क्या सिर्फ रोशनी के लिए बनाए जाते थे रोशनदान? पुराने घरों की वह वैज्ञानिक सोच, जो आज के आधुनिक वास्तुशिल्प को भी दे रही है चुनौती

संवाद 24 डेस्क। भारतीय पारंपरिक घरों में यदि आपने कभी पुराने मकानों, हवेलियों या कच्चे-पक्के घरों को ध्यान से देखा होगा, तो उनकी दीवारों के ऊपरी हिस्से में छोटे-छोटे खुले छिद्र या खिड़कियां अवश्य दिखाई देती होंगी। इन्हें रोशनदान कहा जाता है। आधुनिक फ्लैट संस्कृति और एयर कंडीशनिंग के दौर में रोशनदान लगभग गायब हो चुके हैं, लेकिन आज जब ऊर्जा दक्ष (Energy Efficient) भवनों और प्राकृतिक वेंटिलेशन पर पूरी दुनिया जोर दे रही है, तब वास्तु विशेषज्ञ और पर्यावरण वैज्ञानिक फिर से इस पारंपरिक तकनीक की उपयोगिता को समझने लगे हैं।
रोशनदान केवल सूर्य की रोशनी घर के भीतर लाने का माध्यम नहीं थे। इनके पीछे ताप विज्ञान (Thermal Science), वायु संचार (Ventilation), आर्द्रता नियंत्रण, स्वास्थ्य और ऊर्जा संरक्षण जैसे कई वैज्ञानिक सिद्धांत काम करते हैं। यही कारण है कि सदियों पहले बने अनेक भारतीय घर बिना बिजली, पंखे या एसी के भी अपेक्षाकृत ठंडे और रहने योग्य बने रहते थे। आधुनिक भवन विज्ञान भी प्राकृतिक वेंटिलेशन और “स्टैक इफेक्ट” जैसी अवधारणाओं को प्रभावी मानता है।

रोशनदान क्या होता है?
रोशनदान दीवार के ऊपरी हिस्से या छत के ठीक नीचे बनाया गया छोटा खुला भाग होता है। कई स्थानों पर इसमें लकड़ी, जाली, लोहे की ग्रिल या रंगीन कांच भी लगाए जाते थे। इसका मुख्य उद्देश्य घर के अंदर जमा गर्म हवा और दूषित वायु को बाहर निकालना तथा प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा का प्रवेश सुनिश्चित करना होता था।
भारत के विभिन्न राज्यों में इसकी बनावट स्थानीय जलवायु और निर्माण शैली के अनुसार बदलती रही। राजस्थान की हवेलियों, उत्तर भारत के पुराने मकानों, बंगाल के पारंपरिक घरों तथा दक्षिण भारत के कई भवनों में इसके अलग-अलग स्वरूप देखने को मिलते हैं।

रोशनदान के पीछे छिपा है ताप विज्ञान
विज्ञान का एक सरल नियम कहता है कि गर्म हवा हल्की होती है और ऊपर उठती है, जबकि ठंडी हवा अपेक्षाकृत भारी होने के कारण नीचे रहती है।
दिनभर घर के भीतर मौजूद लोगों, रसोई, धूप और अन्य कारणों से गर्म हुई हवा ऊपर की ओर इकट्ठी हो जाती है। यदि ऊपर रोशनदान हो तो यह गर्म हवा स्वतः बाहर निकल जाती है। जैसे ही गर्म हवा बाहर जाती है, दरवाजों और खिड़कियों से अपेक्षाकृत ठंडी हवा अंदर प्रवेश करने लगती है।
इसी प्रक्रिया को भवन विज्ञान में प्राकृतिक वायु परिसंचरण (Natural Ventilation) तथा स्टैक इफेक्ट (Stack Effect) कहा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी बिजली के लगातार चलती रहती है और घर का तापमान संतुलित बनाए रखने में मदद करती है।

