई। जुलाई 2022 में गुजरात के गांधीनगर में आयोजित Digital India Week के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और ANNIE उपकरण का प्रदर्शन किया। उस समय प्रधानमंत्री ने प्रथमेश के आत्मविश्वास की सराहना करते हुए कहा था कि ऐसे आत्मविश्वासी लोगों से मिलना देश के उज्ज्वल भविष्य में विश्वास मजबूत करता है।
यह मुलाकात केवल एक बच्चे और प्रधानमंत्री के बीच संवाद भर नहीं थी। यह उस विचार का भी प्रतीक बनी कि तकनीक यदि सही तरीके से विकसित हो तो वह दिव्यांग लोगों के लिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते खोल सकती है।
13 साल की उम्र में मिला राष्ट्रीय सम्मान
प्रथमेश की उपलब्धियों को वर्ष 2024 में राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। भारत सरकार के Department of Empowerment of Persons with Disabilities की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, उन्हें श्रेष्ठ दिव्यांग बाल/बालिका श्रेणी में व्यक्तिगत उत्कृष्टता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार-2024 से सम्मानित किया गया। आधिकारिक प्रशस्ति में उन्हें दृष्टिबाधित बच्चों और कैंसर मरीजों के लिए काम करने वाले मोटिवेशनल स्पीकर तथा ANNIE के माध्यम से ब्रेल साक्षरता को बढ़ावा देने वाले युवा के रूप में उल्लेखित किया गया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिसंबर 2024 में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए। सरकारी रिकॉर्ड में उस समय प्रथमेश की उम्र 13 वर्ष दर्ज है।
प्रथमेश की कहानी युवाओं को क्या सिखाती है?
प्रथमेश सिन्हा की कहानी को केवल दृष्टिबाधिता के बावजूद सफलता की कहानी कहना इसके व्यापक संदेश को सीमित कर देगा। इसमें शिक्षा, तकनीक, परिवार, आत्मविश्वास और सामाजिक संवेदनशीलता—सभी पहलू जुड़े हैं।
सबसे पहली सीख है कि परिस्थितियां व्यक्ति की पूरी पहचान तय नहीं करतीं। स्कूल का दरवाजा बंद हुआ तो घर में पढ़ाई शुरू हुई। बीमारी दोबारा आई तो इलाज के साथ दूसरों का हौसला बढ़ाने का काम जारी रहा। आंखों की रोशनी नहीं रही, लेकिन सीखने की इच्छा बनी रही।
दूसरी सीख है कि तकनीक तभी सार्थक है जब वह वास्तविक समस्या का समाधान करे। ANNIE जैसे उपकरण का महत्व इसलिए बढ़ता है क्योंकि वह दृष्टिबाधित लोगों की शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। प्रथमेश ने इसके उपयोगकर्ता और प्रचारक दोनों रूपों में अपनी भूमिका निभाई।
तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण सीख है कि सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि दूसरों के लिए रास्ता बनाने का नाम भी है। प्रथमेश ने अपनी कहानी को अपने तक सीमित नहीं रखा। वह दृष्टिबाधित बच्चों के लिए जागरूकता और ब्रेल शिक्षा की बात करते रहे हैं। भारत सरकार की राष्ट्रीय पुरस्कार प्रशस्ति भी उनके इसी योगदान को रेखांकित करती है।
आंखों की रोशनी से आगे भी होती है देखने की क्षमता
प्रथमेश सिन्हा की यात्रा 16 महीने की उम्र में आई एक गंभीर चुनौती से शुरू होकर राष्ट्रीय मंचों तक पहुंची। स्कूल में प्रवेश की मुश्किल, घर पर शिक्षा, बीमारी की वापसी, ब्रेल से परिचय, ANNIE के साथ जुड़ाव, Shark Tank India में प्रदर्शन, प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात और राष्ट्रीय पुरस्कार—यह सफर बताता है कि किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन केवल उसकी शारीरिक सीमाओं से नहीं किया जा सकता।
प्रथमेश की कहानी का सबसे मजबूत संदेश शायद यही है कि रोशनी केवल आंखों से नहीं, सोच और हौसले से भी आती है। जब सीखने की इच्छा, परिवार का सहयोग, तकनीक का सही इस्तेमाल और निरंतर प्रयास साथ आते हैं, तो चुनौती रास्ते की दीवार बनने के बजाय नई राह खोजने की वजह बन सकती है।
यही कारण है कि प्रथमेश सिन्हा की कहानी आज सिर्फ एक सफलता की खबर नहीं, बल्कि उन तमाम बच्चों और परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश है जो किसी शारीरिक, सामाजिक या शैक्षिक चुनौती के सामने खड़े हैं।






