बालू घाटों की नीलामी अटकी, खजाने को झटका: झारखंड में टेंडर देरी से करोड़ों का नुकसान

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संवाद 24 झारखंड। बालू खनन से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी अब सरकार के लिए भारी पड़ती दिख रही है। राज्य के कई जिलों में बालू घाटों की नीलामी समय पर नहीं हो पा रही है, जिसके चलते सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि जहां एक तरफ सरकारी खजाना खाली हो रहा है, वहीं दूसरी ओर अवैध खनन और बाजार में महंगी बालू की समस्या भी बढ़ती जा रही है।

टेंडर प्रक्रिया में फंसी नीलामी
सूत्रों के अनुसार, बालू घाटों की नीलामी लंबे समय से टेंडर प्रक्रिया में अटकी हुई है। कई जगहों पर तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है। इसका सीधा असर राज्य के राजस्व पर पड़ रहा है, क्योंकि बालू खनन झारखंड के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

खनन बंद तो बढ़ा अवैध कारोबार
जहां-जहां वैध खनन बंद है, वहां अवैध खनन तेजी से बढ़ रहा है। नियमों के अभाव में माफिया सक्रिय हो गए हैं और बिना किसी नियंत्रण के बालू निकालकर बेच रहे हैं। इससे न केवल सरकार को नुकसान हो रहा है, बल्कि पर्यावरण पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।

निर्माण कार्यों पर भी असर
बालू की कमी का असर अब निर्माण कार्यों पर भी साफ दिखने लगा है। सरकारी परियोजनाएं और निजी निर्माण दोनों प्रभावित हो रहे हैं। पहले से ही राज्य में बालू की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी की समस्या सामने आती रही है, और टेंडर में देरी ने इसे और गंभीर बना दिया है।

पहले भी सामने आ चुकी है राजस्व गिरावट
विशेषज्ञों का कहना है कि झारखंड में खनन क्षेत्र से राजस्व में गिरावट पहले भी दर्ज की जा चुकी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, खनिजों से होने वाली आय में पिछले वर्षों में लगातार कमी आई है, जिसका एक बड़ा कारण धीमी नीलामी प्रक्रिया और अनियमितताएं रही हैं।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह टेंडर प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा कर खनन कार्य को नियमित करे। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो राजस्व नुकसान के साथ-साथ अवैध खनन और महंगी बालू की समस्या और भी बढ़ सकती है।

समाधान की तलाश
अधिकारियों का कहना है कि प्रक्रिया को तेज करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। पारदर्शिता और समयबद्ध नीलामी के जरिए ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।

Madhvi Singh
Madhvi Singh

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