बिजली नहीं, प्रकृति करती थी एयर कंडीशनिंग
आज अधिकांश घरों में बंद खिड़कियां, कांच की दीवारें और एयर कंडीशनर सामान्य बात हैं। लेकिन पुराने समय में लोग मौसम के अनुसार भवन निर्माण करते थे।
रोशनदान, मोटी दीवारें, ऊंची छतें, खुले आंगन और चौड़े बरामदे मिलकर एक प्राकृतिक शीतलन प्रणाली तैयार करते थे। गर्म हवा ऊपर निकलती रहती थी और नीचे से ठंडी हवा आती रहती थी। परिणामस्वरूप घर अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता था। यही कारण था कि कई पुराने मकानों में भीषण गर्मी के दौरान भी अपेक्षाकृत आरामदायक वातावरण बना रहता था।

सिर्फ ठंडक नहीं, बेहतर स्वास्थ्य का भी आधार
यदि किसी घर में वायु का उचित संचार न हो तो कार्बन डाइऑक्साइड, धुआं, नमी और अन्य प्रदूषक अंदर ही जमा होने लगते हैं।
पुराने समय में रसोई में लकड़ी, उपले या कोयले का प्रयोग होता था। ऐसे में धुएं को बाहर निकालने में रोशनदान अत्यंत उपयोगी साबित होते थे। इससे घर के भीतर धुएं का स्तर कम रहता था और लोगों को सांस संबंधी समस्याओं से कुछ हद तक राहत मिलती थी।
आज भी भवन स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्याप्त प्राकृतिक वेंटिलेशन इनडोर एयर क्वालिटी सुधारने का महत्वपूर्ण साधन है।

नमी और फफूंद से भी बचाते थे रोशनदान
जहां हवा का प्रवाह कम होता है वहां नमी अधिक समय तक बनी रहती है। लगातार नमी रहने से दीवारों पर फफूंद (Mold) और सीलन विकसित होने लगती है।
रोशनदान लगातार हवा के आवागमन को बनाए रखते थे, जिससे अतिरिक्त नमी बाहर निकलती रहती थी। इससे घर लंबे समय तक सुरक्षित रहता था और दीवारों की आयु भी बढ़ती थी।

प्राकृतिक रोशनी का अनोखा स्रोत
रोशनदान केवल हवा के लिए ही नहीं बल्कि प्राकृतिक प्रकाश के लिए भी बनाए जाते थे।
दीवार के ऊपरी हिस्से में होने के कारण सूर्य का प्रकाश सीधे घर के भीतर प्रवेश करता था। इससे दिन में कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता कम पड़ती थी।
यह ऊर्जा की बचत का भी प्रभावी तरीका था, जबकि उस समय बिजली अधिकांश क्षेत्रों में उपलब्ध भी नहीं थी।

कीट-पतंगों पर भी रहता था नियंत्रण
रोशनदान सामान्य खिड़कियों की तुलना में काफी ऊंचाई पर होते थे। इनमें अक्सर जाली लगी होती थी, जिससे हवा आती रहती थी लेकिन बड़े कीट-पतंगे आसानी से अंदर नहीं आ पाते थे। इस प्रकार प्राकृतिक वेंटिलेशन और सुरक्षा दोनों का संतुलन बना रहता था।

भारतीय जलवायु के अनुरूप विकसित हुई थी यह तकनीक
भारत की जलवायु अत्यंत विविधतापूर्ण है। कहीं भीषण गर्मी, कहीं अत्यधिक आर्द्रता तो कहीं लंबे समय तक वर्षा होती है।
इसी कारण पारंपरिक भारतीय भवन निर्माण में स्थानीय मौसम के अनुसार डिजाइन विकसित किए गए। रोशनदान भी इसी सोच का हिस्सा थे।
राजस्थान जैसे गर्म क्षेत्रों में ऊंची छतों और रोशनदानों का संयोजन गर्मी कम करने में सहायक था, जबकि आर्द्र क्षेत्रों में यह अतिरिक्त नमी बाहर निकालने में मदद करता था।

