
संवाद 24, नई दिल्ली। राष्ट्रवादी पत्रकारिता के आठ दशक पूरे होने के अवसर पर आयोजित “Organiser: 80 Years of Media Movement” कार्यक्रम में देश के उपराष्ट्रपति तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह ने साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गेनाइज़र (Organiser) की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए इसे केवल एक समाचार पत्रिका नहीं, बल्कि विचार, राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक विमर्श का सशक्त माध्यम बताया। कार्यक्रम में दोनों वक्ताओं ने पत्रकारिता की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा राष्ट्र निर्माण में मीडिया के योगदान पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए।
80 वर्षों की यात्रा को बताया राष्ट्रीय वैचारिक आंदोलन
कार्यक्रम के समापन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र की 80 वर्षों की यात्रा केवल किसी पत्रिका का इतिहास नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन की निरंतर यात्रा है। उनके अनुसार इस पत्रिका ने अनेक पीढ़ियों के विचारों, तर्कों और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को आकार देने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी जीवन में बेंगलुरु विश्वविद्यालय परिसर के दौरान ऑर्गेनाइज़र उनके लिए एक ऐसे शिक्षक की तरह था, जिसने दूर रहकर भी उनके व्यक्तित्व और चिंतन को प्रभावित किया।
‘पत्रकारिता केवल समाचार देना नहीं, समाज को शिक्षित करना भी है’
दत्तात्रेय होसबाले ने पत्रकारिता की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल घटनाओं का प्रसारण करना नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार वास्तविक पत्रकारिता समाज को शिक्षित करती है, विचारों का निर्माण करती है और जनमत को सकारात्मक दिशा प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि यदि पत्रकारिता केवल लाभ कमाने का माध्यम बन जाए तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। इसलिए पत्रकारिता को नैतिकता, सत्यनिष्ठा और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
‘प्रेस की स्वतंत्रता का निर्भीक समर्थक रहा ऑर्गेनाइज़र’
सरकार्यवाह ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र ने अपने पूरे इतिहास में प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन किया है। उन्होंने इसे पूर्व-डिजिटल युग में राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बताते हुए कहा कि अनेक राष्ट्रीय विषयों पर इस पत्रिका ने वैचारिक संवाद को दिशा दी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संसद में उद्धृत होने वाली पत्रिकाओं में ऑर्गेनाइज़र का विशेष स्थान रहा है।
के.आर. मलकानी के योगदान को किया स्मरण
अपने संबोधन में दत्तात्रेय होसबाले ने ऑर्गेनाइज़र के पूर्व संपादक के.आर. मलकानी के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि मलकानी केवल संपादक नहीं बल्कि विचारों के अग्रदूत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। आपातकाल के दौरान जेल में रहने के बावजूद उन्होंने लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद रखी। होसबाले ने कहा कि यह परंपरा ऑर्गेनाइज़र की वैचारिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
सैकड़ों पत्रकारों और लेखकों को दिया मंच
सरकार्यवाह ने कहा कि पिछले आठ दशकों में ऑर्गेनाइज़र ने देशभर में अनेक पत्रकारों, लेखकों और विचारकों को मंच प्रदान किया। इनमें से कई लोग आगे चलकर राष्ट्रीय विमर्श के प्रमुख हस्ताक्षर बने। उनके अनुसार किसी भी पत्रिका की वास्तविक सफलता केवल उसके प्रकाशन में नहीं बल्कि समाज में तैयार होने वाली वैचारिक पूंजी में निहित होती है।
उपराष्ट्रपति बोले, ऑर्गेनाइज़र समाज की सामूहिक चेतना से शक्ति प्राप्त करता रहा
भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में कहा कि ऑर्गेनाइज़र ने आठ दशकों तक निरंतरता, धैर्य और वैचारिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक सामान्य स्वयंसेवक बताते हुए कहा कि युवावस्था में वे नियमित रूप से ऑर्गेनाइज़र पढ़ते थे, जिससे उन्हें राष्ट्रीय विषयों पर तथ्य और दृष्टिकोण प्राप्त होते थे।

विभाजन के कठिन दौर में शुरू हुआ था प्रकाशन
उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र का जन्म भारत के इतिहास के अत्यंत चुनौतीपूर्ण कालखंड में हुआ। स्वतंत्रता और विभाजन के समय समाज में जो अस्थिरता थी, उसके बीच इस पत्रिका ने समाज की सामूहिक चेतना से ऊर्जा प्राप्त कर राष्ट्रवादी पत्रकारिता को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि विभाजन के दौरान विस्थापित लोगों और शरणार्थियों की समस्याओं को सामने लाने में भी इस पत्रिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के प्रश्नों को लगातार उठाया
सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र ने समय-समय पर राष्ट्रीय एकता, अखंडता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन तथा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर भी इस पत्रिका ने गंभीर प्रश्न उठाए और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया।
54 से अधिक देशों तक पहुंचा प्रकाशन
उपराष्ट्रपति ने बताया कि आज ऑर्गेनाइज़र की पहुंच भारत तक सीमित नहीं है। यह 54 से अधिक देशों में उपलब्ध है और वैश्विक स्तर पर भारत के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि आठ दशकों का प्रकाशन इतिहास इसे स्वतंत्र भारत के महत्वपूर्ण अभिलेखों में शामिल करता है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ऐतिहासिक महत्व रखता है।
1947 में हुई थी शुरुआत
ऑर्गेनाइज़र का प्रकाशन वर्ष 1947 में स्वतंत्रता और देश विभाजन से ठीक पहले प्रारंभ हुआ था। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय विषयों पर वैचारिक विमर्श प्रस्तुत करना था। समय के साथ यह अंग्रेज़ी साप्ताहिक पत्रिका भारतीय सार्वजनिक जीवन, राजनीति, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक विषयों पर अपने दृष्टिकोण के लिए जानी जाने लगी। विभिन्न कालखंडों में के.आर. मलकानी, लालकृष्ण आडवाणी, शेषाद्रि चारी और वर्तमान संपादक प्रफुल्ल केतकर सहित कई प्रमुख व्यक्तित्व इससे जुड़े रहे हैं।
भारतीय पत्रकारिता में अभिलेखीय महत्व
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक निरंतर प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र और पत्रिकाएं केवल समाचारों का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि वे किसी देश के सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी बन जाती हैं। आठ दशकों तक लगातार प्रकाशित होने के कारण ऑर्गेनाइज़र स्वतंत्र भारत के अनेक महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का अभिलेखीय स्रोत भी माना जाता है।
पत्रकारिता के बदलते दौर में नई चुनौतियां
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के वर्तमान दौर में पत्रकारिता की चुनौतियां पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। तेज़ी से बदलते सूचना तंत्र, फेक न्यूज़, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सामग्री और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच विश्वसनीयता बनाए रखना मीडिया संस्थानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। ऐसे समय में नैतिक पत्रकारिता, तथ्यपरक रिपोर्टिंग और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। इसी संदर्भ में कार्यक्रम में वक्ताओं ने पत्रकारिता के मूल मूल्यों सत्य, नैतिकता, जिम्मेदारी और राष्ट्रहित को पुनः केंद्र में रखने का आह्वान किया।






