इटावा में मजार विवाद ने पकड़ा तूल, वन विभाग के अधिकारियों पर कोर्ट में वाद दायर

इटावा, उत्तर प्रदेश। जनपद इटावा में स्थित कथित ऐतिहासिक मजार को लेकर विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है। मोहम्मद गौरी के सेनापति शमशुद्दीन से जुड़ी बताई जा रही इस मजार के मामले में वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोर्ट में वाद दायर किया गया है। यह मामला धार्मिक आस्था, भूमि स्वामित्व और प्रशासनिक कार्रवाई के टकराव का नया उदाहरण बनकर उभरा है।

रास्ता बंद करने का आरोप, कोर्ट पहुंचा मामला

वादियों—इमरान बेग, दिलशाद और मोहम्मद गुफरान—की ओर से अधिवक्ता कफील कुरैशी ने आरोप लगाया है कि वर्षों पुरानी मजार तक जाने वाले रास्ते को वन विभाग ने अवरुद्ध कर दिया। आरोप है कि रास्ते में गड्ढे खुदवाकर आवागमन बाधित किया गया, जिससे धार्मिक स्थल पर पहुंचना कठिन हो गया। इसे उन्होंने अवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता में बाधा बताया है।

वन विभाग का दावा: आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा

दूसरी ओर, वन विभाग का पक्ष यह है कि संबंधित भूमि आरक्षित वन क्षेत्र में आती है। विभागीय न्यायालय ने 17 अप्रैल को इस मजार को अवैध घोषित करते हुए लगभग 1800 वर्गफीट जमीन से कब्जा हटाने के आदेश दिए थे। अधिकारियों के अनुसार, मजार से जुड़े पक्ष जमीन के स्वामित्व के वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।

64 दिन चली सुनवाई के बाद आया था फैसला

वन विभाग के प्राधिकृत अधिकारी द्वारा यह निर्णय करीब 64 दिनों की सुनवाई के बाद दिया गया। इस दौरान मजार के सदर फजले इलाही और उनके सहयोगियों से भूमि के दस्तावेज मांगे गए, लेकिन वे संतोषजनक प्रमाण पेश नहीं कर पाए। इसके बाद विभाग ने कार्रवाई करते हुए कब्जा हटाने के निर्देश जारी किए।

अब 11 मई को होगी अगली सुनवाई

इस पूरे मामले में अब CJM कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 11 मई की तारीख तय की है। अदालत यह तय करेगी कि वन विभाग की कार्रवाई वैधानिक थी या धार्मिक स्थल तक पहुंच में बाधा डालने के आरोपों में कोई दम है।

धार्मिक आस्था बनाम कानून—किसका पलड़ा भारी?

यह मामला केवल एक मजार या रास्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था और सरकारी नियमों के बीच संतुलन का बड़ा प्रश्न भी खड़ा करता है। आने वाला न्यायालय का फैसला इस प्रकार के अन्य विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।इटावा का यह विवाद प्रशासनिक कार्रवाई, कानूनी प्रक्रिया और धार्मिक भावनाओं के बीच जटिल संतुलन को दर्शाता है। अब सभी की नजरें 11 मई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील मामले की दिशा तय होगी।

Shivpratap Singh
Shivpratap Singh

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