आज फिर क्यों बढ़ रही है रोशनदान की उपयोगिता?
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती बिजली खपत और ऊर्जा संरक्षण की आवश्यकता ने पूरी दुनिया को प्राकृतिक भवन डिजाइन की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है।
ग्रीन बिल्डिंग (Green Building), सस्टेनेबल आर्किटेक्चर (Sustainable Architecture) और ऊर्जा दक्ष भवनों में प्राकृतिक वेंटिलेशन को फिर से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कई आधुनिक आर्किटेक्ट अब भवनों में ऐसी डिजाइन अपनाने लगे हैं जिससे बिना अधिक ऊर्जा खर्च किए पर्याप्त हवा और प्रकाश उपलब्ध हो सके।

आधुनिक घरों से क्यों गायब हो गए रोशनदान?
इसके पीछे कई कारण हैं—
छोटे फ्लैट और सीमित जगह।
एयर कंडीशनर पर बढ़ती निर्भरता।
पूरी तरह बंद कांच की इमारतें।
आधुनिक इंटीरियर डिजाइन की प्राथमिकताएं।
निर्माण लागत और सरल डिजाइन।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीक के साथ रोशनदान जैसी प्राकृतिक वेंटिलेशन व्यवस्था को जोड़ा जाए तो बिजली की खपत कम की जा सकती है।

क्या केवल रोशनदान ही पर्याप्त हैं?
नहीं। प्रभावी प्राकृतिक वेंटिलेशन के लिए केवल रोशनदान पर्याप्त नहीं होते।
पुराने घरों में इनका संयोजन निम्न विशेषताओं के साथ किया जाता था—
ऊंची छतें।
सामने और पीछे खिड़कियां।
खुला आंगन।
मोटी दीवारें।
बरामदे।
स्थानीय जलवायु के अनुसार निर्माण सामग्री।
इन्हीं सभी तत्वों के संयुक्त प्रभाव से घर का तापमान नियंत्रित रहता था।

वास्तुकला और विज्ञान का शानदार मेल
भारतीय पारंपरिक वास्तुकला अनुभव आधारित विज्ञान पर विकसित हुई थी। उस समय आधुनिक उपकरण नहीं थे, लेकिन पीढ़ियों के अनुभव ने ऐसे निर्माण विकसित किए जो स्थानीय मौसम के अनुरूप थे।
रोशनदान इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें किसी जटिल मशीन, बिजली या ईंधन की आवश्यकता नहीं होती थी, फिर भी ये प्राकृतिक तरीके से घर को अधिक आरामदायक बनाते थे।

पर्यावरण संरक्षण में भी निभा सकते हैं बड़ी भूमिका
यदि भवनों में प्राकृतिक वेंटिलेशन बेहतर होगा तो एयर कंडीशनर और कृत्रिम वेंटिलेशन पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है।
इससे बिजली की बचत होगी, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा। यही कारण है कि टिकाऊ भवन निर्माण (Sustainable Building Design) में प्राकृतिक वेंटिलेशन को महत्वपूर्ण माना जाता है।

रोशनदान केवल पुराने जमाने की निर्माण शैली का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे भारतीय पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरणीय समझ और वैज्ञानिक सोच का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनके माध्यम से प्राकृतिक रोशनी, ताजी हवा, ताप नियंत्रण, नमी प्रबंधन और बेहतर स्वास्थ्य जैसे अनेक लाभ एक साथ प्राप्त होते थे।
आज जब दुनिया ऊर्जा संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब यह पारंपरिक तकनीक हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर बनाए गए समाधान अक्सर सबसे टिकाऊ और प्रभावी होते हैं। आधुनिक वास्तुकला यदि पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक शोध का संतुलित उपयोग करे, तो भविष्य के भवन अधिक ऊर्जा-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल और स्वास्थ्यवर्धक बन सकते हैं।

Geeta Singh
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