79 साल बाद भी गांवों के नाम पर विवाद: ‘चमारी’ और ‘चमरौली’ बदलने की उठी मांग

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उत्तर प्रदेश में गांवों के नाम को लेकर एक नई बहस सामने आई है। राज्य के पूर्व अध्यक्ष (अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम) और विधान परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जालौन और उन्नाव जिलों में स्थित कुछ गांवों के नामों पर आपत्ति जताते हुए उन्हें बदलने की मांग की है। उनका कहना है कि आजादी के लगभग 79 वर्ष बाद भी यदि किसी गांव का नाम ‘चमारी’ या ‘चमरौली’ जैसे जातिगत संदर्भ वाले शब्दों पर आधारित है, तो यह सामाजिक संवेदनशीलता और समानता के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।

जालौन के ‘चमारी’ गांव पर जताया आश्चर्य

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने विशेष रूप से जालौन जिले के ‘चमारी’ नामक गांव का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक और जागरूक समाज में ऐसे नाम उचित नहीं लगते। उनका कहना है कि इस प्रकार के नाम अनजाने में ही जातिगत पहचान और भेदभाव की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि इतने वर्षों से यह नाम प्रचलन में है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे बदलने के लिए कोई ठोस पहल सामने नहीं आई।

उन्नाव का ‘चमरौली’ गांव भी चर्चा में

निर्मल ने यह भी बताया कि उन्नाव जिले में ‘चमरौली’ नाम का एक गांव है, जो इसी प्रकार की सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा मुद्दा बन सकता है। उनके अनुसार, ऐसे नाम न केवल अतीत की सामाजिक असमानताओं की याद दिलाते हैं बल्कि नई पीढ़ी के मन में भी नकारात्मक संदेश दे सकते हैं। उनका मानना है कि समय के साथ समाज की सोच बदल रही है, इसलिए गांवों और सार्वजनिक स्थानों के नाम भी ऐसे होने चाहिए जो सम्मान और समानता का संदेश दें।

मुख्यमंत्री से मुलाकात कर रखेंगे प्रस्ताव

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि वे जल्द ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस मुद्दे को उनके सामने रखेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार सामाजिक समरसता और सम्मानजनक वातावरण बनाने के लिए इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करेगी। उनका कहना है कि गांवों के नाम बदलने से केवल औपचारिक परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह समाज को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का संकेत भी देगा।

गांधी और अंबेडकर के विचारों का उल्लेख

इस विषय पर चर्चा करते हुए निर्मल ने महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने समाज सुधार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन दलित समाज की पीड़ा को अंबेडकर ने स्वयं अनुभव किया था। इसलिए उनके विचारों में सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ अधिक स्पष्ट और गहरी संवेदनशीलता दिखाई देती है।

सामाजिक जागरूकता और सम्मान का सवाल

निर्मल के अनुसार, किसी भी गांव, सड़क या सार्वजनिक स्थान का नाम केवल पहचान नहीं बल्कि समाज की सोच और मूल्यों का प्रतीक भी होता है। इसलिए ऐसे नाम चुने जाने चाहिए जो सम्मान, समानता और सकारात्मकता का संदेश दें। उन्होंने समाज से भी अपील की कि वह जातिगत पहचान से जुड़े पुराने प्रतीकों से आगे बढ़कर अधिक समावेशी और संवेदनशील सोच को अपनाए।

राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल के इस बयान के बाद प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे सामाजिक समरसता की दिशा में जरूरी कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे परंपरागत नामों से छेड़छाड़ के रूप में भी देख रहे हैं। अब नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है और क्या वास्तव में इन गांवों के नाम बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

Shivpratap Singh
Shivpratap Singh

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